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ई-पुस्तकें >> एक नदी दो पाट

एक नदी दो पाट

गुलशन नन्दा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :323
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9560
आईएसबीएन :9781613015568

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'रमन, यह नया संसार है। नव आशाएँ, नव आकांक्षाएँ, इन साधारण बातों से क्या भय।


32


ज्योंही उसने अतिथि का बेसुध सिर नीचा किया और लहू से भरी दाढ़ी को पानी से साफ किया वह सहसा चौंककर रह गई। ज्यों-ज्यों उसकी उँगलियाँ उसके मुख पर से लहू साफ करती गईं। उसे यों प्रतीत हो रहा था मानो उसके मस्तिष्क से धीरे-धीरे पर्दे हट रहे हों।

जाना-पहचाना मुख...बालों की सफेदी और दाढ़ी के नकाब में छिपी हुई उसके देवता की तस्वीर...उसके हाथ-पाँव काँपने लगे, होंठ थरथराने लगे। उसकी घबराई हुई दृष्टि कभी उसपर और कभी सामने टंगी तस्वीर पर पड़ती। मुखर्जी के रूप में उसका अपना स्वामी! जिसका मार्ग देखते-देखते उसकी आँखें पथरा गई थीं। जिसकी स्मृति में उसने बहारों के सब फूल चुनकर उसकी तस्वीर पर चढ़ा दिए थे! आज भाग्य उसे लाया भी तो कैसे! यह सोचकर वह पागलों की भाँति रोने लगी। वह वेसुध था, परन्तु कामिनी की सुध लौटने लगी। वह उसके पाँव पर सिर रखकर खो गई।

बाहर आहट हुई और वह सँभलकर उठ खड़ी हुई। अभी तक वह बेसुध पड़ा था। उसके आँसू रुक गए। उसकी हिचकियाँ रुक गईं अरि वह मूर्ति बनी उस शरीर को देखने लगी जिसने उसे सुहाग में ही विधवा के वस्त्र पहनने पर विवश कर दिया था।

रमन डॉक्टर को ले आया था। कामिनी ने धैर्य से काम लिया और दूसरे कमरे में चली आई। नौकर बर्फ ले आया और रमन से आदेश लेने के लिए उसी कमरे में चला आया।

अब वह गम्भीर हो चुकी थी। उसकी आँखें पथरा गई थीं। भावनाएँ ठण्डी पड़ चुकी थीं, उस बर्फ के टुकड़े के समान जो उसके सामने फर्श पर पिघला जा रहा था। उसमें इतना बल न था कि झुककर इस बर्फ के टुकड़े को सँभाल लेती।

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