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उपन्यास >> पाणिग्रहण

पाणिग्रहण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :651
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 8566
आईएसबीएन :9781613011065

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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव


रामाधार का माथा ठनका। वह समझ गया कि इन्द्र में कुछ बहुत बड़ी खराबी आ गई है। अतः वह रजनी से पृथक् में पूछने लगा, ‘‘रजनी! ठीक-ठीक बताओ, लखनऊ मे क्या हो रहा है जो शारदा वहाँ नहीं रह सकी?’’

‘‘काका! इन्द्र दो वर्ष से ऊपर यूरोप रहकर आया है। वह वहाँ के रहन-सहन को पसन्द करता है। वह रहन-सहन मुझको पसन्द नहीं। कदाचित् शारदा को भी पसन्द नहीं। मैंने उससे मेल-जोल बन्द कर रखा है और अब शारदा उसे छोड़ आई है। मैं रात-भर उसके पास रहकर पूर्ण वृत्तान्त जानने का यत्न करूँगी और पीछे यदि सम्भव हो सका तो इन्द्र से मिलकर सुलह करवाने का यत्न करूँगी।’’

रात को रजनी और शारदा में खुलकर बातें हुई। शारदा ने बताया, ‘‘मेरा अधिकार नहीं कि मैं किसी को ऐसा जीवन व्यतीत करने के लिए कहूँ, जैसा कि मैं स्वयं व्यतीत करती हूँ, अथवा जैसा मैं पसन्द करती हूँ। इसी प्रकार किसी अन्य को भी यह अधिकार नहीं कि वह मुझको ऐसा जीवन व्यतीत करने के लिए कहे, जिसको मैं पसन्द नहीं करती। वे यूरोप जाने से पूर्व अपने समान मुझको पदवी देते थे। अब मुख से तो कहते हैं कि हम आजाद हो गए हैं, परन्तु मुझको विवश करते हैं कि मैं भी क्लब में जाऊँ और वहाँ के आवारा सदस्यों और मूर्ख स्त्रियों से मिलूँ।

‘‘वे कहते हैं कि मेरे पाप-कुण्ड में जाने से उनको लाभ होगा। इस कारण मैं उनका घर छोड़ आई हूँ ताकि वह जीवन को पसन्द करने वाली किसी लड़की से विवाह कर लें।’’

‘‘तो तुम अब पुनः उसके पास नहीं जाने का विचार नहीं रखतीं?’’

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