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ई-पुस्तकें >> एक नदी दो पाट

एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560
आईएसबीएन :9781613015568

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


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विनोद को टी-स्टेट की नौकरी में लगभग दो महीने हो चुके थे। इस बीच में वह वहाँ के लोगों से भली भाँति परिचित हो गया था। केथू की सहायता से वह उनके बहुत निकट आ गया। उसने वहाँ के काम-काज में कुछ ऐसे परिवर्तन करवा दिए थे जिनसे सबके विश्राम का समय भी निकल आता और काम भी पहले से अधिक होता।

उनके प्रति विनोद की यह सहानुभूति अंग्रेज़ अफसरों से छिपी न रह सकी; परन्तु काम पहले से अधिक हो रहा था इसलिए किसी को कुछ कहने का अवसर न मिला। विलियम ने एक-दो बार इस विषय पर वाद-विवाद आरम्भ भी किया; परन्तु विनोद ने उसे निरन्तर चुप रहने पर विवश कर दिया। वह जानता था कि ये लोग उन्हें सदा के लिए कुचल देना चाहते थे ताकि वे कभी भी यह न सोच सकें कि उनकी यह धरती उनके लिए सोना भी उगल सकती है।

वह क्लब के बरामदे में बैठा इन्हीं उलझनों को सुलझाने में लगा हुआ था। उसके सामने दूर तक फैली हुई विशाल स्टेट थी जिसका वह अब एक महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि था। दूर तक लहराते हुए खेत सरसराती हुई हवा में नृत्य कर रहे थे। सर्वत्र शान्ति थी।

उसके कानों में बार-बार उस गेंद की ठोकर की ध्वनि आती जिसे माधवी भीतर बिलियर्ड टेबल पर चोट लगा रही थी। उसे खेलों का बड़ा चाव था; परन्तु विनोद को इन बातों में कोई रुचि न थी। आज भी वह खेलने बैठी तो विनोद बरामदे में जा बैठा। उसी समय विलियम वहाँ आ पहुँचा और विनोद के सामने कुर्सी खींचकर बैठ गया।

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