उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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मुझको राजप्रासाद के पार्श्व में निवास पाये एक मास से ऊपर हो चुका था, परन्तु अभी तक मुझे कोई काम नहीं बताया गया था। न ही राजमाता ने मुझसे मिलने की इच्छा प्रकट की थी। मैं नित्य नमस्कार करने राजकुमार देवव्रत के आगार में जाता था। कभी-कभी तो राजकुमार राज्य-प्रबन्ध में लीन होते थे। इस पर भी मुझको भीतर बुलाकर सामने बैठा लेते थे। मैं बैठ जाता था, परन्तु मैंने कभी भी बिना पूछे, किसी प्रकार की सम्मति प्रकट नहीं की थी। इस पर भी वे राज्य-कार्य मेरे सम्मुख करते रहते थे।
मैं देख रह था कि देवव्रतजी के प्रायः कार्य धर्मानुकुल ही थे धर्म का अर्थ मैं यम-नियमानुसार होने को मानता था। इस पर भी जब कहीं राज्य-परिवार के हानि-लाभ का प्रश्न उपस्थित होता तो वे धर्म को भूलकर राज्य-परिवार के स्वार्थ से प्रभावित हो जाते थे। मुझको उनकी ये बातें अनुचित प्रतीत होती थीं, इस पर भी अपने निश्चयानुसार बिना पूछे, सम्मति देने को मैं तैयार नहीं था। वे मुझसे कभी सम्मति नहीं माँगते थे।
एक दिन मैंने कहा भी कि मेरी इच्छा राजमाता के दर्शन करने की हो रही है। इस पर उन्होंने कह दिया, ‘‘उनको आपकी इच्छा का ज्ञान है। वे जब उचित समझेंगी, आपको बुला लेंगी।’’
इसके पश्चात् इस दिशा में भी करने को कुछ नहीं रहा। परन्तु एक दिन, जब मैं स्नान-पूजादि से निवृत्त हो भोजनालय में भोजन के निमित्त जा रहा था, एक दासी मुझे राजमाता के पास ले जाने के लिए आ गई। मैं तुरन्त तैयार हो उसके साथ चल पड़ा।
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