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कलंकिनी

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :259
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9584
आईएसबीएन :9781613010815

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यह स्त्री नहीं, औरत के रूप में नागिन है…समाज के माथे पर कलंक है।

पारस आश्चर्य में बैठा उसे देखता रहा, भाग्य इतना शीघ्र पलट सकता है, इसका उसे विश्वास न आ रहा था, द्वारकादास के प्रति उसकी कृतज्ञता श्रद्धा की सीमा तक पहुंच गई। यह मानव उसके लिए देवता का रूप लेकर आया था, दयालु तो वह प्रथम दिन से ही था किन्तु यह कृपा इतनी महान हो सकती है, यह वह सोच भी नहीं सकता था, मन-ही-मन आत्मग्लानि करने लगा कि इतने महान कृपा पर भी उसके मुख से ‘धन्यवाद’ का एक शब्द भी नहीं निकला।

द्वारकादास से पांच हजार रुपए लेकर पारस ने मां को भिजवा दिए, द्वारकादास ने उसे और भी देना चाहा किन्तु पारस ने यह कहकर इंकार कर दिया कि उसके लिए इतना ही पर्याप्त था।

द्वारकादास की चाल सफल हुई, ‘धन’ निर्धन की विवशता का क्या-क्या अनुचित लाभ नहीं उठाता। किस बेबसी का सौदा नहीं होता? कोई भी चीज खरीदी जा सकती—द्वारकादास ने चांदी के उन सिक्कों के बदले पारस को खरीद लिया, उसका प्रेम खरीद लिया, कितना स्वार्थ है इस जीवन में और कितने क्रूर स्वार्थ जिन्हें साधारण भोले-भाले व्यक्ति के लिए जानना प्रायः असंभव है।

फिर एक दिन वह आया जब द्वारकादास को इस सौदे के चुकता करने का अवसर मिला, वह बहुत दिनों से इसी अवसर की टोह में था जब पारस उसकी बात उसकी शर्त पर मानने के लिए तैयार हो जाए, पारस ने मासिक हिसाब देते हुए उसे कम्पनी के लाभ में एक लाख रुपए प्राप्ति की सूचना दी। यह सब उसी के अथक परिश्रम का परिणाम था। जब से द्वारकादास ने उस पर असाधारण कृपा की थी, स्वयं कम्पनी के प्रति उसकी कार्य-रुचि बढ़ गई थी। द्वारकादास की चतुर आंख भली-भांति इस परिश्रम के पीछे अपनी कृपा की झलक देख रही थी।

‘पारस। मुझे विश्वास नहीं आता कि इतने अल्प समय में तुम कामना की सूक्ष्मता को पा जाओगे।’

‘आपका स्नेहमय व्यवहार और कृपादृष्टि से सब कुछ हुआ है वरना मैं…।’

‘यह तुम्हारी ही योग्यता है—मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं और इसके उपलक्ष्य में तुम्हें कोई बहूमूल्य उपहार देना चाहता हूं।’

‘इसकी कदापि आवश्यकता नहीं सर। यह मेरा कर्तव्य था।’

‘आवश्यकता। तुम तो इससे अधिक के पात्र हो। तुमने अपना कर्तव्यपालन किया, अब मुझे अपना कर्तव्य निभाने दो। आशा है तुम मेरी भेंट को सहर्ष स्वीकार करोगे।’ द्वारकादास ने आंख छोटी करते हुए उसकी ओर देखा।

‘आपकी दी हुई भेंट मेरे प्राणों के साथ रहेगी।’ पारस का मन कृतज्ञता से भर आया।

‘मुझे यही आशा है तुम पर और सच तो यह है कि हम सबका सौभाग्य है।’

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