लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> एकाग्रता का रहस्य

एकाग्रता का रहस्य

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :31
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9561
आईएसबीएन :9781613012567

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

410 पाठक हैं

एकाग्रता ही सभी प्रकार के ज्ञान की नींव है, इसके बिना कुछ भी करना सम्भव नहीं है।


10.    एकाग्रता की प्राप्ति में उपयोगी एक अन्य महत्वपूर्ण साधन है – श्रद्धा। यह श्रद्धा या विश्वास बाहर से नहीं पाप्त की जा सकती, जिसे अंतःकरण से ही विकसित होना है। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति ने कभी न कभी अवश्य ही इस श्रद्धा शब्द को सुना होगा, परन्तु केवल कुछ लोग ही इस श्रद्धा की शक्ति से वे अपने चुने हुये मार्ग पर उन्नति करते हुये लक्ष्य तक पहुंच गये हैं। विश्वास में ऐसी ही शक्ति है। यह अध्यवसायी साधक को आगे ही आगे बढ़ाती रहती है, जब तक कि वह अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँच जाता। यहाँ कोई भी पूछ सकता है, “यह श्रद्धा ऐसी कौन सी बला है, जिसे आप इतना तूल दे रहे हैं?” मनुष्य की अपनी शक्ति व क्षमता को ही श्रद्धा कहते हैं। इसी को आत्मविश्वास भी कहा जाता है। सम्भव है कि किसी व्यक्ति की मांसपेशियां बड़ी ही मजबूत हों, परन्तु यदि उसे अपनी शक्ति पर विश्वास नहीं है, तो वे उसके किसी काम की नहीं होतीं। हनुमानजी समुद्र को लाँघने में सक्षम थे किन्तु वे चुप ही रहे क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं था कि इस कार्य की क्षमता उनमें विद्यमान है। परन्तु जब जामवन्त ने उनके विश्वास को जगाकर उन्हें उस शक्ति से परिचित कराया तो वे एक ही छलाँग में लंका जा पहुँचे।

प्रत्येक विद्यार्थी में अनन्त ज्ञान का अर्जन करने की एक अद्भुत क्षमता निहित है। इस बात में तो कोई सन्देह नहीं। बात केवल इतनी सी है कि छात्र को उसकी अपनी अन्तर्निहित शक्ति में सन्देह नहीं होना चाहिये। संशय ही श्रद्धा का प्रबल शत्रु है। ज्योंही किसी सन्देह का उदय होता है, त्योंही अन्तर्निहित शक्ति जवाब देने लगती है। इसके बाद उसके लिए केवल अपने भाग्य पर रोना ही शेष रह जाता है। इस अन्तर्निहित ज्ञान को प्रकट कैसे किया जाय? इसका उपाय है – नियमित तथा सुसम्बद्ध रूप से अध्ययन व चिन्तन करना। छात्र को इस प्रकार के दृढ़ संकल्प के साथ अध्ययन के लिए बैठना चाहिये, “मैं सावधानीपूर्वक अध्ययन करके निश्चित रूप से अपने ज्ञान में वृद्धि करूँगा।” यह एक ऐसा प्रभावी उपाय है, जिसके द्वारा मन स्वाभाविक रूप से एकाग्र हो जाता है। चाहे तो इसे आजमा कर देखा जा सकता है।

वस्तुतः श्रद्धा की महत्ता असीम है। अतः हमें मन ही मन कहना होगा – “हे श्रद्धा! तुम यदि साथ रहो, तो मेरी विजय सुनिश्चित है, और यदि चली जाओ तो मेरी असफलता तथा पतन अवश्यम्भावी है।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book