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व्यक्तित्व का विकास

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :134
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9606
आईएसबीएन :9781613012628

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मनुष्य के सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास हेतु मार्ग निर्देशिका


देह का नाश तो प्रतिक्षण होता रहता है और मन तो सदा बदलता रहता है। देह तो एक संघात है और उसी तरह मन भी। इसी कारण वे परिवर्तनशीलता के परे नही पहुँच सकते। परन्तु स्थूल जड़-तत्व के इस क्षणिक आवरण के परे और मन के भी सूक्ष्मतर आवरण के परे, मनुष्य का सच्चा स्वरूप - नित्यमुक्त, सनातन आत्मा अवस्थित है। उसी आत्मा की मुक्ति जड़ और चेतन के स्तरों में व्याप्त है और नाम-रूप द्वारा रंजित होते हुए भी सदा अपने अबाधित अस्तित्व को प्रमाणित करती है। उसी का अमरत्व, उसी का आनन्दस्वरूप, उसी की शान्ति और उसी का दिव्यत्व प्रकाशित हो रहा है और अज्ञान के मोटे-से-मोटे स्तरों के रहते हुए भी वह अपने अस्तित्व का अनुभव कराती रहती है। वही यथार्थ पुरुष है, जो निर्भय है, अमर है और मुक्त है।

अब मुक्ति तो तभी सम्मव है, जब कोई बाह्य शक्ति अपना प्रभाव न डाल सके, कोई परिवर्तन न कर सके। मुक्ति केवल उसी के लिए सम्भव है, जो सभी बन्धनों, सभी नियमों और कार्य-कारण की श्रृंखला से परे हो। कहने का तात्पर्य यह है कि एक अपरिवर्तनशील (पुरुष) ही मुक्त हो सकता है और इसीलिए अमर भी। यह पुरुष, यह आत्मा, मनुष्य का यह यथार्थ स्वरूप, मुक्त, अव्यय, अविनाशी, सभी बन्धनों से परे है और इसीलिए न तो जन्म लेता है, न मरता है।

प्रत्येक मानवीय व्यक्तित्व की तुलना काँच की चिमनी से की जा सकती है। प्रत्येक के अन्तराल में वही शुभ ज्योति है - दिव्य परमात्मा की आभा  - पर काँच के रंगों और उसकी मोटाई के अनुरूप उससे विकीर्ण होनेवाली ज्योति की किरणें विभिन्न रूप ले लेती हैं। प्रत्येक केन्द्रीय ज्योति का सौन्दर्य और आभा समान है, प्रतिभासिक असमानता केवल व्यक्त करनेवाले भौतिक साधनों की अपूर्णता के कारण है। आध्यात्मिक राज्य में हमारा ज्यों-ज्यों उत्तरोत्तर विकास होता जाता है, त्यों-त्यों वह माध्यम भी अधिकांश पारभासक होता जाता है।

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