उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
राजप्रासाद में अब केवल स्त्रियाँ ही रहती थी। अतः पुरुष केवल राज्य-रक्षार्थ प्रासाद के बाहरी भाग में रहते थे। राजमाता पुरुष अभ्यागतों से मिलने के लिए, प्रासाद के इसी विभाग के एक विशाल आगार में आ जाती थीं। मेरे लिए विशेष भेंट दी गई थी। अतः उस विशाल आगार में मुझको ले जाकर बैठा दिया गया। मुझको एक घड़ी भर प्रतीक्षा करनी पड़ी और राजमाता सत्यवती पधारी। सत्यवती की रूप-रेखा से मेरे मन पर कुछ भी प्रभाव उत्पन्न नहीं हुआ। वे एक साधारण कद की और गंदगी रंग की स्त्री थीं, जो समय से पूर्व ही वृद्धावस्था को प्राप्त हो गई प्रतीत होती थीं।
वे आईं तो मैंने उठकर आदरयुक्त मुद्रा में हाथ जोड़ नमस्कार की। वे बैठी और मुझको अपने सामने आसन पर बैठने का आदेश देकर कहने लगीं, ‘‘देवव्रत ने बताया है कि आप मुझको वर्तमान कठिनाई से निकालने के विषय में कुछ कहना चाहते हैं।’’
बात के इस प्रकार आरम्भ होने को मैं पसन्द नहीं करता था। इसका अर्थ यह था कि मैं उनके राज-परिवार के विषय में अनधिकार हस्तक्षेप कर रहा हूँ। मैंने बात को स्पष्ट करने के लिए कह दिया, ‘‘माताजी! मैं इस राज्य में सेवा-कार्य प्राप्त करने के विचार से आया था। श्रीमान राजकुमारजी की सेवा में उपस्थिति हुआ तो उन्होंने मुझे, बिना किसी विशेष कार्य पर नियुक्ति किए, सेवा में ले लिया है। बातों-ही-बातों में उन्होंने महाराज चित्रांगद जी के असामाजिक देहावसान से उत्पन्न परिस्थिति पर पूछा, तो मैंने निवेदन कर दिया था कि साम्राज्य को गणराज्य में परिवर्तित कर दिया जाए। समय पाकर प्रजा में से कोई ऐसा महानात्मा उत्पन्न हो जायेगा, जो पुनः किसी राज-परिवार की स्थापना कर सकेगा। इस पर राजकुमार जी ने कहा था कि राज्य आपका है और आप ही इस विषय में आज्ञा कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा था कि मैं यह प्रस्ताव आपके सम्मुख रखूँ। ऐसा आदेश होने पर मैं आपसे मिलना चाहता था।’’
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