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कर्मभूमि (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :658
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8511
आईएसबीएन :978-1-61301-084

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प्रेमचन्द्र का आधुनिक उपन्यास…


इस वक़्त तक बहुत से पंडे पुजारी जमा हो गये थे। सब-के-सब लाठियों के कुन्दों से भीड़ को हटाने लगे। लोगों में भगदड़ पड़ गयी। कोई पूरब भागा, कोई पच्छिम शान्तिकुमार के सिर पर भी एक डंडा पड़ा पर वह अपनी जगह पर खड़े आदमियों को समझाते रहे–‘भागो मत, भागो मत, सब-के-सब वहीं बैठ जाओ, ठाकुरजी के नाम पर अपने को बलिदान कर दो। धर्म के लिए...’

पर दूसरी लाठी सिर पर इतने ज़ोर से पड़ी कि पूरी बात भी मुँह से न निकलने पाई और वह गिर पड़े। सँभलकर फिर उठना चाहते थे कि ताबड़तोड़ कई लाठियाँ पड़ गयीं। यहाँ तक कि वह बेहोश हो गये।

नैना बार-बार द्वार पर आती है और समरकान्त को बैठे देखकर लौट जाती है। आठ बज गये और लालाजी अभी तक गंगा-स्नान करने नहीं गये। नैना रात भर करवटें बदलतीं रही। उस भीषण घटना के बाद क्या वह सो सकती थी? उसने शान्तिकुमार को चोट खाकर गिरते देखा। पर निर्जीव-सी खड़ी रही थी। अमर ने उसे प्रारम्भिक चिकित्सा की मोटी-मोटी बातें सिखा दी थीं। पर वह उस अवसर पर कुछ भी तो न कर सकी। वह देख रही थी कि आदमियों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया है। फिर उसने देखा कि डॉक्टर आया और शान्तिकुमार को एक डोली पर लेटाकर ले गया; पर वह अपनी जगह से नहीं हिली। उसका मन किसी बँधुए पशु की भाँति बार-बार भागना चाहता था। पर वह रस्सी को दोनों हाथों से पकड़े हुए पूरे बल के साथ उसे रोक रही थी। कारण क्या था? संकोच।

आख़िर उसने कलेजा मज़बूत किया और द्वार से निकलकर बरामदे में आ गयी।

समरकान्त ने पूछा–‘कहाँ जाती है?’

‘ज़रा मन्दिर तक जाती हूँ।’

‘वहाँ का तो रास्ता ही बन्द है। जाने कहाँ से चमार–सियार आकर द्वार पर बैठे हैं। किसी को जाने ही नहीं देते। पुलिस खड़ी उन्हें हटाने का यत्न कर रही है, पर अभागे कुछ सुनते ही नहीं। यह सब उसी शान्तिकुमार का पाजीपन है। आज वही इन लोगों का नेता बना हुआ है। विलायत जाकर धर्म तो खो ही आया था। अब यहाँ हिन्दू-धर्म की जड़ खोद रहा है। न कोई आचार न विचार, उसी शोहदे सलीम के साथ खाता-पीता है। ऐसे धर्मद्रोहियों को और क्या सूझेगी? इन्हीं सभी की सोहबत ने अमर को चौपट किया, इसे न जाने किसने अध्यापक बना दिया?’

नैना ने दूर से ही यह दृश्य देखकर लौट आने का बहाना किया और मन्दिर की ओर चली। फिर कुछ दूर के बाद एक गली में होकर अस्पताल की ओर चल पड़ी। दाहिने-बायें चौकन्नी आँखों से ताकती हुई वह तेज़ी से चली जा रही थी, मानो चोरी करने जा रही हो।

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