लोगों की राय

उपन्यास >> पाणिग्रहण

पाणिग्रहण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :651
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 8566
आईएसबीएन :9781613011065

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

410 पाठक हैं

संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव


‘‘मैं उस जीवन में नहीं रह सकती, रजनी बहन! वे जुआ खेलते हैं, शराब पीते हैं और इसके लिए रिश्वत लेते हैं।’’

‘‘सत्य? सिद्ध कर सकती हो अपनी बात?’’

‘‘कर सकने का प्रश्न ही नहीं। प्रश्न तो इस बात का होना चाहिए कि करूँगी या नहीं करूँगी? मैं यह सिद्ध नहीं करूँगी। मुझको सिद्ध करने में कुछ प्रयोजन भी नहीं। मैं उनको छोड़ आई हूँ।’’

‘‘तो तुम अपने मन में उनको तलाक दे आई हो?’’

‘‘नहीं, तलाक इस अवस्था को प्रकट नहीं करता। तलाक तो उस समय दिया जाता है जब स्त्री को दूसरा विवाह करना हो। मैंने तो सेपरेशन (पृथकता) स्वीकार की है। हिन्दू होने के नाते वे दूसरा विवाह इस अवस्था में भी कर सकते हैं।’’

अगले दिन रजनी मोटर में लखनऊ जा पहुँची। अपने घर जाने से पूर्व वह इन्द्र की कोठी पर चली गई। इन्द्र दफ्तर जाने को तैयार खड़ा था। रजनी को आया देख वह मोटर में सवार होता-होता रुक गया। रजनी की गाड़ी धूल से भरी थी। इस कारण इन्द्र ने विस्मय में पूछ लिया, ‘‘कहाँ से आ रही हो, रजनी?’’

‘‘दुरैया से।’’

‘‘क्या हाल-चाल है वहाँ?’’

‘‘अच्छा ही है। मैं तुमसे पाँच मिनट के लिए बात करने आई हूँ।’’

इन्द्रनारायण ने घड़ी में समय देखा और कुछ विचारकर कहा, ‘‘क्या यह बातचीत सायंकाल तक स्थगित नहीं हो सकती?’’

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book