चन्द्रकान्ता - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

तीसरा बयान

कल रात से आज की रात कुमार की और भी भारी गुज़री। बार-बार उस बरवै को पढ़ते रहे। सवेरा होते ही उठे, स्नान-पूजा कर जंगल में जाने के लिए तेजसिंह को बुलाया, वे भी आये। फिर तेजसिंह ने मना किया मगर कुमार ने न माना, तब तेजसिंह ने उन तिलिस्मी फूलों में से गुलाब का फूल पानी में घिस कर कुमार और फतहसिंह को पिलाया और कहा कि ‘‘अब जहाँ जी चाहे घूमिये, कोई बेहोश करके आपको नहीं ले जा सकता, हाँ, जबरदस्ती पकड़ ले तो मैं नहीं कह सकता। कुमार ने कहा, ऐसा कौन है जो मुझको जबरदस्ती पकड़ ले।’’

पाँचों आदमी जंगल में गये, कुछ दूर पर कुमार और फतहसिंह को छोड़ तीनों ऐयार अलग हो गये। कुँवर वीरेन्द्रसिंह के साथ इधर-उधर घूमने लगे। घूमते-घूमते कुमार बहुत दूर निकल गये, देखा कि दो नकाबपोश सवार सामने से आ रहे हैं। जब कुमार से थोड़ी दूर रहे गये तो एक सवार घोड़े पर से उतर पड़ा और ज़मीन पर कुछ रख के फिर से सवार हो गया। कुमार उसकी तरफ बढ़े, जब पास पहुँचे तो वे दोनों सवार यह कह के चले गये कि इस किताब और चिट्ठी को ले लीजिए।

कुमार के पास जाकर देखा तो वही तिलिस्मी किताब नज़र पड़ी। उसके ऊपर एक चिट्ठी बगल में कलम-दवात और काग़ज़ भी मौजूद पाया। कुमार ने खुशी-खुशी उस किताब को उठा लिया और फतहसिंह की तरफ देख कर बोले, यह किताब देकर दोनों सवार चले गये सो कुछ समझ में नहीं आता मगर बोली से मालूम होता है कि वह सवार औरत है जिसने मुझे किताब उठा लेने के लिए कहा। देखें चिट्ठी में क्या लिखा है!’’ यह कह चिट्ठी खोल पढ़ने लगे, लिखा था–

‘‘मेरा जीवन तुममें अटका है और जिसको तुम चाहते हो वह बेचारी तिलिस्मी में फँसी है अगर उसको किसी तरह की तकलीफ होगी तो तुम्हारा जी दुःखी होगा। तुम्हारी खुशी से मुझको भी खुशी है यह समझ कर किताब तुम्हारे हवाले करती हूँ। खुशी से तिलिस्म तोड़ो और चन्द्रकान्ता को छुड़ाओ मगर मुझको भूल न जाना तुम्हें उसी की कसम जिसको ज़्यादा चाहते हो। इस चिट्ठी का जवाब लिखकर उसी जगह रख देना जहाँ से किताब उठाओगे।’’

चिट्ठी पढ़कर कुमार ने तुरंत जवाब लिखा–

‘‘इस तिलिस्मी किताब को हाथ में लिये मैंने जिस वक़्त तुमको देखा उसी वक़्त से तुम्हारे मिलने को जी तरस रहा है, मैं उस दिन अपने को बड़ा भाग्यवान मानूँगा जिस दिन मेरी आँखें दोनों प्रेमियों को देख-देख ठंडी होंगी मगर तुमको तो मेरी सूरत से नफरत है।

–तुम्हारा वीरेन्द्र

जवाब लिखकर कुमार ने उसी जगह पर रख दिया। वे दोनों सवार दूर खड़े दिखाई दिये, कुमार देर तक खड़े राह देखते रहे मगर वे नज़दीक न आये, जब कुमार दूर हट गये तब उसमें से एक ने आकर चिट्ठी का जवाब उठा लिया और देखते-देखते नज़रों से ओझल हो गया। कुमार भी फतहसिंह के साथ लश्कर में आये।

कुछ रात गये तेजसिंह भी आकर कुमार के खेमें में इकट्ठे हुए। तेजसिंह ने कहा, आज भी किसी का पता न लगा, हाँ कई नकाबपोश सवारों को इधर-उधर घूमते देखा। मैंने चाहा कि उनका पता लगाऊँ मगर न हो सका, क्योंकि वे लोग भी चालाकी से घूमते थे, मगर कल ज़रूर हम उन लोगों का पता लगा लेंगे।

कुमार ने कहा, देखो तुम्हारे किये कुछ न हुआ मगर मैंने ऐयारी की खोई हुई चीज़ को ढूँढ निकाला, देखो यह तिलिस्मी किताब। यह कह कुमार ने किताब तेजसिंह के आगे रख दी।

तेजसिंह ने कहा, आप जो कुछ ऐयारी करेंगे वह तो मालूम ही है मगर यह बताइये कि किताब कैसे हाथ लगी? जो बात होती है, ताज्जुब की!’’

कुमार ने किताब पाने का सारा हाल कह सुनाया, तब चिट्ठी दिखाई और जो कुछ लिखा वह भी कहा।

ज्योतिषीजी ने कहा, क्यों न हो, फिर बड़े घर की लड़की है, किसी तरह से कुमार को दुःख देना पसन्द न किया। सिवाय इसके चिट्ठी पढ़ने से यह मालूम होता है कि वह कुमार के पूरे हाल से वाकिफ है, मगर हम लोग बिलकुल नहीं जान सकते कि वह है कौन?’’

कुमार ने कहा, इसकी शर्म तो तेजसिंह को होनी चाहिये कि इतने बड़े ऐयार होकर दो-चार औरतों का पता नहीं लगा सकते।’’

तेजसिंह : पता तो ऐसा लगायेंगे कि आप भी खुश हो जायेंगे, मगर अब किताब मिल गई है तो पहले तिलिस्म के काम से छुट्टी पा लेना चाहिए।’

कुमार : तब तक क्या है सब बैठी रहेंगी?

तेजसिंह : क्या अब आपको कुमारी चन्द्रकान्ता की फिक्र न रही?

कुमार : क्यों नहीं, कुमारी की मुहब्बत तो मेरे नस-नस में बसी हुई है, मगर तुम भी तो इन्साफ करो कि इसकी मुहब्बत मेरे साथ कैसी सच्ची है, यहाँ तक कि मेरे ही सबब से कुमारी चन्द्रकान्ता को मुझसे भी बढ़ के समझ रक्खा है।

तेजसिंह : हम यह तो नहीं कह सकते कि उसकी मुहब्बत की तरफ खयाल न करें, मगर तिलिस्म का भी खयाल होना चाहिए।

कुमार : तो ऐसा करो जिसमें दोनों का काम चले।

तेजसिंह : ऐसा ही होगा, दिन को तिलिस्म तोड़ने का काम करेंगे रात को उन लोगों का पता लगायेंगे।

आज की रात फिर उसी तरह कटी, सवेरे कामों से छुट्टी पाकर कुँवर वीरेन्द्रसिंह तेजसिंह, और ज्योतिषीजी तिलिस्म में घुसे, तिलिस्मी किताब साथ थी। जैसे-जैसे उसमें लिखा हुआ था उसी तरह ये लोग तिलिस्म तोड़ने लगे।

तिलिस्मी किताब में पहले ही यह लिखा हुआ था कि तिलिस्मी तोड़ने वाले को चाहिए कि जब पहर दिन बाकी रहे तिलिस्म से बाहर हो जाये और उसके बाद कोई काम तिलिस्म तोड़ने का न करे।

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