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आत्मतत्त्व
आत्मतत्त्व
प्रकाशक :
भारतीय साहित्य संग्रह |
प्रकाशित वर्ष : 2016 |
पृष्ठ :109
मुखपृष्ठ :
ईपुस्तक
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पुस्तक क्रमांक : 9677
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आईएसबीएन :9781613013113 |
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आत्मतत्त्व अर्थात् हमारा अपना मूलभूत तत्त्व। स्वामी जी के सरल शब्दों में आत्मतत्त्व की व्याख्या
आत्मा और ईश्वर
जो कुछ देश में है, उसका रूप है। देश का स्वयं रूप है। या तो तुम देश में हो या देश तुममें है। आत्मा समस्त देश से परे है। देश आत्मा में है, न कि आत्मा देश में।
रूप, देश और काल से सीमित है और कार्य-कारण नियम से बँधा हुआ है। समग्र काल हममें हैं। हम काल में नहीं हैं। चूंकि आत्मा देश और काल में नहीं है, इसलिए सभी देश और काल आत्मा के भीतर हैं। अत: आत्मा सर्वव्यापी है।
ईश्वर के सम्बन्ध में हमारी धारणा हमारी अपनी प्रतिच्छाया है। प्राचीन फारसी और संस्कृत में निकट का सम्बन्ध है।
ईश्वर के सम्बन्ध में आदिम धारणा प्रकृति के विभिन्न रूपों से उसका तादात्म्य कर देना था - प्रकृति-पूजा। अगली अवस्था में कबीलों के ईश्वर की पूजा हुई। इसके बाद की स्थिति में राजाओं की पूजा होने लगी। स्वर्गस्थ ईश्वर की धारणा भारत छोड़कर सभी जातिओं में प्रधान है। यह भाव बहुत ही असंस्कृत है।
जीवन के बने रहने का भाव मूर्खतापूर्ण है। जब तक हम जीवन से छुटकारा नहीं पाते, तब तक हम मृत्यु से छुट्टी नहीं पा सकते।
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