चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

नौवाँ बयान

रात पहर-भर से ज्यादा जा चुकी है। काशी में मनोरमा के मकान के अन्दर फर्श पर नागर बैठी हुई है और उसके पास ही एक नौजवान खूबसूरत आदमी छोटे-छोटे तीन-चार तकियों का सहारा लगाये अधलेटा-सा पड़ा ज़मीन की तरफ़ देखता कुछ सोच रहा है। इन दोनों के सिवाय कमरे में कोई तीसरा नहीं है।

नागर : मैं फिर भी तुम्हें कहती हूँ कि किशोरी का ध्यान छोड़ दो, क्योंकि इस समय मौका समझकर मायारानी ने उसे आराम के साथ रखने का हुक्म दिया है।

जवान : ठीक है, मगर मैं उसे किसी तरह की तकलीफ तो नहीं देता, फिर उसके पास मेरा जाना तुमने क्यों बन्द कर दिया?

नागर : बड़े अफसोस की बात है कि तुम मायारानी की तरफ़ कुछ भी ध्यान नहीं देते! जब भी तुम किशोरी के सामने जाते हो वह जान देने के लिए तैयार हो जाती है। तुम्हारे सबब से वह सूखकर काँटा हो गयी है। मुझे निश्चय है कि दो-तीन दफे अगर तुम और उसके सामने जाओगे तो वह जीती न बचेगी, क्योंकि उसमें अब बात करने की भी ताकत नहीं रही और उसका मरना मायारानी के हक में बहुत ही बुरा होगा। जब तक किशोरी को यह निश्चय न होगा कि तुम इस मकान से निकाल दिये गये, तब तक वह मुझसे सीधी तरह बात भी न करेगी।

ऐसी अवस्था में मायारानी की आज्ञानुसार मैं उसे क़ैद रखने की अवस्था में भी क्योंकर खुश रख सकती हूँ?

जवान : (कुछ चिढ़कर) यह बात तो तुम कई दफे कह चुकी हो, फिर घड़ी-घड़ी क्यों कहती हो?

नागर : ख़ैर, न सही सौ की सीधी एक ही कहे देती हूँ कि किशोरी के बारे में तुम्हारी मुराद पूरी न होगी और जहाँ तक जल्द हो सके, तुम्हें मायारानी के पास चले जाना पड़ेगा।

जवान : यदि ऐसा ही है तो लाचार होकर मुझे मायारानी के साथ दुश्मनी करनी पड़ेगी। मैं उसके कई ऐसे भेद जानता हूँ कि उन्हें प्रकट करने में उसकी कुशल नहीं है।

नागर : अगर तुम्हारी यह नीयत है तो तुम अभी जहन्नुम भेज दिये जाओगे।

जवान : तुम मेरा कुछ भी नहीं कर सकती, मैं तुम्हारी जहरीली अँगूठी से डरने वाला नहीं हूँ।

इतना कहकर वह नौजवान उठ खड़ा हुआ और कमरे के बाहर निकला ही चाहता था कि सामने का दरवाज़ा खुला और भूतनाथ आता हुआ दिखायी दिया। नागर ने जवान की तरफ़ इशारा करके भूतनाथ से कहा, "देखो इस नालायक को मैं पहरों से समझा रही हूँ, मगर कुछ भी नहीं सुनता और जान-बूझकर मायारानी को मुसीबत में डालना चाहता है!" इसके जवाब में भूतनाथ ने कहा, "हाँ, मैं भी पिछले दरवाज़े की तऱफ खड़ा-खड़ा इस हरामज़ादे की बातें सुन रहा था!"

"हरामज़ादे" का शब्द सुनते ही उस नौजवान को क्रोध चढ़ आया और वह हाथ में खंजर लेकर भूतनाथ की तरफ़ झपटा। भूतनाथ ने चालाकी से उसकी कलाई पकड़ ली और कमरबन्द में हाथ डालके ऐसी अड़ानी मारी कि वह धम्म से ज़मीन पर गिर पड़ा। नागर दौड़ी हुई बाहर चली गयी और एक मजबूत रस्सी ले आयी, जो उस नौजवान के हाथ-पैर बाँधने के काम में आयी। भूतनाथ उस नौजवान को घसीटता हुआ दूसरी कोठरी में ले गया और नागर भी भूतनाथ के पीछे-पीछे चली गयी।

आधे घण्टे के बाद नागर और भूतनाथ फिर उसी कमरे में आये और दोनों प्रेमी मसनद पर बैठकर खुशी-खुशी हँसी-दिल्लगी की बातें करने लगे। अन्दाज से मालूम होता है कि ये दोनों उस नौजवान को कहीं क़ैद कर आये हैं।

थोड़ी देर तक हँसी दिल्लगी होती रही, इसके बाद मतलब की बातें होने लगीं। नागर के पूछने पर भूतनाथ ने अपना हाल कहा और सबके पहिले वह चीठी नागर को दिखायी, जो राजा गोपालसिंह के लिए कमलिनी ने लिख दी थी, इसके बाद मायारानी के पास जाने और बातचीत करने का खुलासा हाल कहके वह दूसरी चीठी भी नागर को दिखायी, जो मायारानी ने नागर के नाम लिखकर भूतनाथ के हवाले की थी। यह सब हाल सुनकर नागर बहुत खुश हुई और बोली, "यह काम सिवाय तुम्हारे और किसी से नहीं हो सकता था और यदि तुम मायारानी की चीठी न भी लाते तो भी तुम्हारी आज्ञानुसार काम करने को मैं तैयार थी।

भूतनाथ : सो तो ठीक है, मुझे भी यही आशा थी, परन्तु यों ही एक चीठी तुम्हारे नाम भी लिखवा ली।

नागर : पर ताज्जुब है कि राजा गोपालसिंह और देवीसिंह आज के पहिले इस शहर में आये हुए हैं, मगर अभी तक इस मकान के अन्दर उन दोनों के आने की आहट नहीं मिली। न मालूम वे दोनों कहाँ और किस धुन में हैं! ख़ैर, जो होगा देखा जायगा, अब यह कहिए कि आप क्या करना चाहते हैं?

भूतनाथ : (कुछ देरतक सोचकर) अगर ऐसा है, तो मुझे स्वयं उन दोनों को ढूँढ़ना पड़ेगा। मुलाकात होने पर दोनों को गुप्त रीति से इस मकान के अन्दर ले आऊँगा और किशोरी' कामनी को छुड़ाकर यहाँ से निकल जाऊँगा, फिर धोखा देकर किशोरी और कामिनी को अपने कब्जे में कर लूँगा, अर्थात् उन्हें कोई दूसरा काम करने के लिए कहकर किशोरी और कामिनी को रोहतासगढ़ पहुँचाने का वादा कर ले जाऊँगा और उस गुप्त खोह में, जिसे मैं अपना मकान समझता हूँ और तुम्हें दिखा चुका हूँ, अपने आदमियों के सुपुर्द करके गोपालसिंह से आ मिलूँगा और फिर उसे क़ैद करके मायारानी के पास पहुँचा दूँगा, जिससे वह अपने हाथ से उसे मारकर निश्चिन्त हो जाय।

नागर : बस बस, तुम्हारी राय बहुत ठीक है, अगर इतना काम हो जाय तो फिर क्या चाहिए! मायारानी से मुँहमाँगा इनाम मिले क्योंकि इस समय वह राजा गोपालसिंह के सबब से बहुत ही परेशान हो रही है, यहाँ तक कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह के हाथ से तिलिस्म को बचाने का ध्यान तक भी उसे बिल्कुल ही जाता रहा। यदि वह गोपालसिंह को मारके निश्चिन्त हो जाय तो अपने से बढ़कर भाग्यवान दुनिया में किसी को नहीं समझेगी, जैसाकि थोड़े दिन पहिले समझती थी।

भूतनाथ : जो मैं कह चुका हूँ, वही होगा इसमें सन्देह नहीं। अच्छा अब तुम इस मकान का पूरा-पूरा भेद मुझे बता दो, जिसमें किसी तहख़ाने, कोठरी, रास्ते या चोर दरवाज़े का हाल मुझसे छिपा न रहे।

नागर : बहुत अच्छा, चलिए, उठिए, जहाँ तक जल्द हो सके, इस काम से भी निपट ही लेना चाहिए।

नागर ने उस मकान का पूरा-पूरा भेद भूतनाथ को बता दिया, हरएक कोठरी, तहखाना, रास्ता और चोर दरवाज़ा तथा सुरंग दिखा दिया और उसके खोलने और बन्द करने की विधि भी बता दी। इस काम से छुट्टी पाकर भूतनाथ नागर से बिदा हुआ और राजा गोपालसिंह तथा देवीसिंह की खोज में चारों तरफ़ घूमने लगा।

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