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कुसम कुमारी

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :183
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9703
आईएसबीएन :9781613011690

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रहस्य और रोमांच से भरपूर कहानी

साफ सवेरा हो जाने पर वही नौजवान जो उन पांचों औरतों, सिपाही तथा मशालची को साथ लिए हुए यहां आया था। मकान के बाहर निकला और निगाह दौड़ा कर चारों तरफ देखने लगा। यकायक उसकी निगाह रनबीरसिंह पर पड़ी जो उससे थोड़ी ही दूर पर एक चट्टान पर लेटे हुए थे। एक नए आदमी को वहां देख उसे ताज्जुब मालूम हुआ और हालचाल मालूम करने के लिए वह रनबीरसिंह की तरफ बढ़ा। रनबीरसिंह ने उसे अपने पास आते देख आंखें बन्द कर लीं और घुर्राटा लेने लगे।

नौजवान रनबीरसिंह के पास पहुंचा और उन्हें गौर से देखने लगा, उसी समय रनबीरसिंह ने भी मानों पैर की आहट पाकर आंखें खोल दीं और चारों तरफ देख के बोले, ‘‘अहा! तू ही तो है!!’’

नौजवान–कहिए बाबाजी, आपका गुरुद्वारा कहां है और यहां किसके साथ आए?

रनबीर–अहा! तू ही तो है!! गुरुद्वारा गिरनार है। अहा, तू ही तो है। सतगुरु देवदत्त की जय!!

नौजवान–अहा, आप महात्मा देवदत्त की गद्दी के चेले हैं। तब तो आप हम लोगों के गुरु हैं1!

(1. उस मकान के रहने वाले जिनका असल हाल आगे चलकर मालूम होगा सतगुरु देवदत्त की गद्दी को मानते थे और उस गद्दी के चेलों को गुरु के समान मानते और उनसे डरते थे। )

रनबीर–(ताज्जुब से) क्या तुम हमारे चेले हो?

नौजवान–केवल मैं ही नहीं बल्कि (मकान की तरफ इशारा करके) इस मकान में जितने आदमी रहते हैं सब सतगुरु देवदत्तजी की गद्दी को मानते हैं और आपके चेले हैं।

रनबीर–(हंसकर) तब तो हम अपनी राजधानी में आ पहुंचे!!

नौजवान–बेशक।

रनबीर–(आसमान की तरफ देख के) अहा! तू ही तो है!!

नौजवान–(रनबीर का पैर छूकर) अब आप कृपा करके मकान के अन्दर चलिए तो हम लोग आपका चरणामृत लेकर कृतार्थ हों।

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