चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

दसवाँ बयान

बीरेन्द्रसिंह के तीनों ऐयारों ने रोहतासगढ़ के किले के अन्दर पहुँचकर अन्धेर मचाना शुरू किया। उन लोगों ने निश्चय कर लिया कि अगर दिग्विजयसिंह हमारे मालिकों को न छोड़ेगा तो ऐयारी के कायदे के बाहर काम करेंगे और रोहतासगढ़ का सत्यानाश करके छोड़ेंगे।

जिस दिन दिग्विजयसिंह की मुलाकात ग़ौहर से हुई थी, उसके दूसरे ही दिन दरबार के समय दिग्विजयसिंह को ख़बर पहुँची कि शहर में कई जगह हाथ के लिखे हुए काग़ज़ दीवारों पर चिपके हुए दिखायी देते हैं, जिनमें लिखा है–"बीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग इस किले में आ पहुँचे। यदि दिग्विजयसिंह अपनी भलाई चाहें तो चौबीस घण्टे के अन्दर राजा बीरेन्द्रसिंह वगैरह को छोड़ दें, नहीं तो देखते-देखते रोहतासगढ़ सत्यानाश हो जायगा और यहाँ का एक आदमी जीता न बचेगा।"

राजा बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का हाल दिग्विजयसिंह अच्छी तरह जानता था। उसे विश्वास था कि उन लोगों का मुकाबला करनेवाला दुनिया में कोई नहीं है। विज्ञापन का हाल सुनते ही वह काँप उठा और सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए। इस विज्ञापन की ख़बर बात-की-बात शहर-भर में फैल गयी, मारे डर के वहाँ की रिआया का दम निकला जाता था। सबकोई अपने राजा दिग्विजयसिंह की शिकायत करते थे और कहते थे कि कम्बख्त ने बेफ़ायदे राजा बीरेन्द्रसिंह से वैर बाँधकर हम लोगों की जान ली।

तीनों ऐयारों ने तीन काम बाँट लिये। रामनारायण ने इस बात का जिम्मा लिया कि किसी लोहार के यहाँ चोरी करके बहुत-सी कीलें इकट्ठी करेंगे और रोहतासगढ़ में जितनी तोपें हैं, सभों में कील ठोंक देंगे,* चुन्नीलाल ने वादा किया कि तीन दिन के अन्दर रामानन्द ऐयार का सिर काट शहर के चौमुहाने पर रक्खेंगे, और भैरोसिंह ने तो रोहतासगढ़ ही को चौपट करने का प्रण किया था। (*तोप में रज्ञ्जक देने की जो प्याली होती है, उसके छेद में कील ठोंक देने से तोप बेकाम हो जाती है।)

हम ऊपर लिख आये हैं कि जिस समय कुन्दन (धनपति) ने तहख़ाने में से किशोरी को निकाल ले जाने का इरादा किया था तो बारह नम्बर की कोठरी में पहुँचने के पहले तहख़ाने के दरवाज़े में ताला लगा दिया था, मगर रोहतासगढ़ दखल होने के बाद तहख़ानेवाली किताब की मदद से जो दारोगा के पास रहा करती थी, वे दरवाज़े पुनः खोल लिये गये थे और इसलिए दीवानख़ाने की राह से तहख़ाने में फिर आमदरफ्त शुरू हो गयी थी।

एक दिन आधी रात के बाद राजा दिग्विजयसिंह के पलँग पर बैठी हुई ग़ौहर ने इच्छा प्रकट की कि मैं तहख़ाने में चलकर राजा बीरेन्द्रसिंह वगैरह को देखा चाहती हूँ। राजा दिग्विजयसिंह उसकी मुहब्बत में चूर हो रहे थे, दीन-दुनिया की ख़बर भूले हुए थे, तहख़ाने के कायदे पर ध्यान न देकर ग़ौहर को तहख़ाने में ले चले।

अभी पहिला दरवाज़ा भी खोला न था कि यकायक भयानक आवाज़ आयी। मालूम हुआ कि मानों हज़ारों तोपें एक साथ छूटी हैं, तमाम किला हिल उठा, ग़ौहर बदहवास होकर ज़मीन पर गिर पड़ी, दिग्विजयसिंह भी खड़ा न रह सका।

जब दिग्विजयसिंह को होश आया, छत पर चढ़ गया और शहर की तरफ़ देखने लगा। शहर में बेहिसाब आग लगी हुई थी, सैकड़ों घर जल रहे थे, अग्निदेव ने अपना पूरा दखल जमा लिया था, आग के बड़े-बड़े शोले आसमान की तरफ़ उठ रहे थे। यह हाल देखते ही दिग्विजयसिंह ने सर पीटा और कहा, "यह सब फसाद बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का है! बेशक उन लोगों ने मेगजीन में आग लगा दी और वह भयंकर आवाज़ मेगजीन के उड़ने की ही थी। हाय, सैकड़ों घर तबाह हो गये होंगे! इस समय वह कम्बख्त साधू अगर मेरे सामने होता तो मैं उसकी दाढ़ी नोच लेता, जिसके बहकाने से बीरेन्द्रसिंह वगैरह को क़ैद किया!"

दिग्विजयसिंह घबड़ाकर राजमहल के बाहर निकला और तब उसे निश्चय हो गया कि जो जो कुछ उसने सोचा था ठीक है। नौकरों ने ख़बर दी कि न मालूम किसने मेगजीन में आग लगा दी, जिसके सबब से सैकड़ों घर तबाह हो गये, उसी समय शहर में आग लग गयी, जो अभी तक बुझाये नहीं बुझती। इस ख़बर के सुनते ही दिग्विजयसिंह अपने कमरे में लौट गया और बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

बेशक, यह सब काम बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का था। इस आगलगी में रामनारायण को भी तोपों में कील ठोंकने का खूब मौका हाथ लगा। रामानन्द दीवान घबड़ाकर घर से बाहर निकला और तहकीकात करने के लिए अकेला ही शहर की तरफ़ चला। रास्ते में चुन्नीलाल ने हाथ पकड़ लिया और कहा, "दीवानजी, बन्दगी!" बेमौके की बन्दगी से रामानन्द कुढ़ उठा और उसने चुन्नीलाल पर तलवार चलायी। चुन्नीलाल उछलकर दूर जा खड़ा हुआ और उस वार को बचा गया, मगर चुन्नीलाल के वार ने रामानन्द का काम तमाम कर दिया, उसकी भुजाली रामानन्द की गर्दन पर ऐसी बैठी कि सर कटकर दूर जा गिरा।

अब हमको यह भी लिखना चाहिए कि भैरोसिंह ने किस तरह मेगजीन में आग लगायी। भैरोसिंह ने एक मोमबत्ती ऐसी तैयार की जो केवल दो घण्टे तक जल सकती थी अर्थात् उसमें दो घण्टे से ज़्यादे देर तक जलने लायक मोम न था, और उस मोमबत्ती के बीचोंबीच में आतिशबाजी का एक अनार बनाया जिसमें आधी मोमबत्ती जब जल जाय तो आप-से-आप अनार में आग लगे। जब इस तरह की मोमबत्ती तैयार हो गयी तो उसने अपने दोनों साथियों से कहा कि, "मैंगजीन में आग लगाने जाता हूँ, अपनी फिक्र आप कर लूँगा। तुम लोग किसी ऐसी जगह जाकर छिपो, जहाँ मैदान या किले की मजबूत दीवार हो, मगर इसके पहिले शहर में आग लगा दो।' इसके बाद भैरोसिंह मेगजीन के पास पहुँचे और इस फिक्र में लगे कि मौका मिले तो कमन्द लगाकर उसके अन्दर जाँय।

यह इमारत बहुत बड़ी तो न थी मगर मजबूत थी, दीवार बहुत चौड़ी और ऊँची थी, फाटक बहुत बड़ा और लोहे का था, पहरे पर पचास आदमी नंगी तलवार लिये, हर वक्त मुस्तैद रहते थे। इस मेगजीन के चारों तरफ़ से कोई आदमी आग लेकर जाने नहीं पाता था।

चन्द्रमा अस्त हो गया और पिछली रात की अँधेरी चारों तरफ़ फैल गयी, निद्रादेवी की हुकूमत में सभों पड़े हुए थे, यहाँ तक कि पहरेवालों की आँखें भी झिपी पड़ती थीं, उस समय मौका पाकर भैरोसिंह ने मेगजीन के पिछली तरफ़ कमन्द लगायी। दीवार के ऊपर चढ़ जाने के बाद कमन्द खैंच ली और फिर उसी के सहारे उतर गये। मेगजीन के अन्दर हज़ारों थैले बारूद के गँजे पड़े हुए थे, तोप के गोलों का ढेर लगा हुआ था, बहुत-सी तोपें भी पड़ी हुई थीं। भैरोसिंह ने यह मोमबत्ती जलायी और बारूद के थैलो के पास ज़मीन पर लगाकर खड़ी कर दी, इसके बाद फुर्ती से मेगजीन के बाहर हो गये और जहाँ तक दूर निकल जाते बना, निकल गये। उसी के घण्टे-भर बाद (जब मोमबत्ती का अनार छूटा होगा) बारूद में आग लगी और मेगजीन की इमारत जड़-बुनियाद से सत्यानाश हो गयी, हज़ारों आदमी मरे और सैकड़ों मकान गिर पड़े, बल्कि यों कहना चाहिए कि उसकी आवाज़ से रोहतासगढ़ की किला दहल उठा, ज़रूर कई कोस तक इसकी भयानक आवाज़ गयी होगी। पहाड़ी के नीचे बीरेन्द्रसिंह के लश्कर में जब यह आवाज़ पहुँची तो दोनों सेनापति समझ गये कि मेगजीन में आग लगी, क्योंकि ऐसी भयानक आवाज़ सिवाय मेगजीन उड़ने के और किसी तरह की नहीं हो सकती, बेशक यह काम भैरोसिंह का है।

मेगजीन उड़ने का निश्चय होते ही दोनों सेनापति बहुत प्रसन्न हुए और समझ गये कि अब रोहतासगढ़ का किला फतह कर लिया, क्योंकि जब बारूद का खजाना ही उड़ गया तो किले वाले तोपों के ज़रिये से हमें क्योंकर रोक सकते हैं। दोनों सेनापतियों ने यह सोचकर कि अब विलम्ब करना मुनासिब नहीं है किले पर चढ़ाई कर दी और दो हज़ार आदमियों को साथ ले नाहरसिंह पहाड़ पर चढ़ने लगा। यद्यपि दोनों सेनापति इस बात को समझते थे कि मेगजीन उड़ गयी है, तो भी कुछ बारूद तोपखाने में ज़रूर होगी, मगर यह खयाल उनके बढ़े हुए हौसले को किसी तरह रोक न सका।

इधर दिग्विजयसिंह अपनी ज़िन्दगी से बिल्कुल नाउम्मीद हो बैठा। जब उसे यह ख़बर पहुँची कि रामानन्द दीवान या ऐयार भी मारा गया और बहुत-सी तोपें भी कील ठुक जाने के कारण बर्बाद हो गयीं तब वह और बेचैन हो गया और मालूम होने लगा कि मौत नंगी तलवार लिये सामने खड़ी है। वह पहर-दिन चढ़े तक पागलों की तरह चारों तरफ़ दौड़ता रहा और तब एकान्त में बैठकर सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए। जब उसे जान बचाने की तरकीब न सूझी और यह निश्चय हो गया कि अब रोहतासगढ़ का किला किसी तरह नहीं रह सकता और दुश्मन लोग भी मुझे किसी तरह जीता नहीं छोड़ सकते तब वह हाथ में नंगी तलवार लेकर उठा और तहख़ाने की ताली निकाल कर यह कहता हुआ तहख़ाने की तरफ़ चला कि 'जब मेरी जान बच ही नहीं सकती तो बीरेन्द्रसिंह और उनके लड़के वगैरह को क्यों जीता छोड़ूँ? आज मैं अपने हाथ से उन लोगों का सिर काटूँगा।

दिग्विजयसिंह हाथ में नंगी तलवार लिये हुए अकेला ही तहख़ाने में गया, मगर जब उस दालान में पहुँचा, जिसमें हथकड़ियों और बेड़ियों से कसे हुए बीरेन्द्रसिंह वगैरह रक्खे गये थे, तो उसको खाली पाया। वह ताज्जुब में आकर चारों तरफ़ देखने और सोचने लगा कि कैदी लोग कहाँ गायब हो गये। मालूम होता है कि यहाँ भी ऐयार लोग आ पहुँचे मगर देखना चाहिए कि किस राह से पहुँचे?

दिग्विजयसिंह उस सुरंग में गया जो कब्रिस्तान की तरफ़ निकल गयी थी, वहाँ का दरवाज़ा उसी तरह बन्द पाया जैसा उसने अपने हाथ से बन्द किया था। आख़िर लाचार सिर पीटता हुआ लौट आया और दीवानख़ाने में बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

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