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नारी की व्यथा

नवलपाल प्रभाकर

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :124
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9590
आईएसबीएन :9781613015827

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मधुशाला की तर्ज पर नारी जीवन को बखानती रूबाईयाँ


103. तब अपने पुत्रों से मैं


तब अपने पुत्रों से मैं
पूछती हूँ हाल उनका
बारी-बारी उन चारों को
गले लगाकर माथा चूमा।

सांत्वना देकर उन सभी को
निश्चिंत किया मैंने सबको।

अब आँसू पोंछती जाती हूँ,
क्योंकि मैं इक नारी हूँ।


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