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हौसला

मधुकांत

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :134
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9698
आईएसबीएन :9781613016015

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नि:शक्त जीवन पर 51 लघुकथाएं

समाज में बलात् बनाए गए अपंगों की संख्या भी बहुत है। इनमें हाथ से लूले, पैर से लंगड़े और अंधे बालकों की संख्या बहुत अधिक है।

समाज में फैले असामाजिक तत्व बच्चों को स्वार्थवश अपंग बनाकर इनसे भीख मंगवाते हैं। सही सलामत अंगों वाले बाल-वृद्ध को लोग दुत्कार कर परे भगा देते हैं जबकि अपंग या विकलांग सहानुभूति जगा कर आसानी से भीख प्राप्त करने में सफल हो जाता है। विकलांग व्यक्ति स्वयं भी विवशतावश भिक्षावृत्ति को आजीविका के रूप में अपना लेता है। हमारे देश में दान देकर गौरवान्वित अनुभव करने वालों की कमी नहीं। तात्पर्य यह कि सहानुभूति की ओट में मिली भिक्षा उन्हें परमुखापेक्षी और परावलम्बी बना देती है। असामाजिक तत्त्व बालक-बालिकाओं का अपहरण कर, उन्हें बलात् अपंग बनाकर उनसे भीख मंगवा कर मौज करते हैं। इस सामाजिक बुराई को भिक्षावृत्ति उन्मूलन कानून का कठोरता से पालन करके दूर किया जा सकता है।

हमारे देश में, मानसिक मंदता को छोड़कर, शारीरिक कार्यक्षमता 40 प्रतिशत से कम हो तो उसे विकलांग माना जाता है। मानव शरीर में शारीरिक अक्षमता अनेक प्रकार की समस्याओं को जन्म देती है। स्वयं के अतिरिक्त विकलांग बच्चे के परिवार के सदस्य भी उसकी विकलांगता से प्रभावित होते हैं। किसी भी कारण से लोगों में फैले विकलांगता के दोष से बचा नहीं जा सकता, परन्तु विकलांगता अभिशाप नहीं, हमें इसे एक चुनौती के रूप में लेना चाहिए। आजकल वैसे भी कृत्रिम हाथ-पैर लगाकर, किसी सीमा तक, शारीरिक पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। इनके लिए सरकार और समाजसेवी संस्थाओं द्वारा विशेष संस्थाएँ स्थापित कर इन्हें शिक्षण प्रशिक्षण देकर, इनके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करके सामाजिक कार्य व्यापार की धारा में इनकी साझेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। इनकी शिक्षा का प्रबंध छात्रावासों की बजाय, संभव हो तो घर में ही या घर के निकट हो ताकि इनका सम्पर्क माँ-बाप, भाई-बहन से निरन्तर बना रहे और ये अपने आपको समाज से कटा हुआ अनुभव न करें। भावनात्मक विकास के लिए इस प्रकार की व्यवस्था का होना जरूरी है, इससे इनका व्यक्तित्व एकान्त में अपनी विवश स्थिति पर बिसूरने वाला भयग्रस्त न होकर आशंका मुक्त हो सकेगा और ये उपेक्षा, उपहास का सामना करने का साहस अपने अन्दर जुटा सकेंगे। केवल सहानुभूति दिखाने की बजाय हमें इन्हें भरपूर सहयोग देकर, इनके मन में साथीपन का भाव विकसित करना चाहिए।

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