चन्द्रकान्ता - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

बीसवां बयान

तिलिस्म के दरवाज़े पर कुंवर वीरेन्द्रसिंह का डेरा जमा हो गया। खज़ाना पहले ही निकाल चुके थे, अब कुल दो टुकड़े तिलिस्म के टूटने को बाकी थे, एक तो वह चबूतरा जिस पर पत्थर का आदमी सोया था, दूसरे अजहदे वाले दरवाज़े को तोड़ कर वहां पहुंचना जहां कुमारी चन्द्रकान्ता और चपला थीं। तिलिस्मी किताब कुमार के हाथ लग चुकी थी, उसके कई पन्ने बाकी रह गये थे, आज पूरी पढ़ गये।

कुमारी चन्द्रकान्ता के पास पहुंचने तक जो-जो काम इनको करने थे सब ध्यान से पढ़ लिया, मगर उस चबूतरे के तोड़ने की युक्ति किताब में न देखी जिस पर पत्थर का आदमी सोया हुआ था, हां उसके बारे में इतना लिखा था कि वह चबूतरा एक दूसरे तिलिस्म का दरवाज़ा है जो तिलिस्म से कहीं बढ़-चढ़कर है और माल खज़ाने की तो इन्तहा नहीं कि उसमें कितना कुछ रखा हुआ है। वहां की एक-एक चीज़ें ऐसे ताज्जुब की हैं कि जिसके देखने से बड़े-बड़े दिमाग वालों की अक्ल चकरा जाये। उसके तोड़ने की विधि दूसरी ही है, ताली भी उसकी उसी आदमी के कब्जे में है जो उस पर सोया हुआ है।

कुमार ने ज्योतिषीजी की तरफ देखकर कहा, ‘‘क्यों ज्योतिषीजी क्या वह चबूतरे वाला तिलिस्म मेरे हाथ से न टूटेगा?’’

ज्योतिषी: देखा जायेगा, पहले आप चन्द्रकान्ता को छुड़ाइये।

कुमार : अच्छा चलिए, यह काम तो आज ही खत्म हो जायेगा।

तीनों ऐयारों को साथ लेकर कुंवर वीरेन्द्रसिंह उस तिलिस्म में घुसे जो कुछ उस तिलिस्मी किताब में लिखा हुआ था। खूब खयाल कर लिया और उसी तरह काम करने लगे।

खंडहर के अन्दर जाकर उस मामूली दरवाज़े* को खोला जो उस पत्थर वाले चबूतर के सिरहाने की तरफ था। नीचे उतर कर कोठरी में से होते हुए उसी बाग में पहुँचे जहाँ खजाने और बारादरी के सिंहासन का वह पत्थर हाथ लगा था जिसको छू कर चपला बेहोश हो गई थी और जिसके बारे में तिलिस्मी किताब में लिखा हुआ था ‘कि वह एक डिब्बा है और उसके अन्दर एक नायाब चीज़ रखी है।’ (*पहले लिख चुकें हैं कि इसकी ताली तेज़सिंह के सुपुर्द थी।)

चारों आदमी नहर के रास्ते गोता मार कर उसी जगह बाग के उस पार हुए जिस तरह चपला उसके बाहर गई थी और उसी तरह पहाड़ी के नीचे वाले नहर के किनारे-किनारे चलते हुए उस छोटे से दालान में पहुंचे जिसमें वह अजदहा था जिसके मुंह में चपला घुसी थी।

एक दीवार में आदमी के कद के बराबर काला पत्थर जड़ा हुआ था। कुमार ने उस पर ज़ोर से लात मारी, साथ ही वह पत्थर पल्ले की तरह खुल के बगल हो गया और नीचे उतरने की सीढ़ियां दिखाई पड़ी।

किताब से पहले ही मालूम हो चुका था कि यही खोह की-सी गली उस दालान में जाने के लिए राह है जहां चपला और चन्द्रकान्ता बेबस पड़ी हैं।

अब कुमारी चन्द्रकान्ता की मुलाकात होगी, इस खयाल से कुमार का जी धड़कने लगा, चपला की मुहब्बत ने तेज़सिंह के पैर हिला दिये। खुशी-खुशी ये लोग आगे बढ़े। कुमार सोचते जाते थे कि ‘‘आज जैसी निराली कुमारी चन्द्रकान्ता से मुलाकात होगी वैसी पहले कभी न हुई थी। मैं अपने हाथों से उसके बाल सुलझाऊंगा अपनी, चादर से उसके बदन की गर्द न झाड़ूंगा। हाय, बड़ी भारी भूल हो गई। वह फटे कपडों में कैसी दुःखी होगी? मैं उसके लिए कोई कपड़ा नहीं लाया इसलिए वह ज़रूर खफा होगी और मुझे खुदगर्ज़ समझेगी।’’ नहीं-नहीं, वह कभी दुःखी न होगी क्योंकि उसको मुझसे बड़ी मुहब्बत है, देखते ही खुश हो जायेगी, कपड़े का कुछ खयाल न करेगी। हां खूब याद पड़ा मैं अपनी चादर अपनी कमर में लपेट लूंगा और अपनी धोती उसे पहनाऊंगा इस वक़्त का काम चल जायेगा। (चौंक कर) यह क्या, सामने से कई आदममियों के पैर की चापें सुनाई पड़ती हैं। शायद मेरा आना मालूम करके चन्द्रकान्ता और चपला आगे से मिलने को चली आ रही हैं। नहीं-नहीं, उनको क्या मालूम कि मैं यहां आ पहुंचा हूँ।

ऐसी-ऐसी बातें सोचते धीरे-धीरे कुमार बढ़ रहे थे कि इतने में ही आगे दो भेड़ियों के लड़ने की आवाज़ आई जिसे सुनते ही कुमार के पैर दो-दो मन के हो गये। तेज़सिंह की तरफ देखकर कुछ कहना चाहते थे मगर मुंह से आवाज़ न निकली। चलते-चलते उस दालान में पहुंचे जहां नीचे खोह के अन्दर से कुमारी और चपला को बैठे देखा था।

पूरी उम्मीद थी कि चन्द्रकान्ता और चपला को यहां देखेंगे, मगर वे कहीं नज़र न आई, हां ज़मीन पर पड़ी दो लाशें ज़रूर दिखाई दीं जिनमें मांस बहुत कम था, सिर से पैर तक नुची हड्डी दिखाई देती थी, चेहरे किसी के भी दुरुस्त न थे।

इस वक़्त कुमार की कैसी दशा थी, वे ही जानते होंगे। पागलों की-सी सूरत हो गई, चिल्ला कर रोने और बकने लगे–‘‘हाय चन्द्रकान्ता तुझे कौन ले गया? नहीं, ले नहीं बल्कि मार गया? ज़रूर उन्हीं भेड़ियों ने तुझे मुझसे जुदा किया जिनकी आवाज़ यहां पहुंचने के पहले मैंने सुनीं थी। हां, वह भेड़िया बड़ा ही बेवकूफ था जो उसने तेरे खाने में जल्दी की उसके लिये तो मैं पहुंच ही गया था, मेरा खून पीकर वह बहुत खुश होता क्योंकि इसमें मुहब्बत की मिठास भरी हुई है! तेरे में क्या बचा था, सूख के पहले ही कांटा हो रही थी। मगर क्या सचमुच तुझे भेड़िया खा गया या मैं भूलता हूं? क्या यह दूसरी जगह तो नहीं है? नहीं नहीं, सामने दुष्ट शिवदत्त बैठा है। हाय, अब मैं जीकर क्या करूंगा, मेरी ज़िन्दगी किस काम आयेगी, मैं कौन मुंह लेकर महाराज जयसिंह के सामने जाऊंगा? आज नौगढ़ विजयगढ़ और चुनारगढ़ तीनों राज्य ठिकाने पर गये। मैं तो तुम्हारे पास ही आता हूं, मेरे साथ ही और कई आदमी आयेंगे जो तुम्हारी खिदमत के लिए बहुत होंगे। हाय, सत्यानाशी तिलिस्म ने, इस दुष्ट शिवदत्त ने, इन भेड़ियों ने आज बड़े-बड़े दिलावरों को खाक में मिला दिया! बस हो गया, दुनिया इतनी ही बड़ी थी, अब खत्म हो गई। हां, हां, दौड़ी क्यों जाती हो! लो मैं भी आया!

इतना कह और पहाड़ी के नीचे देख कुमार कूद करके अपनी जान देना ही चाहते थे और तीनों ऐयार सन्न खड़े देख ही रहे थे कि एकाएक भारी आवाज़ के साथ दालान की तरफ की दीवार फट गई और उसमें से एक वृद्ध महापुरुष ने निकल कर कुमार का हाथ पकड़ लिया।

कुमार ने मुड़कर देखा। लगभग अस्सी वर्ष की उम्र लम्बी-लम्बी सफेद रुई की तरह दाढ़ी नाभि तक आई हुई, सिर की लम्बी जटा ज़मीन तक लटकती हुई, तमाम बदन में भस्म लगाये, लाल और बड़ी-बड़ी आंखें निकाले, दाहिने हाथ में त्रिशूल उठाये, बायें हाथ से कुमार को थामे, गुस्से से बदन कंपाते तामसी रूप शिवजी की तरह दिखाई पड़े जिन्होंने कड़क कर आवाज़ दी और कहा, ‘‘खबरदार, जो किसी को विधवा करेगा।’’

यह आवाज़ इस ज़ोर की थी कि सारा मकान दहल उठा, तीनों ऐयारों के कलेजे कांप उठे। कुंवर वीरेन्द्रसिंह का बिगड़ हुआ दिमाग फिर से ठिकाने आ गया। देर तक उन्हें सिर से पैर तक देखकर कुमार ने कहा–

‘‘मालूम हुआ, मैं समझ गया कि आप साक्षात् शिवजी या कोई योगी हैं मेरी भलाई के लिए आये हैं। वाह, वाह खूब किया जो आ गये। अब मेरा धर्म बच गया, मैं क्षत्रिय होकर आत्महत्या के पाप से बच गया। एक हाथ आप से लड़ूंगा और इस अद्भुत त्रिशूल पर अपनी जान न्यौछावर करूंगा। आप ज़रूर इसलिए आये हैं, मगर महात्मा जी यह तो बताइए कि मैं किसको विधवा करूंगा। आप इतने बड़े महात्माजी, यह तो बताइये कि मैं किसको विधवा करूंगा? आप इतने बड़े महत्मा होकर झूठ क्यों बोलते हैं? मेरा है कौन? मैंने किसके साथ शादी की है? हाय, कहीं यह बात कुमारी सुनती तो उसको ज़रूर यकीन हो जाता, ऐसे महात्मा की बात भला कौन काट सकता है?’’

वृद्ध योगी ने फिर कड़क कर कहा, ‘‘क्या मैं झूठा हूं? क्या तू क्षत्रिय है? क्षत्रिय के यही धर्म होते हैं? क्या वे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाते हैं? क्या तूने किसी से विवाह की प्रतिज्ञा नहीं की? ले देख, पढ़ किसका लिखा हुआ है?’’

यह कह अपनी जटा के नीचे से एक चिट्ठी निकाल कर कुमार के हाथ में दे दी। पढ़ते ही कुमार चौंक उठे। ‘‘हैं, यह तो मेरी ही लिखा है! क्या लिखा है? मुझे सब कुछ मंजूर है! इसके दूसरी तरफ क्या लिखा है! हां अब मालूम हुआ यह तो उस वनकन्या की चिट्ठी हैं, इसी में उसने अपने साथ ब्याह करने के लिए मुझे लिखा था, उसी के जवाब मे मैंने उसकी बात कबूल की थी। मगर यह चिट्ठी इनके हाथ कैसे लगी? वनकन्या का इनसे क्या वास्ता?’’

कुछ ठहर कर कुमार ने पूछा, ‘‘क्या इस वनकन्या को आप जानते हैं? इसके जवाब में फिर कड़क के वृद्ध योगी बोले, ‘‘अभी तक जानने को कहता है! क्या उसे तेरे सामने कर दूं?’’

इतना कहकर एक लात ज़मीन पर मारी, ज़मीन फट गई* और उसमें से निकल कर वनकन्या ने कुमार का पांव पकड़ लिया। (जमीन का फटना संभव है या असम्भव, यह चौथे भाग में मालूम होगा।)

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