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ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :268
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8459
आईएसबीएन :978-1-61301-068

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उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…


हरिधन चट उठ बैठा और तीव्र स्वर में बोला–क्या तुम लोगों ने मुझे उल्लू समझ लिया है?

दोनों साले हक्का-बक्का रह गये। जिस आदमी ने कभी जबान नहीं खोली, हमेशा गुलामों की तरह हाथ बाँधे हाजिर रहा, वह आज एकाएक इतना आत्माभिमानी हो जाय, यह उनको चौंका देने के लिए काफी था। कुछ जवाब न सूझा।

हरिधन ने देखा, इन दोनों के क़दम उखड़ गये हैं, तो एक धक्का और देने की प्रबल इच्छा को न रोक सका। उसी ढंग से बोला–मेरी भी आँखें हैं। अन्धा नहीं हूँ, न बहरा ही हूँ। छाती फाड़ कर काम करूँ और उस पर भी कुत्ता समझा जाऊँ; ऐसे गधे कहीं और होंगे!

अब बड़े साले भी गर्म पड़े–तुम्हें किसी ने यहाँ बाँध तो नहीं रखा है।

अब की हरिधन लाजवाब हुआ। कोई बात न सूझी।

बड़े ने फिर उसी ढंग से कहा–अगर तुम यह चाहो कि जन्म भर पाहुने बने रहो और तुम्हारा वैसा ही आदर-सत्कार होता रहे, तो यह हमारे बस की बात नहीं है।

हरिधन ने आँखें निकाल कर कहा–क्या मैं तुम लोगों से कम काम करता हूँ?

बड़े–यह कौन कहता है?

हरिधन–तो तुम्हारे घर की यही नीति है कि जो सबसे ज्यादा काम करे वही भूखों मारा जाय?

बड़े–तुम खुद खाने नहीं गये। क्या कोई तुम्हारे मुँह में कौर डार देता?

हरिधन ने ओठ चबा कर कहा–मैं खुद खाने नहीं गया!  कहते तुम्हें लाज नहीं आती।

‘नहीं आयी थी बहन तुम्हें बुलाने?’

हरिधन की आँखों में खून उतर आया; दाँत पीस कर रह गया। छोटे साले ने कहा–अम्माँ भी तो आयी थीं। तुमने कह दिया, मुझे भूख नहीं तो क्या करतीं?

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