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नीलकण्ठ

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :431
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9707
आईएसबीएन :9781613013441

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गुलशन नन्दा का एक और रोमांटिक उपन्यास

नाश्ता तैयार करके आनन्द कारखाने चला गया। जाते समय वह एक मिनट के लिए बेला के पास रुका और 'अच्छा, बाई-बाई बेला-शाम को मिलेंगे', कहकर बिना उत्तर लिए काम पर चल दिया। संध्या उसे छोड़ने के लिए बरामदे तक आई।

कमरे में फिर निस्तब्धता छा गई। संध्या अपने काम में लग गई। बाहर से ठंडी हवा के झोंके आते रहे - कारखाना चलने लगा और मशीनों की गड़गड़ाहट का शोर होने लगा। हल्की-सी मटमैली कुहर के लच्छे शून्य में लटके हुए थे। प्रतिदिन एक ही कार्यक्रम - आज पूरे चार महीने से एक ही कमरे में बैठे-बैठे बेला का जी उकता गया। उसके जीवन में कोई परिवर्तन न था - वही लोग - वही आवाजें - वही नियम में बंधा घुटा-घुटा जीवन - वही द्वेष और डाह की जलन जिसे सहते-सहते वह अनुभव की शक्ति खोए जा रही थी। अब वह इन सबकी अभ्यस्त हो गई थी।

उसका शरीर दिन-प्रतिदिन भद्दा होता जा रहा था। पेट और हाथ-पाँव में सूजन बढ़ती जा रही थी। कभी-कभी जब वह अपने चेहरे को दर्पण में देख लेती तो कांप जाती और इस आपत्ति से छुटकारा पाने को बेचैन हो उठती। प्रकृति के सम्मुख वह बेबस थी।

उसकी फिल्म सपेरन एक महीने से देश भर में बड़ी सफलता से दिखाई जा रही थी। पत्रिकाओं में अपनी प्रशंसा देखकर उसका मन बल्लियों उछलने लगता। उसने उसे देखने के लिए अनुरोध किया परंतु डाँक्टर ने आज्ञा न दी। डॉक्टर तो शायद अनुमति दे देता, परंतु ये लोग बेला का कहीं भी जाना पसंद नहीं करते थे। उसे धैर्य, सहनशीलता की शिक्षा देना चाहते थे।

एक दिन मिलने वालों में सेठ साहब भी आए। वह बेला के कारण लाखों रुपये कमा रहे थे और उन्होंने दस हजार का एक चेक उपहार में बेला को दिया। सेठ साहब ने अपनी दूसरी फिल्म का कांट्रेक्ट भी पेश किया। बेला ने आनन्द की ओर देखा। आनन्द के भावों से प्रकट हो रहा था कि वह इसके पक्ष में नहीं। बेला ने परिस्थितियों को देखते हुए सेठ साहब की बात रखते हुए कहा-

'कल क्या होगा कौन जाने-यदि जीवित रही तो आपकी सेवा करूँगी।'

'वचन रहा' - सेठ साहब झट बोले।

'वचन - अभी नहीं - जीवित रही तो बात करूँगी - अभी से क्या कह सकती हूँ।'

'तुम बच्चों की-सी बातें करती हो - कोई बड़ी आपत्ति तो नहीं - सेठानी को ही देखो - दस बच्चे होते हुए भी जी नहीं भरा।'

सेठ जी की यह बात सुनकर सब जोर से हँसने लगे। बेला ने लज्जा से आँखें नीची कर लीं।

सबके चले जाने पर फिर कमरे में सन्नाटा छा गया। अकेले में अपने भविष्य के विषय में सोचने लगी - एक ओर रंगीन दुनिया, झंकार पर नाचते पांव-नाम, धन और प्रशंसा - और दूसरी ओर केवल आनन्द का प्रेम, घर-गृहस्थी के झगड़े - बच्चे चिन्ता और फिर आनन्द और संध्या का लगाव - संध्या उसके जीवन के साथ घुन के समान लगी हुई - जब से संध्या ने अपना काम-काज उसके सुपुर्द किया - वह सदा के लिए उसके उपकारों के नीचे दब गया था। सत्य भी यही था। संध्या के बिना आनन्द का जीवन दूभर हो जाता। उसने फिर उसे मानवता के मार्ग पर ला खड़ा किया था। उसे बेला पर दया आती जो वास्तविकता को न समझते हुए उससे दूर थी - वह संध्या से क्यों नहीं सीखती - अपना स्वभाव बदलने का प्रयत्न क्यों नहीं करती - ये बातें उसे प्राय: दुखी करतीं।

संध्या भीतर आई और बेला को दवाई देने लगी। बेला ने कड़ी दृष्टि से उसे यों देखा जैसे कैदी जेलर को देखता है - उससे घृणा करता है। फिर भी उसका कहा मानता है।

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