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उपन्यास >> पाणिग्रहण

पाणिग्रहण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :651
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 8566
आईएसबीएन :9781613011065

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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव


बैर खाना लगाने लगा तो आनन्द ने कह दिया, ‘‘तीन के लिए।’’

रजनी आयी तो शारदा को वहाँ देख बहुत प्रसन्न हुई। उसने कह दिया, ‘‘भाभी! आज तो कुछ बाँटना पड़ेगा, जो तुमको हमारी याद आयी है।’’

‘‘मैं लज्जित हूँ।’’ शारदा ने आँखें नीचे किए हुए कहा, ‘‘अब ऐसी भूलें न हुआ करेंगी। परन्तु रजनी बहन! तुमको मैं न आने का उलाहना नहीं दे सकती। मैं देख रही हूँ कि तुमको वास्तव में बहुत काम रहता है। आज एक औरत, जिसका नाम ऐना है, मिली थी। वह भी तुम्हारे काम के विषय में बताती थी।’’

‘‘तो वह तुमसे मिली है?’’ रजनी ने गम्भीर होकर कह दिया।

शारदा चुप रही। वह उसकी बात मिस्टर आनन्द के सामने कहना नहीं चाहती थी। लंच लिया गया। मिस्टर आनन्द पन्द्रह मिनट के लिए आरामकुर्सी पर बैठ आराम करता रहा। पश्चात् अपनी मोटर में सवार होकर चला गया। उसे इस समय कॉलेज जाना था।

रजनी शारदा को लेकर अपने कमरे में चली गयी। वहाँ पहुँच शारदा ने पूछ लिया, ‘‘तुम योग-दर्शन पढ़ती हो?’

‘‘हाँ। और कुछ-कुछ अभ्यास भी करती हूँ, भाभी! मुझमें तो यह परिवर्तन हुआ है कि मैं अपनी मेडिकल साइसं के विषय में संशित हो गयी हूँ। उसको अभी बहुत पिछड़ी विद्या मानने लगी हूँ। परन्तु इन्द्र को देख उसमें दूसरा ही परिवर्तन पाती हूँ। वह बाहरी आडम्बर में विश्वास करने लगा है।’’

इस भूमिका से इन्द्रनारायण के विषय में बातचीत आरम्भ हो गयी।

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