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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
‘‘मैं उस जीवन में नहीं रह सकती, रजनी बहन! वे जुआ खेलते हैं, शराब पीते हैं और इसके लिए रिश्वत लेते हैं।’’
‘‘सत्य? सिद्ध कर सकती हो अपनी बात?’’
‘‘कर सकने का प्रश्न ही नहीं। प्रश्न तो इस बात का होना चाहिए कि करूँगी या नहीं करूँगी? मैं यह सिद्ध नहीं करूँगी। मुझको सिद्ध करने में कुछ प्रयोजन भी नहीं। मैं उनको छोड़ आई हूँ।’’
‘‘तो तुम अपने मन में उनको तलाक दे आई हो?’’
‘‘नहीं, तलाक इस अवस्था को प्रकट नहीं करता। तलाक तो उस समय दिया जाता है जब स्त्री को दूसरा विवाह करना हो। मैंने तो सेपरेशन (पृथकता) स्वीकार की है। हिन्दू होने के नाते वे दूसरा विवाह इस अवस्था में भी कर सकते हैं।’’
अगले दिन रजनी मोटर में लखनऊ जा पहुँची। अपने घर जाने से पूर्व वह इन्द्र की कोठी पर चली गई। इन्द्र दफ्तर जाने को तैयार खड़ा था। रजनी को आया देख वह मोटर में सवार होता-होता रुक गया। रजनी की गाड़ी धूल से भरी थी। इस कारण इन्द्र ने विस्मय में पूछ लिया, ‘‘कहाँ से आ रही हो, रजनी?’’
‘‘दुरैया से।’’
‘‘क्या हाल-चाल है वहाँ?’’
‘‘अच्छा ही है। मैं तुमसे पाँच मिनट के लिए बात करने आई हूँ।’’
इन्द्रनारायण ने घड़ी में समय देखा और कुछ विचारकर कहा, ‘‘क्या यह बातचीत सायंकाल तक स्थगित नहीं हो सकती?’’
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