|
कहानी संग्रह >> ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह) ग्राम्य जीवन की कहानियाँ (कहानी-संग्रह)प्रेमचन्द
|
221 पाठक हैं |
|||||||
उपन्यासों की भाँति कहानियाँ भी कुछ घटना-प्रधान होती हैं, मगर…
गुमानी माता के सिर से जू निकाल रही थी। सुलगते हुए हृदय से बोली–निकम्मे आदमी को खाने के सिवा और क्या रहता है!
बड़े–खाने की कोई नहीं। जिसकी जितनी भूख हो उतना खाय, लेकिन कुछ पैदा भी करना चाहिए। यह नहीं समझते कि पहनई में किसी के दिन कटे हैं!
छोटे–मैं तो एक दिन कह दूँगा, अब अपनी राह लीजिए, आपका करजा नहीं खाया है।
गुमानी घरवालों की ऐसी-ऐसी बातें सुन कर अपने पति से द्वेष करने लगी थी। अगर वह बाहर से चार पैसे लाता, तो इस घर में उसका कितना मान-सम्मान होता, वह भी रानी बन कर रहती। न जाने कहीं बाहर जा कर कमाते उनकी नानी मरती है। गुमानी की मनोवृत्तियाँ तभी तक बिलकुल बालपन की सी थीं। उसका अपना कोई घर न था। उसी घर का हित-अहित उसके लिए भी प्रधान था। वह भी उन्हीं शब्दों पर विचार करती, इस समस्या को उन्हीं आँखों से देखती जैसे उसके घरवाले देखते थे। सच तो, दो हज़ार रुपये में क्या किसी को मोल ले लेंगे। दस साल में दो हज़ार होते ही क्या हैं? दो सौ ही तो साल भर में हुए। क्या दो आदमी साल भर में दो सौ भी न खायेंगे? फिर कपड़े-लत्ते, दूध-घी, सभी कुछ तो है। दस साल हो गये, एक पीतल का छल्ला नहीं बना। घर से निकलते तो जैसे इनके प्रान निकलते हैं। जानते हैं, जैसे पहले पूजा होती थी वैसे ही जनम भर होती रहेगी। यह नहीं सोचते कि पहले और बात थी, अब और बात है। बहू ही पहले ससुराल जाती है तो उसका कितना महामह होता है। उसके डोली से उतरते ही बाजे बजते हैं, गाँव-मुहल्ले की औरतें उसका मुँह देखने आती हैं और रुपये देती हैं। महीनों उसे घर भर से अच्छे खाने को मिलता है, अच्छा पहनने को, काम नहीं लिया जाता; लेकिन छः महीने के बाद कोई उसकी बात भी नहीं पूछता; वह घर भर की लौंडी हो जाती है। उनके घर में मेरी भी तो वही गति होती। फिर काहे का रोना। जो यह कहो कि मैं तो काम करता हूँ तो तुम्हारी भूल है, मजूर की और बात है।
उसे आदमी डाँटता भी है, मारता भी है, जब चाहता है, रखता है, जब चाहता है, जब निकाल देता है। कस कर काम लेता है। यह नहीं कि जब जी में आया कुछ काम किया, जब आया, पड़ कर सो रहे।
हरिधन अभी पड़ा अन्दर ही अन्दर सुलग रहा था कि दोनों साले बाहर आये और बड़े साहब बोले–भैया, उठो, तीसर, पहर ढल गया, कब तक सोते रहोगे? सारा खेत पड़ा हुआ है।
|
|||||











