ई-पुस्तकें >> भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्आदि शंकराचार्य
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ब्रह्म साधना के साधकों के लिए प्रवेशिका
कामं क्रोधं लोभं मोहं,
त्यक्त्वाऽत्मानं पश्यति सोऽहम्।
आत्मज्ञान विहीना मूढाः,
ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥26॥
(भज गोविन्दं भज गोविन्दं,...)
काम, क्रोध, लोभ और मोह को छोड़ कर साधक अपने अन्दर ‘सोहम्’ (वह मैं हूँ) का अनुभव करता है। जिनको यह आत्मज्ञान नहीं है, वे मूर्ख हैं – वे यमलोक में बन्दी की तरह प्रताड़ित होते हैं ॥26॥
(गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो,.....)
kaamam krodham lobham moham
tyaktvaa atmaanam bhaavaya ko aham
aatmagyaana vihiinaa muudhaah
te pachyante narakaniguudhaah ॥26॥
Give up desires, anger, greed and delusion. Ponder over your real nature . Those devoid of the knowledge of self come in this world, a hidden hell, endlessly. ॥26॥
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