उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
‘‘परन्तु गाँव में निन्दा जो होगी?’’
‘‘यह निन्दा यदि हमारे भाग्य में बदी है तो होगी। इस निन्दा का कारण बहू है अथवा विष्णु, यह जाँच का विषय है। कारण कुछ भी हो, यह तो अब होगी। यह हमारा कर्म-फल है।’’
‘‘तो फिर बहू का त्याग उचित नहीं?’’
‘‘कैसे त्याग दोगे? उसका दूसरा विवाह हो ही नहीं सकता। उसने तुम्हारे साथ सप्तपदी ली है। अब अन्य किसी से वह ले नहीं सकती।’’
‘‘परन्तु बाबा! मैं तो परस्पर के सम्बन्ध की बात कर रहा हूँ?’’
‘‘यह तुम दोनों के बीच की बात है। इसमें मैं अथवा कोई अन्य सम्मति नहीं दे सकता।’’
‘‘परन्तु लोक-निन्दा से कैसे बचा जा सकता है?’’
‘‘तो क्या इस सम्बन्ध के न मानने से निन्दा शांत हो जायेगी? मैं तो यह समझता हूँ कि यह तुम्हारी बहू और तुम्हारे लिये परीक्षा का काल है। निन्दा शान्त होगी, यदि हमारा और उसका व्यवहार ठीक रहेगा। हम परीक्षा में तभी सफल होंगे।’’
‘‘हम और वह कैसा व्यवहार करें, जो ठीक हो और जिससे निन्दा भी शान्त हो जाये?’’
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