ई-पुस्तकें >> नदी के द्वीप नदी के द्वीपसच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय
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व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।
“आप पढ़ तो लीजिए न। मैं साथ लायी हूँ। संस्कृत भी, एक अंग्रेजी अनुवाद भी।”
“बाप रे! तुम्हारी एफ़्रिशेंसी तो वैज्ञानिक की है। काश कि बुद्धि भी वैसी होती। हो तुम निरी...”
“देखिए भुवन दा! चिढ़ाइए मत! नहीं तो मैं भी वैसा ही जवाब दूँगी।”
सहसा वह सकपका कर चुप हो गयी और उसका चेहरा तमतमा गया, क्योंकि साथ के दूसरे कमरे से एक व्यक्ति ने बाहर निकल कर कहा, “भुवन, मेरा इण्टरप्शन माफ़ करना; मैं थोड़ी देर बाहर जा रहा हूँ।” और फिर गौरा की ओर तनिक कौतुक-भरी दृष्टि से देखकर फिर भुवन की ओर मुड़ कर पलकें उठायी, मानो कहता हो, “यह कौन हैं, परिचय...”
भुवन ने कहा, “ओह, गौरा जी, यह हैं मेरे मित्र और पुराने सहपाठी चन्द्रमाधव, विलायत जाने वाले हैं, आज ही यहाँ आये हैं। चन्द्र यह हैं गौरा जी, कालेज में पढ़ती हैं। पहले कुछ दिन मैंने भी पढ़ाया था।”
“तुम्हारी पढ़ाई के लक्षण तो देख ही रहा हूँ!” चन्द्र ने दबी दुष्टता के साथ कहा, “मिस गौरा, आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई; इसलिए और भी अधिक कि भुवन के परिचितों में कोई ऐसा भी है जिसे साहित्यिक रुचि है, भुवन तो विज्ञान में ग़र्क हो गया है।”
गौरा ने कुछ दूर से कहा, “मास्टर साहब मैंने साहित्य भी पढ़ा है।”
“सो तो है, सो तो है। साहित्य ही क्यों, देखता हूँ कि मेरे साथ के बाद से उन्हें नाटक, संगीत, नृत्य बहुत-से विषयों में रुचि हो गयी है, बल्कि पहुँच भी रखते हैं अब।”
भुवन ने कहा, “रहने दो चन्द्र, गौरा जी के सामने उनके मास्टर का मज़ाक बनाना क्या उचित है?”
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