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नारी की व्यथा

नवलपाल प्रभाकर

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9590
आईएसबीएन :9781613015827

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मधुशाला की तर्ज पर नारी जीवन को बखानती रूबाईयाँ


95. कितनों ने खाया कितने चले गये


कितनों ने खाया कितने चले गये
पर ये चारों अभी तक जुटे रहे
उनको देख लग रहा था ये
शायद कई दिनों से भूखे थे।

उनको यूँ खाते देखकर
ममता मेरी रही थी छलक।

कलेजे पर हाथ मैं रखती हूँ
क्योंकि मैं इक नारी हूँ।


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