लोगों की राय

उपन्यास >> पाणिग्रहण

पाणिग्रहण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :651
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 8566
आईएसबीएन :9781613011065

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

410 पाठक हैं

संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव


रजनी घर पर नहीं थी। उसका पति भी कॉलेज गया हुआ था। रजनी का बच्चा ‘आया’ के पास खेल रहा था। शारदा मोटर से उतरी तो आया ने बच्चे को गोदी में उठा लिया और पास आकर बोली, ‘‘मालकिन अभी-अभी अपनी मोटर में मोती बाग में गयी हैं। वहाँ कोई बीमार था।’’

शारदा ने विचार किया कि रजनी की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अतः वह ड्राइंग-रूम खुलवा, वहाँ जाकर बैठ गयी। वहाँ एक मेडिकल जर्नल पड़ा था। उसे उठाकर वह पढ़ने लगी। जब उसमें उसे कुछ रस न आया तो वह रजनी के कमरे में कोई पुस्तक देखने के लिए चली आयी। वहाँ योग-दर्शन पड़ा था। उसने उसको उठा लिया और पढ़ने लगी। इसको वह कुछ-कुछ समझ रही। समय व्यतीत करने के लिए वह उसे पढ़ने लगी। ठीक एक बजे बाहर मोटर आयी। उसने समझा रजनी होगी, परन्तु वह प्रोफेसर आनन्द था। आनन्द ने शारदा को देखा तो आगे बढ़कर कह दिया, ‘‘भाभी! कैसे मार्ग भूल गयी हो आज?’’

‘‘साहब दौरे पर गए हैं। बच्चे स्कूल गए हुए हैं। मैं कुछ उदासी अनुभव कर रही थी, सो रजनी बहन से मिलने चली आयी हूँ। परन्तु वह तो यहाँ है ही नहीं।’’

‘‘अभी आ रही है। अक मजदूर की बीवी को डिलीवरी में कष्ट हो रहा था। वह उसको अपनी मोटर में हस्पताल में ले गयी है। वहाँ उसका ऑपरेशन हुआ है। अभी पन्द्रह-बीस मिनट का काम शेष था। मैं चला आया हूँ। वह आती ही होगी।’’

शारदा विचार करती थी कि कितना उपयोगी जीवन है रजनी और उसके पति का! वह स्वयं तथा उसका पति क्या करते हैं? लोक-कल्याण का कुछ भी तो काम नहीं कर रहे। उसके मन में अपने पति के लिए ग्लानि अनुभव होने लगी थी।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book