चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
लोगों की राय

मूल्य रहित पुस्तकें >> चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

Download Book
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

364 पाठक हैं

चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

।। छठवाँ भाग ।।

पहिला बयान

वे दोनों साधु जो सन्दूक के अन्दर झाँक न मालूम क्या देखकर बेहोश हो गये थे, थोड़ी देर बाद होश में आये और चीख-चीखकर रोने लगे। एक ने कहा, "हाय, इन्द्रजीतसिंह तुम्हें क्या हो गया! तुमने तो किसी के साथ बुराई न की थी, फिर किस कमबख्त ने तुम्हारे साथ बदी की? प्यारे कुमार, तुमने बड़ा बुरा धोखा दिया, हम लोगों को छोड़कर चले गये, क्या दोस्ती का हक इसी तरह अदा करते हैं? हाय, अब हम लोग जीकर क्या करेंगे, अपना काला मुँह लेकर कहाँ जायेंगे? हमको अपने भाई से बढ़कर मानने वाला अब दुनिया में कौन रह गया! तुम हमें किसके सुपुर्द करके चले गये?"

दूसरा बोला–"प्यारे कुमार, कुछ तो बोलो, ज़रा अपने दुश्मन का नाम तो बताओ, कुछ कहो तो सही कि किस बेईमान ने तुम्हें मारकर इस सन्दूक में डाल दिया? हाय, अब हम तुम्हारी माँ बेचारी चन्द्रकान्ता के पास कौन मुँह लेकर जायेंगे? किस मुँह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे होनहार लड़के को किसी ने मार डाला! नहीं नहीं, ऐसा न होगा, हम लोग जीतेजी लौटकर घर न जायँगे, इसी जगह जान दे देंगे? नहीं नहीं, अभी तो हमें उससे बदला लेना है, जिसने हमारा सर्वनाश कर डाला। प्यारे कुमार, ज़रा तो मुँह से बोलो, ज़रा आँखें खोलकर देखो तो सही तुम्हारे पास कौन खड़ा रो रहा है। क्या तुम हमें भूल गये? हाय, यह यकायक कहाँ से गजब आकर टूट पड़ा!"

अब तो पाठक समझ गये होंगे कि इस सन्दूक में कुँअर इन्द्रजीतसिंह की लाश थी और ये दोनों साधु भैरोसिंह और तारासिंह थे। इन दोनों के रोने से कामिनी असल बात समझ गयी, झट कोठरी के बाहर निकल आयी और मोमबत्ती की रोशनी में कुमार की लाश देख ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। किशोरी इस तहख़ाने के बगलवाली कोठरी में थी। उसने जो कुँअर इन्द्रजीतसिंह का नाम लेलेकर रोने की आवाज़ सुनी तो उसकी अजब हालत हो गयी। उसका पका हुआ दिल इस लायक न था कि इतनी ठेस सम्हाल सके, बस एक दफे 'हाय' की आवाज़ तो उसके मुँह से निकली मगर फिर तनोबदन की सुध न रही। वह ऐसी जगह न थी कि कोई उसके पास जाय या उसे सम्हाले और देखे कि उसकी क्या हालत है।

भैरोसिंह और तारासिंह ने जो कामिनी को देखा तो वह लोग फूट-फूटकर रोने लगे। तहख़ाने में हाहाकार मच गया। घण्टे-भर यही हालत रही। जब कामिनी ने रोकर यह कहा कि 'इसी के बगलवाली कोठरी में बेचारी किशोरी भी है, हाय, हम लोगों का रोना सुनकर उस बेचारी की क्या अवस्था हुई होगी'। तब भैरोसिंह और तारासिंह चुप हुए और कामिनी का मुँह देखने लगे।

भैरो : तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि यहाँ किशोरी भी है?

कामिनी : मैं उससे बातें कर चुकी हूँ।

तारा : क्या तुम बड़ी देर से इस तहख़ाने में हो?

कामिनी : देर क्या, मैं तो कई दिनों से भूखी-प्यासी इस तहख़ाने में क़ैद हूँ। (उस आदमी की तरफ़ इशारा करके) यह मेरा पहरा देता था।

भैरो : ख़ैर, जो होना था सो हो गया, अब हम लोग अगर रोने-धोने में लगे रहेंगे तो इनके दुश्मन का पता न लगा सकेंगे और न उससे बदला ही ले सकेंगे। यों तो जन्म-भर रोना ही है परन्तु जब इनके दुश्मन से बदला ले लेंगे तो कलेजे में कुछ ठण्डक पड़ेगी। तुम यहाँ कैसे आयीं और इन दुष्टों के हाथ क्योंकर फँसीं खुलासा कहो तो शायद कुछ पता लगे।

कामिनी ने अपना खुलासा हाल कहा और इसके बाद पूछा, "तुम दोनों का आना कैसे हुआ?"

भैरो : कमला ने इस तहख़ाने का पता देकर हम लोगों को भेजवाया है। थोड़ी ही देर में राजा बीरेन्द्रसिंह और कुँअर आनन्दसिंह भी बहुत से आदमियों को साथ लिये आया ही चाहते हैं, कमला भी उनके साथ होगी, हम लोग कुँअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए किसी दूसरी जगह जानेवाले थे, मगर हाय, यह क्या ख़बर थी कि रास्ते में ही हम लोगों पर यह पहाड़ टूट पड़ेगा। हाय, जब महाराज यहाँ आयेंगे तो हम किस मुँह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे लड़के की लाश इस तहख़ाने में पायी गयी।

इसके बाद भैरोसिंह ने इस तहख़ाने में आने का बाकी हाल कहा तथा यह भी बताया कि 'जब खण्डहर के बाहर कुएँ पर हम दोनों आदमी बैठे थे, तभी तीन आदमियों की बातचीत से मालूम हुआ हो गया कि तुमको उन लोगों ने क़ैद कर लिया है परन्तु यह आशा न थी कि तुम्हें इस अवस्था में देखेंगे। उन लोगों ने मुझे देखा तो पहिचान कर डरे और भाग गये मगर मुझे यह न मालूम हुआ कि वे लोग कौन हैं और उन्होंने मुझे कैसे पहिचाना'?

कामिनी : (हाथ का इशारा करके) उन्हीं लोगों में से एक यह भी है, जिसे तुमने बाँध रक्खा है।

भैरो : (उस आदमी से) बता तू कौन है?

आदमी : बताने को तो मैं सबकुछ बता सकता हूँ, परन्तु मेरी जान किसी तरह न बचेगी।

भैरो : क्या तुझे अपने मालिक का डर है?

आदमी : जी हाँ।

भैरो : मैं वादा करता हूँ कि तेरी जान बचाऊँगा और तुझे बहुत कुछ इनाम भी दिलाऊँगा।

आदमी : इस वादे से मेरी तबीयत नहीं भरती, क्योंकि मुझे तो आप लोगों ही के बचने की उम्मीद नहीं। हाय, क्या आफ़त में जान फँसी है! अगर कुछ कहें तो मालिक के हाथ से मारे जाँय और न कहें तो इन लोगों के हाथ से दुःख भोगें!

भैरो : तेरी बातों से मालूम होता है कि तेरा मालिक बहुत जल्द यहाँ आया चाहता है?

आदमी : बेशक ऐसा ही है?

यह सुनते ही भैरोसिंह ने तारासिंह के कान में कुछ कहा और उनका ऐयारी का बटुआ लेकर, अपना बटुआ उन्हें दे दिया, जिसे ले वे तुरन्त वहाँ से रवाना हुये और तहख़ाने के बाहर निकल गये। तारासिंह ने जल्दी-जल्दी खण्डहर के बाहर होकर उस कुएँ में से एक लुटिया पानी खींचा और बटुए में से कोई चीज़ निकालकर पत्थर पर रगड़ जल में घोल कर पीया, फिर एक लुटिया जल निकालकर वही चीज़ पत्थर पर घिस उस पानी में मिलायी और बहुत जल्द तहख़ाने में पहुँचे, जल की लुटिया भैरोसिंह के हाथ में दी, भैरोसिंह ने बटुए से कुछ खाने की चीज़ निकाली और कामिनी से कहा, "इसे खाकर यह जल पी लो।"

कामिनी : भला खाने और जल पीने का यह कौन-सा मौका है? यद्यपि मैं कई दिनों से भूखी हूँ परन्तु क्या कुमार की लाश के सिरहाने बैठकर खा सकूँगी, क्या यह अन्न मेरे गले के नीचे उतरेगा?

भैरो : हाय, इस बात का मैं कुछ भी जवाब नहीं दे सकता। ख़ैर, इस पानी में से थोड़ा तुम्हें पीना ही पड़ेगा। अगर इससे इन्कार करोगी तो हम सब लोग मारे जाँयगे। (धीरे से कुछ कहकर) बस देर न करो।

कामिनी : अगर ऐसा है तो मैं इन्कार नहीं कर सकती।

भैरोसिंह ने उस लुटिया में से आधा जल कामिनी को पिलाया और आधा आप पीकर लुटिया तारासिंह के हवाले की। तारासिंह तुरन्त तहख़ाने में से बाहर निकल आये और जहाँ तक जल्द हो सका, इधर-उधर से सूखी हुई लकड़ियाँ और कण्डे बटोरकर खण्डहर के बीच में एक जगह रक्खा, तब बटुए में से चकमक पत्थर निकाला और उसमें से आग झाड़कर गोठों और लकड़ियों को सुलगाया।

तारासिंह यह सब काम बड़ी फुर्ती से कर रहे थे और घड़ी-घड़ी खण्डहर के बाहर मैदान की तरफ़ देखते भी जाते थे। आग सुलगाने के बाद, जब तारासिंह ने मैदान की तरफ़ देखा तो बहुत दूर पर गर्द उड़ती हुई दिखायी दी। वह अपने काम में फिर जल्दी करने लगे। बटुए में से एक शीशी निकाली, जिसमें किसी प्रकार का तेल था, वह तेल आग में डाल दिया, आग पर दो-तीन दफे पानी का छींटा दिया, फिर मैदान की तरफ़ देखा। मालूम हुआ कि दस-पन्द्रह आदमी घोड़ों पर सवार बड़ी तेजी से इसी तरफ़ आ रहे हैं। उस समय तारासिंह के मुँह से यकायक निकल पड़ा–"ओफ, अगर ज़रा भी देर होती तो काम बिगड़ ही चुका था, ख़ैर, अब ये लोग कहाँ जा सकते हैं!"

आग में से बहुत ज़्यादे धूआँ निकला और खण्डहर-भर में फैल गया। इसके बाद तारासिंह खण्डहर के बाहर निकले और कूएँ के पास जाकर नीम के पेड़ पर चढ़ गये तथा अपने को घने पत्तों की आड़ में छिपा लिया। वह पेड़ इतना ऊँचा था कि उस पर से खण्डहर के भीतर का मैदान साफ़ नज़र पड़ता था। वे सवार जिन्हें तारासिंह ने दूर से देखा था अब खण्डहर के पास आ पहुँचे, तारासिंह ने पेड़ पर चढ़े-चढ़े गिना तो मालूम हुआ कि बारह सवार हैं। उनमें सबके आगे एक साधु था जिसकी सफेद दाढ़ी नाभी तक पहुँच रही थी।

पाठक, यह वही बाबाजी हैं, जिन्होंने रोहतासगढ़ में राजा दिग्विजयसिंह के पास रात के समय पहुँचकर उन्हें भड़काया और राजा बीरेन्द्रसिंह वगैरह को क़ैद कराया था।

खँडहर के पास पहुँचकर वे लोग रुके। घोड़ों की बागडोरें पत्थरों से अटकाकर दस आदमी तो खण्डहर के अन्दर घुसे और दो आदमी घोड़ों की हिफ़ाज़त के लिए बाहर रह गये।

खँडहर के अन्दर धूआँ देखकर बुड्ढे साधु ने कहा, "यह धुआँ कैसा है!"

एक : किसी मुसाफ़िर ने आकर रसोई बनायी होगी।

दूसरा : मगर धूआँ बहुत कड़ुआ है।

तीसरा : ओफ, आँख-नाक से पानी बहने लगा।

साधु : अगर किसी मुसाफ़िर ने यहाँ आकर रसोई पकायी होती तो हाँडी पत्तल और पानी का बर्तन इत्यादि कुछ और भी तो यहाँ दिखायी देता! (एक आदमी की तरफ़ देखकर) हमें इस धूएँ का रंग बेढब मालूम होता है, इसकी कड़वाहट इसकी रंगत और इसकी बू कहे देती है कि धूएँ में बेहोशी का असर है। है, है, ज़रूर ऐसा ही है, कुछ अमल भी आ चला और सिर भी घूमने लगा! (ज़ोर से) अरे बहादुरों, बेशक तुम लोग धोखे में डाले गये, यहाँ कोई ऐयार आ पहुँचा है, क्या ताज्जुब है अगर तहख़ाने में से कामिनी को निकालकर ले गया हो।

नीम के पेड़ पर बैठे हुए तारासिंह उस साधु की सब बातें सुन रहे थे, क्योंकि वह नीम का पेड़ खँडहर के फाटक के पास ही था। साधु की बातें अभी पूरी न होने पायीं थीं कि पिछवाड़े की तरफ़ से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। मालूम होता है कि साधू की आख़िरी बात उसने सुन ली थी क्योंकि पहुँचने का साथ ही उसने पुकारकर कहा, "नहीं नहीं, कामिनी को कोई निकाल कर नहीं ले गया, मगर इसमें भी सन्देह नहीं कि बीरेन्द्रसिंह के दो ऐयार यहाँ आये हैं, एक तहख़ाने के अन्दर है, दूसरा (हाथ का इशारा करके) उस नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है।"

साधु : बस, तब तो मार लिया। बेशक, हम लोग आफ़त में फँस गये हैं परन्तु कामिनी और इन्द्रजीत, जिन्हें तुम लोग तहख़ाने में पहुँचा चुके हो, अब बाहर नहीं जा सकते। ताज्जुब कि इन ऐयारों ने इन्द्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो! देखो मैं शाहदरवाज़े को ऐसा बन्द करता हूँ कि फिर ऐयार का बाप भी इस तहख़ाने में न जा सकेगा।   

इसके जवाब में उस आदमी ने जो अभी दौड़ता हुआ आया था। कहा, "हमारा एक आदमी भी तहख़ाने में ही है।"

साधु : ख़ैर, अब तो उसका भी उसी तहख़ाने में घुटकर मर जाना बेहतर है।

तारासिंह ने उस आदमी को पहिचान लिया जो खण्डहर के पिछवाड़े की तरफ़ से दौड़ता हुआ था। यह उन्हीं दोनों आदमियों में से था, जो भैरोसिंह और तारासिंह को कुएँ पर देख डर के मारे भाग गये थे, न मालूम कहाँ छिप रहा था, जो इस समय बाबाजी को देखकर बेधड़क आ पहुँचा।

साधु ने धुएँ का खयाल बिलकुल ही न किया और खण्डहर के अन्दर जाकर न मालूम किस कोठरी में घुस गया।

तारासिंह को कुँअर इन्द्रजीतसिंह के मरने का जितना गम था, उसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं, परन्तु उनको उस समय बड़ा ही आश्चर्य हुआ, जब साधु के मुँह से यह सुना कि 'ताज्जुब नहीं कि ऐयारों ने इन्द्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो'! बल्कि यों कहना चाहिए कि इस बात ने तारासिंह को खुश कर दिया। वे अपने दिल में सोचने लगे कि बेशक हम लोगों ने धोखा खाया मगर न मालूम उन्हें कैसी दवा खिलायी गयी, जिसने बिल्कुल मुर्दा ही बना दिया! यदि इस समय भैरोसिंह के पास पहुँचकर यह खुशख़बरी सुनायी जाती तो क्या ही अच्छी बात थी, मगर कम्बख्त साधु तो कहता है कि मैं शाहदरवाज़ा बन्द कर देता हूँ, जिससे फिर कोई आदमी तहख़ाने में न जा सके। यदि ऐसा हुआ तो बड़ी मुश्किल होगी, इन्द्रजीतसिंह अगर जीते भी हैं तो अब मर जायेंगे! न मालूम यह शाहदरवाज़ा कौन है और किस तरह खुलता और बन्द होता है?

वे लोग तो सुन ही चुके थे कि बीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है। बाबाजी शाह-दरवाज़ा बन्द करने चले गये, मगर तारासिंह को इसकी कुछ भी चिन्ता नहीं थी, क्योंकि वे इस बात को बखूबी जानते थे कि बेहोशी का धुआँ जो इस खण्डहर में फैला हुआ है, अब इन लोगों को ज़्यादे देर तक ठहरने न देगा, थोड़ी ही देर में बेहोशी आ जायगी और फिर किसी योग्य न रहेंगे, और आख़िर वैसा ही हुआ।

यद्यपि वे लोग ज़्यादे धुएँ में नहीं फँसे थे तो भी जो कुछ उन लोगों की आँखों में लगा था और नाक की राह से पेट में गया था, वही उन लोगों को बेदम करने के लिए काफी था। वे लोग कुएँ पर आ पहुँचे और चारों तरफ़ से उस नीम के पेड़ को घेर लिया। इस समय उन लोगों की अवस्था शराबियों सी हो रही थी। उसी समय तारासिंह ने पेड़ पर से चिल्लाकर कहा, "ओ हो हो हो, क्या अच्छे वक्त पर हमारा मालिक आ पहुँचा। अब ज़रूर इन कम्बख्तों की जान जायगी!!"

तारासिंह की बात सुनते ही वे लोग ताज्जुब में आ गये और मैदान की तरफ़ देखने लगे। वास्तव में पूरब की तरफ़ से गर्द उठ रही थी और मालूम होता था कि किसी राजा की सवारी इस तरफ़ आ रही है। उन लोगों के दिमाग में बेहोशी का असर अच्छी तरह हो चुका था। वे लोग बैठ गये और फिर ज़मीन पर लेटकर दीन-दुनिया से बेख़बर हो गये।

तारासिंह की निगाह उसी गर्द की तरफ़ थी। धीरे-धीरे आदमी और घोड़े दिखायी देने लगे और जब थोड़ी दूर रह गये तो साफ़ मालूम हो गया कि सवारों को साथ लिये राजा बीरेन्द्रसिंह आ पहुँचे। ऐयारों में तेजसिंह और पण्डित बद्रीनाथ उनके साथ थे और मुश्की घोड़े पर सवार कमला आगे-आगे आ रही थी। जब तक वे लोग खण्डहर के पास आवें, तब तक तारासिंह पेड़ के नीचे उतरे, कुएँ में से एक लुटिया जल निकाल कर मुँह हाथ धोया और आगे बढ़कर उन लोगों से मिले। बीरेन्द्रसिंह ने तारासिंह से पूछा कहो क्या हाल है?"

तारा : विचित्र हाल है।

बीरेन्द्र : सो क्या, भैरो कहाँ है?

तारा : भैरोसिंह इसी तहख़ाने के खण्डहर में हैं, और किशोरी, कामिनी तथा कुअँर इन्द्रजीतसिंह भी उसी तहख़ाने में क़ैद हैं।

तारासिंह ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह का जो कुछ हाल तहख़ाने में देखा था, वह किसी से कहना मुनासिब न समझा, क्योंकि सुनते ही वे लोग अधमरे हो जाते और किसी काम लायक न रहते और बीरेन्द्रसिंह की तो न मालूम क्या हालत होती, सिवाय इसके यह भी मालूम हो ही चुका था कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं हैं, ऐसी अवस्था में उन लोगों को बुरी ख़बर सुनाना बुद्धिमानी के बाहर था, इसलिए तारासिंह ने इन्द्रजीतसिंह के बारे में बहुत-सी बातें बनाकर कहीं जैसा कि आगे चलकर मालूम होगा।

कुअँर आनन्दसिंह की जुबानी यह सुना कि कामिनी भी इसी तहख़ाने में क़ैद है तो बहुत ही खुश हुए और सोचने लगे कि अब थोड़ी देर में माशूका से मुलाकात हुआ चाहती है, ईश्वर ने बड़ी कृपा की कि ढूँढ़ने और पता लगाने की नौबत न पहुँची। उन्होंने सोचा कि बस अब हमारे दुःखान्त नाटक का अन्त हुआ ही चाहता है!

बीरेन्द्रसिंह ने फिर तारा से पूछा, "क्या तुमने अपनी आँखों से उन लोगों को इस तहख़ाने में क़ैद देखा है?"

तारा : जी हाँ, कुअँर इन्द्रजीतसिंह और कामिनी से तो हम दोनों आदमी मिल चुके हैं और भैरोसिंह उन दोनों के पास ही है, मगर किशोरी को हम लोग देख न सके, कामिनी की जुबानी मालूम हुआ कि जिस तहख़ाने में वह है, उसी के बगलवाली कोठरी में किशोरी भी क़ैद है। इस पर कोई तरकीब ऐसी न निकली, जिससे हम लोग किशोरी तक पहुँच सकते।

बीरेन्द्र : क्या यहाँ की कोठरियों और दरवाजों में किसी तरह का भेद है?

तारा : भेद क्या मुझे तो यह एक छोटा-सा तिलिस्म ही मालूम होता है।

बीरेन्द्र : भला तुम और भैरोसिंह इन्द्रजीतसिंह के पास तक पहुँच गये तो उसे तहख़ाने के बाहर क्यों न ले आये?

तारा : (कुछ अटककर) मुलाकात होने पर हम लोग उसी तहख़ाने में बैठकर बातें करने लगे। दुश्मन का एक आदमी उस तहख़ाने में कैदियों की निगहबानी कर रहा था। कैदी हथकड़ी और बेड़ी के सबब के बेबस थे। जब हम दोनों ने उस आदमी को गिरफ़्तार किया और हाल जानने के लिए कुछ मारा-पीटा तब वह राह पर आया। उसकी जुबानी मालूम हुआ कि हम लोगों का दुश्मन अर्थात् उसका मालिक बहुत से आदमियों को साथ ले यहाँ आया ही चाहता है। तब भैरोसिंह ने मुझे कहा कि इस समय हम लोगों का इस तहख़ाने से बाहर निकलना मुनासिब नहीं है, कौन ठिकाना बाहर निकलकर दुश्मनों से मुलाकात हो जाय। वे लोग बहुत होंगे और हम लोग केवल तीन आदमी हैं ताज्जुब नहीं कि तकलीफ उठानी पड़े, इससे यही बेहतर है कि तुम बाहर जाओ और जब दुश्मन लोग इस खण्डहर में जायें तो, उन्हें किसी तरह गिरफ़्तार करो। उन्हीं की आज्ञा पाकर मैं अकेला तहख़ाने के बाहर निकल आया और मैंने दुश्मनों को गिरफ़्तार भी कर लिया।

तेज : (खुश होकर और हाथ का इशारा करके) मालूम होता है कि वे लोग जो उस पेड़ के नीचे पड़े हैं और कुछ खण्डहर के दरवाज़े पर दिखायी देते हैं, सब तुम्हारी ही कारीगरी से बेहोश हुए हैं, उन्हें किस तरह बेहोश किया?

तारा : खण्डहर के अन्दर आग सुलगायी और उसमें बेहोशी की दवा डाली, जब तक वे लोग आवें तब तक धुआँ अच्छी तरह फैल गया, ऐसी कड़ुवी दवा से वे लोग क्योंकर बच सकते थे, ज़रा-सा धुआँ आँख में लगना बहुत था। दुश्मनों के केवल दो आदमी बच गये (घोंड़ों की तरफ़ देखकर) हैं, मालूम होता है आपको आते देख वे लोग भाग गये, यह क्या हुआ!

तेज : (चारों तरफ़ देखकर) ख़ैर, जाने दो क्या हर्ज़ है। हाँ, तो अब हम लोगों को तहख़ाने में चलना चाहिए।

तारा : शायद हम लोग तहख़ाने में न जा सके।

कमला : सो क्यों?

तारा : उन लोगों में एक साधु भी था, वह बड़ा ही चालाक और होशियार था। आँख में धुँआ लगते ही समझ गया कि इसमें बेहोशी का असर है, अब दम-के-दम में हम लोग बेहोश हो जायेंगे। उसी समय एक आदमी ने जो पहिले हम लोगों को देखकर भाग गया था और छिपकर मेरी कार्रवाई देख रहा था, पहुँचकर उसे हम लोगों के आने की ख़बर दे दी और यह भी कह दिया कि अभी तक कामिनी, किशोरी और इन्द्रजीतसिंह तहख़ाने में हैं, बल्कि राजा बीरेन्द्रसिंह का ऐयार भी तहख़ाने में है। यह सुनते ही वह बहुत खुश हुआ और बोला, "अब हम लोग तो बेहोश हुआ ही चाहते हैं, धोखे में पड़ ही चुके हैं, मगर अब हम यहाँ के शाहदरवाज़े को बन्द कर देते हैं, फिर किसी की मजाल नहीं कि तहख़ाने में जा सके और उन लोगों को निकाल सके जो तहख़ाने के अन्दर अभी तक बैठे हुए हैं।"

इस बात को सुनकर उस जासूस ने कहा कि 'हम लोगों का एक आदमी भी उसी तहख़ाने में है'। फिर न मालूम क्या हुआ और उस साधु ने क्या किया अथवा शाह-दरवाज़ा कौन है और किस तरह खुलता या बन्द होता है!

तारासिंह की इस बात ने सभों को तरद्दुद में डाल दिया और थोड़ी देर तक वे लोग सोच-विचार में पड़े रहे, इसके बाद कमला ने कहा, "पहिले खण्डहर में चलकर तहख़ाने का दरवाज़ा खोलना चाहिए, देखें खुलता है या नहीं, अगर खुल गया तो सोच-विचार की कुछ ज़रूरत नहीं, यदि न खुल सका तो देखा जायेगा।"

इस बात को सभों ने पसन्द किया और राजा बीरेन्द्रसिंह ने कमला को आगे चलने और तहख़ाने का दरवाज़ा खोलने के लिए कहा। खँडहर में इस समय धुँआ कुछ भी न था। कमला सभों को साथ लिये उस दालान में पहुँची, जहाँ से तहख़ाने में जाने का रास्ता था। मोमबत्ती जलाकर हाथ में ली और बगलवाली कोठरी में जाकर मोमबत्ती तारासिंह के हाथ में दे दी। इस कोठरी में एक अलमारी थी, जिसके पल्लों में दो मुट्ठे लगे हुए थे, इन्हीं मुट्ठों के घुमाने से दरवाजा खुल जाता था और फिर एक कोठरी में पहुँच जाने से तहख़ाने में उतरने के लिए सीढ़ियाँ मिलती थीं। इस समय कमला ने इन्हीं दोनों मुट्ठों को कई बार घुमाया, वे घूम तो गये मगर दरवाज़ा न खुला। इसके बाद तारासिंह ने और फिर तेजसिंह ने उद्योग किया मगर कोई काम न चला। तब तो सभों का जी बेचैन हो गया कि उस बेईमान साधु ने जो कुछ कहा, सो किया। इस खँडहर में कोई शाह-दरवाज़ा ज़रूर है, जिसे साधु ने बन्द कर दिया और जिसके सबब से यह दरवाज़ा अब नहीं खुलता।

सब लोग उस कोठरी के बाहर निकले और साधु को ढूँढ़ने लगे। खँडहर में और नीम के नीचे आठ आदमी बेहोश पड़े हुये थे, जो सब इकट्ठे किये गये। दो आदमी जो घोड़ों की हिफ़ाज़त करने के लिए रह गये थे और बेहोश नहीं हुये थे, वे तो न मालूम कहाँ भाग ही गये थे, अब साधु रह गये सो उनके शरीर का कहीं पता न लगा। चारों तरफ़ खोज होने लगी।

राजा बीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और तारासिंह को साथ लिये हुए कमला उस कोठरी में पहुँची, जिसमें दीवार के साथ लगी हुई पत्थर की मूरत थी, जिसमें एक दफे रात के समय कामिनी जा चुकी थी और जिसका हाल ऊपर के किसी बयान में लिखा जा चुका है। इसी कोठरी में पत्थर की मूरत के पास ही साधु महाशय बेहोश पड़े हुए थे।

तेज : (मूरत को अच्छी तरह देखकर) मालूम होता है कि शाह-दरवाज़े से इस मूरत का कोई सम्बन्ध है।

बीरेन्द्र : शायद ऐसा ही हो, क्योंकि मुझे खण्डहर तिलिस्मी मालूम होता है। हाय, बेचारा लड़का इस समय कैसी मुसीबत में पड़ा हुआ है। अब दरवाज़ा खुलने की तरकीब किससे पूछी जाय और उसका कैसे पता लगे? मेरी राय तो यह है कि इस खण्डहर में जो कुछ मिट्टी चूना पड़ा है, सब बाहर फिंकवाकर जगह साफ़ करा दी जाय और दीवार तथा ज़मीन भी खोदी जाय।

तेज : मेरी भी यही राय है।

तारा : ज़मीन और दीवार खुदने से ज़रूर काम चल जायगा। तहख़ाने की दीवार खोदकर हम लोग अपना रास्ता निकाल लेंगे, बल्कि और भी बहुत-सी बातों का पता लग जायगा।

बीरेन्द्र : (तेजसिंह की तरफ़ देखके) बहुत जल्द बन्दोबस्त करो और दो आदमी रोहतासगढ़ भेजकर एक हज़ार आदमी की फौज बहुत जल्द मँगवाओ। वह फौज ऐसी हो कि सब काम कर सके अर्थात् ज़मीन खोदने, सेंध लगाने, सड़क बनाने इत्यादि का काम बखूबी जानती हो।

तेज : बहुत खूब!

राजा बीरेन्द्रसिंह के साथ-साथ सौ आदमी आये हुए थे, वे सब-के-सब काम पर लग गये। बेहोश दुश्मनों के हाथ पैर बाँध दिये गये और उन्हें उठाकर एक दालान में रख देने के बाद सब लोग खँडहर की मिट्टी उठा-उठाकर बाहर फेंकने लगे, जल्दी के मारे मालिकों ने भी काम में हाथ लगाया।

रात हो गयी, कई मशाल भी जलाये गये, मिट्टी की सफाई बराबर जारी रही, मगर तारासिंह का विचित्र हाल था, घड़ी-घडी रुलाई आती थी और उसे वे बड़ी मुश्किल से रोकते थे। यद्यपि तारासिंह ने कुअँर इन्द्रजीतसिंह का हाल बहुत कुछ झूठ-सच मिलाकर राजा बीरेन्द्रसिंह से कहा था, मगर वे बखूबी जानते थे कि इन्द्रजीतसिंह की अवस्था अच्छी नहीं है, उनकी लाश तो अपनी आँखों से देख ही चुके थे, परन्तु साधु की बातों ने कुछ तसल्ली कर दी थी। वे समझ गये थे कि इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं हैं बल्कि बेहोश हैं, मगर अफसोस तो यह है कि यह बात केवल तारासिंह ही को मालूम है, भैरोसिंह को भी यदि इस बात की ख़बर होती तो तहख़ाने में बैठे-बैठे कुमार को होश में लाने का कुछ उद्योग करते।

कहीं ऐसा न हो बेहोशी में ही कुमार की जान निकल जाय, ऐसी कड़ी बेहोशी का नतीजा अच्छा नहीं होता है, इसके अतिरिक्त कई दिनों से कुमार बेहोशी की अवस्था में पड़े हैं, बेहोशी भी ऐसी कि जिसने बिल्कुल ही मुर्दा बना दिया, क्या जाने जीते भी हैं या वास्तव में मर ही गये।

ऐसी-ऐसी बातों के विचार से तारासिंह बहुत ही बेचैन थे, अपने दिल का हाल किसी से कहते नहीं थे।

यहाँ से थोड़ी दूर पर एक गाँव था, कई आदमी दौड़ गये और कुदाल, फरसा इत्यादि से ज़मीन खोदने का सामान वहाँ से ले आये और बहुत-से मजदूरों को साथ लिवाते आये। रात-भर काम लगा रहा और सवेरा होते-होते तक खँडहर साफ़ हो गया।

अब उस दालान की खुदाई शुरू हुई, जिसके बगल वाली कोठरी के अन्दर से तहख़ाने में जाने का रास्ता था। हाथ-भर तक ज़मीन खुदने के बाद लोहे की सतह निकल आयी, जिसमें छेद होना भी मुश्किल था। यह देख बीरेन्द्रसिंह को भी बहुत रंज हुआ और उन्होंने खँडहर के बीच की ज़मीन अर्थात् चौक खोदने का हुक्म दिया।

दूसरे दिन चौक की खुदायी से छुट्टी मिली, खुद जाने पर वहाँ एक छोटी-सी खूबसूरत बावली निकली, जिसके चारों तरफ़ छोटी-छोटी संगमरमर की सीढ़ियाँ थीं। यह बावली दस गज से ज़्यादे गहरी न थी और इसके नीचे की सतह तीन गज चौड़ी और इतनी ही लम्बी होगी। जो पहर चढ़ते-चढ़ते उस बावली की मिट्टी निकल गयी और नीचे की सतह में पीतल की एक मूरत दिखायी पड़ी। मूरत बहुत बड़ी न थी, एक हरिन का शेर ने शिकार किया था, हरिन की गर्दन का आधा हिस्सा शेर के मुँह में था। मूरत बहुत ही खूबसूरत और कीमती थी मगर मिट्टी के अन्दर बहुत दिनों से दबे रहने से मैली और खराब हो रही थी। बीरेन्द्रसिंह ने उसे बहुत अच्छी तरह झाड़-पोंछकर साफ़ करने का हुक्म दिया।

बीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह से कहा, "इस खुदायी में समय भी नष्ट हुआ और कुछ काम भी न निकला।'

तेज : मैं इस मूरत पर अच्छी तरह ग़ौर कर रहा हूँ, मुझे आशा है कि कोई अनूठी बात ज़रूर दिखायी पड़ेगी।

बीरेन्द्र : (ताज्जुब में आकर) देखो देखो, शेर की आँखें इस तरह घूम रही हैं, जैसे वहव इधर ही देख रहा हो!

आनन्द : (अच्छी तरह देखकर) हाँ, ठीक तो है!

इसी समय एक आदमी दौड़ता हुआ आया और हाथ जोड़कर बोला, महाराज, चारों तरफ़ से दुश्मन की फौज ने आकर हम लोगों को घेर लिया, दो हजार सवारों के साथ शिवदत्त आ पहुँचा, ज़रा मैदान की तरफ़ देखिए।"

न मालूम शिवदत्त इतने दिनों तक कहाँ छिपा रहा और क्या कर रहा था। जो इस समय दो हजार फौज के साथ उसका यकायक आ पहुँचना और चारों तरफ़ से खँडहर को घेर लेना बड़ा ही दुःखदायी हुआ, क्योंकि बीरेन्द्रसिंह के पास इस समय केवल सौ सिपाही थे।

सूर्य अस्त हो चुका था, चारों तरफ़ से अँधेरी घिरी चली आती थी। फौज सहित राजा शिवदत्त जब तक खँडहर के पास पहुँचे, तब तक रात हो गयी। राजा शिवदत्त को यह मालूम ही हो चुका था कि केवल सौ सिपाहियों के साथ बीरेन्द्रसिंह, कुँअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग इसी खँडहर में हैं, परन्तु राजा बीरेन्द्रसिंह, कुमार और उनके ऐयारों की वीरता और साहस को भी वह अच्छी तरह जानता था, इसलिए रात के समय खँडहर में अन्दर घुसने की हिम्मत न पड़ी। यद्यपि उसके साथ दो हज़ार सिपाही थे, मगर खँडहर के अन्दर डेढ़-दो सौ सिपाहियों से ज़्यादे नहीं जा सकते थे, क्योंकि उसके अन्दर ज़्यादे ज़मीन न थी और बीरेन्द्रसिंह तथा उनके साथी इतने आदमियों को कुछ भी न समझते, इसलिए शिवदत्त ने सोचा कि रात-भर इस खँडहर को घेरकर चुपचाप पड़े रहना ही उत्तम होगा। वास्तव में शिवदत्त का विचार बहुत ठीक था और उसने ऐसा ही किया। राजा बीरेन्द्रसिंह को भी रात भर सोचने-विचारने की मोहलत मिली। उन्होंने कई सिपाहियों को फाटक पर मुस्तैद कर दिया और उसके बाद अपने बचाव का ढंग सोचने लगे।

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book