भाषा एवं साहित्य >> पीढ़ी का दर्द पीढ़ी का दर्दसुबोध श्रीवास्तव
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संग्रह की रचनाओं भीतर तक इतनी गहराई से स्पर्श करती हैं और पाठक बरबस ही आगे पढ़ता चला जाता है।
हँसो
हँसो
खूब हँसो!
बस,
इतना ख्याल रखना कि
तुम्हारी-
उन्मुक्त हंसी
छीन न ले
किसी के होठों की-
बिन्दास मुस्कुराहट !
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