भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

दूसरा बयान


भूतनाथ भी अजीब आदमी है! उसके मन में क्या तरंग उठेगी और अपने किस विचार को पूरा करने के लिए वह कब कौन-सा काम कर बैठेगा यह कुछ भी कहा नहीं जा सकता।

जाहिर में तो वह दारोगा से खफा हो उसका साथ छोड़ किसी दूसरी तरफ को चल दिया था मगर वास्तव में मूरत की जुबानी सुनी हुई बातों ने उसके दिल में हौल पैदा कर दिया था और यही सबब था कि थोड़ा समय इधर-उधर घूमने-फिरने के बाद वह चक्कर काटता हुआ पुनः उसी कुएं की तरफ आ निकला-अगर वह चाहता तो दारोगा का पीछा कर सकता था मगर उसका इरादा कुछ दूसरा ही था और यही सबब था कि इधर-उधर की अच्छी तरह आहट लेकर यह निश्चय कर लेने के बाद कि कुएं के चारों तरह सन्नाटा है और किसी आदमी के वहाँ मौजूद रहने का कोई निशान नहीं है, वह उसी कुएं के अन्दर उतर गया।

धूर्त और चालाक भूतनाथ को अपने काम में किसी रोशनी की मदद लेने की जरूरत न पड़ी। वह अन्धकार में ही टटोलता हुआ नीचे उतरा न-केवल उस सुरंग तक जा पहुंचा जो उस कुएं के बीचोंबीच बनी हुई थी बल्कि उसे पार कर उस मूरत के पास पहुंच गया। यहाँ पहुंच और उस मूरत की अद्भुत बातों और तिलिस्मी करामात को याद कर वह एक बार कांप गया और उसकी इच्छा हुई कि और कुछ नहीं तो कम-से-कम रोशनी तो कर ही ले मगर उसके दिल ने कबूल न किया और वह हिम्मत बाँध मूरत के बगल से होता हुआ उस आगे वाली राह में घुस गया जिसमें से आते हुए उसे दारोगा ने देखा था।

लगभग आधी घड़ी तक भूतनाथ उस अंधेरी भयावनी और तंग सुरंग में चलता रहा। इस बीच में सिवाय एक बार एक सायत के लिए रोशनी करके अपने नीचे की जमीन पर कुछ देखने के उसने बिल्कुल अन्धकार में जाना ही पसन्द किया और कहीं भी रोशनी की मदद न ली। हम नहीं कह सकते कि उसने ऐसा क्यों किया या रास्ते में इस सुरंग के अन्दर वह किन-किन या कैसी-कैसी चीजों के बगल से गुजर गया मगर अब अपना यह सफर समाप्त कर वह जहाँ पर रुका और मोमबत्ती जलाई वह जरूर एक अद्भुत और डरावना स्थान था।

एक बड़ा कमरा जिसकी छत उसकी लम्बाई-चौड़ाई के ख्याल से नीची थी, तरह-तरह के खौफनाक सामानों से भरा हुआ था, जिस पर भूतनाथ के हाथ की मोमबत्ती अपनी कांपती हुई रोशनी डाल रही थी। चारों तरफ की दीवारों के साथ सजाकर रखी हुई तरह-तरह के जानवरों की ठठरियों की कतार नजर आ रही थी जिनमें से कुछ तो पूरी थी मगर कुछ टूट-फूटकर अपने स्थान के नीचे ही जमीन पर बिखर गई थीं। छोटी-बड़ी तरह-तरह की ठठरियां सब जगह मौजूद थीं जिनको देखने से डर के साथ-साथ यह भी ख्याल होता था कि शायद ही ऐसा कोई जानवर होगा जिसकी ठठरी यहाँ मौजूद न हो, इस कमरे के बीचोबीच हड्डियों का एक ढेर चबूतरे की तरह पर बना हुआ था और उस ढेर के ऊपर मनुष्य की हड्डियों का एक ढांचा कुछ विचित्र ढंग से रखा हुआ था अर्थात उसकी गर्दन एक लोहे की जंजीर से बंधी हुई थी जो ऊपर छत तक चली गई थी और उसके दोनों हाथों को दो तरफ से खींचे हुए पतली जंजीरें दोनों बगल की जमीन के अन्दर घुस गई थीं। इसके चारों तरफ चार हड्डियों के ढांचे और थे जो किसी छोटे जानवर सियार या कुत्ते के मालूम होते थे। यकायक देखने से ऐसा मालूम होता था मानों कोई आदमी फांसी पर लटका दिया गया है और ये जानवर उसके चारों तरफ बैठे उसके मरने की राह देख रहे हैं।

यह सब सामान ऐसा था जो किसी देखने वाले के दिल में डर और घबराहट पैदा कर सकता था मगर भूतनाथ के मजबूत दिल में ऐसी बातों के लिए बहुत ही कम जगह थी। वह बिना इधर-उधर एक निगाह भी डाले सीधा उन हड्डियों के ढेर पर चढ़ गया और जिस जगह वह आदमी बैठा हुआ था उसके नीचे की तरफ हाथ डाल हड्डियों के ढेर के अन्दर कुछ टटोलने लगा।

मगर यकायक वह घबरा गया। शायद जो कुछ वहाँ खोज रहा था वह चीज उसे नहीं मिली अथवा क्या बात थी, कि वह घबराकर फुर्ती-फुर्ती हाथ चलाने लगा और जब इस पर भी काम न चला तो वहाँ की हड्डियाँ उठा-उठाकर चारों तरफ फेंकने लगा, मगर इससे भी उसकी इच्छा पूरी न हुई। उस जगह की बहुत-सी हड्डियां हटा डालने पर भी जिसकी खोज में वह था सो चीज उसे न मिली और अन्त में परेशान और बदहवास-सा होकर जमीन पर बैठ माथे पर हाथ रख कुछ सोचता हुआ बोला, ‘‘आखिर, जिसका मुझे डर था वही हुआ और कम्बख्त दुश्मन वह ताली ले ही गए। हो न हो यह काम भी शैतान दारोगा का ही है।’’

मगर यकायक भूतनाथ चौंक पड़ा। उसके कान में किसी के खिलखिलाकर हंसने की आवाज पड़ी थी जिसे सुन वह ताज्जुब के साथ अपने चारों तरफ देखने लगा मगर किसी की सूरत दिखाई न पड़ी। अपने कानों का भ्रम समझ वह फिर अपनी बात सोचने लगा मगर थोड़ी देर के बाद उसी तरह की हंसी की आवाज सुन वह फिर चकराया और उठकर गौर से चारों तरफ देखने लगा पर कहीं किसी नई शक्ल पर उसकी निगाह न पड़ी। चारों तरफ केवल वे ही भयानक ठठरियां अपने विकराल दाढ़ों से हंसती हुई खड़ी थीं। बड़े ताज्जुब के साथ उसके मुँह से निकला, ‘‘क्या बात है! मेरे कान खराब हो गये हैं या सचमुच यहाँ कोई हंसा?’’

यह सवाल भूतनाथ ने अपने ही से किया था और उसे भी गुमान न था कि कोई जवाब भी मिलेगा, मगर उसके ताज्जुब का कोई ठिकाना न रहा जब उसके कान में यह आवाज गई, ‘‘नहीं, तुम्हारे कानों का भ्रम नहीं, सचमुच ही मैं तुम्हारी बेवकूफी पर हंस पड़ा था!’’

यह क्या, यह कौन बोला? कहीं किसी आदमी की सूरत तो दिखाई नहीं पड़ती! तब यह बात किसने कही? आवाज बाईं तरफ से आई है। इधर तो वह सामने मनुष्य की हड्डियों का ढांचा खड़ा है और कुछ नहीं है। तब वह कौन बोला? भूतनाथ परेशानी के साथ कुछ देर चारों तरफ देखता रहा, तब बोला, ‘‘किसने यह बात कही?’’

देखकर भी भूतनाथ को विश्वास न हुआ। उसके सामने जो मनुष्य की हड्डियों का ढांचा खड़ा था उसके दाढ़ जरा-सा हिले और उसके बिना जुबान के विकराल मुंह से यह आवाज निकली, ‘‘मैंने ही वह बात कही थी!’’

भूतनाथ का हाथ उसके खंजर पर गया और वह झपटकर उस ढांचे के पास पहुंचा मगर जान तो क्या लहू, मांस, खून और चमड़े से भी रहित एक बेजान हड्डियों के ढांचे से वह कहे भी तो क्या और उससे बदला भी ले तो कैसे? वह परेशान हो उस ढांचे के सामने खड़ा हो रहा।

उसके कानों के साथ-साथ क्या उसकी आंखें भी खराब हो गईं! क्या हड्डियों का निर्जीव ढांचा सिर्फ बोल ही नहीं सकता बल्कि चल-फिर भी सकता है!

भूतनाथ ने ताज्जुब के साथ देखा कि हड्डियों का ढांचा अपनी जगह से हिला और लड़खड़ाता हुआ उसकी तरफ दो कदम बढ़कर बोला, ‘‘क्यों भूतनाथ, तुम्हें ताज्जुब किस बात का हो रहा है जो इस तरह मेरी तरफ देख रहे हो?’’

बड़ी हिम्मत के साथ अपने होश-हवास ठिकाने रख भूतनाथ ने जवाब दिया, ‘‘भला हड्डियों की एक ठठरी को चलता-फिरता और बोलता देख किसे ताज्जुब न होगा!’’

ढांचे ने जवाब दिया, ‘‘तुम्हें मालूम है कि यह तिलिस्म का एक हिस्सा है जहाँ तुम हो और यह भी जानते हो कि तिलिस्म में सभी कुछ सम्भव है।’’

भूत० : बेशक पहली बात मैं जानता हूँ पर यह नहीं जानता कि यहाँ सब कुछ सम्भव है। जो काम मनुष्य के लिए नहीं हो सकता वह कोई तिलिस्म भी नहीं दिखा सकता।

मैं तो समझता हूँ कि तुम कोई धूर्त और चालाक ऐयार हो जो इस तरह अपने को छिपाकर मुझे डराना और अपना काम निकालना चाहते हो। साफ-साफ कहो कि तुम कौन हो और तुम्हारा क्या मतलब है?’’

ढांचा : जो कुछ मैं कहूँ वह तो तुम देख ही रहे हो और जो मैं करना चाहता हूँ वह जानने से अब तुम्हारा कोई फायदा न होगा क्योंकि उसे मैं कर गुजरा।

भूत० : सो क्या?

ढांचा : किसी चीज को लेने मैं आया था और उसे लेकर अब मैं जा रहा हूँ!

भूत० : वह कौन-सी चीज है, क्या मैं जान सकता हूँ?

ढांचा : हाँ-हाँ क्यों नहीं। इसके जानने के पहले हकदार तो तुम्हीं हो। अच्छा मैं वह चीज तुम्हें दिखाता हूँ।

हड्डियों के ढांचे का हाथ जिसमें केवल कलाई और उंगलियों की हड्डियां ही दिखाई पड़ती थीं हिला और एक क्षण के लिए उसके पीछे की तरफ गया। इसके साथ ही वह सामने की तरफ बढ़ा और भूतनाथ को उसके हाथ में एक ऐसी चीज दिखलाई पड़ी जिसने उसे इतना घबरा दिया कि उसके मुंह से एक चीख निकल पड़ी।

सोने का बना हुआ और जिसमें जगह-जगह बेशकीमती जवाहरात जड़े हुए थे ऐसा करीब बालिश्त भर ऊंचा एक उल्लू था जो हड्डियों के हाथ में अपनी विचित्र चमक-दमक से चकाचौंध पैदा कर रहा था। इसी उल्लू को देख भूतनाथ चौंका और बदहवास हो गया था।

भूतनाथ की घबराहट देख वह हड्डियों का ढांचा भयानक रीति में हंस पड़ा और उसकी डरावनी आवाज उस बन्द जगह में गूंज गई। उसने भूतनाथ की तरफ सिर घुमाया, ‘‘अच्छा भूतनाथ, तुमने देख लिया कि मैं किसलिए यहाँ आया और क्या चीज लेकर चला, अस्तु अब मैं जाता हूँ।’’

मगर इतना सुनते ही भूतनाथ ने चौंककर अपना खंजर निकाल लिया और गुस्से में भरकर बोला, खबरदार! वह चीज मेरे जिगर का खून है जो तुम्हारे हाथ में दिखाई पड़ रही है। समझ रखो भूत हो, प्रेत हो, जिन्न हो या कोई तिलिस्मी आसेब ही क्यों न हो, पर अब तुम भूतनाथ के हाथों अपनी जान बचा नहीं सकते!!’’

इसमें कोई शक नहीं कि भूतनाथ बड़े जीवट का आदमी था। जिन हड्डियों की ठठरी को देख साधारण मनुष्य के डर से होश-हवास हो जाते उसी पर उसने बड़ी हिम्मत और दिलावरी से हमला किया और खंजर का एक हाथ पैंतरे के साथ उसकी तरफ चलाया। मगर इसका नतीजा वैसा न हुआ जो कि भूतनाथ सोचे हुए था। वे हड्डियां थीं या फौलादी कि उनसे टकरा भूतनाथ का खंजर कब्जे से अलग हो गया और झनझनाहट की आवाज के साथ जमीन पर गिर पड़ा। भूतनाथ ताज्जुब के साथ उस आसेब का मुंह देखने लगा जिसने उसके ताज्जुब को देख हंसकर कहा, ‘‘कहा, ‘‘और कोई हथियार तुम्हारे पास है या मैं दूं?’’

भूत० : (जिस पर गुस्से ने अपना पूरा असर कर लिया था मगर जो अपने को हर तरह से लाचार पाता था) कम्बख्त शैतान, मैं समझ गया कि तू जरूर कोई चालाक ऐयार है जो इस पर्दे के अन्दर अपने को छिपाए हुए है। अच्छा रह मैं तुझे इस शैतानी का मजा चखाता हूँ!

बड़ी फुर्ती के साथ भूतनाथ ने अपना बटुआ खोला और उसके अन्दर से छोटे-छोटे दो गेंद निकाले जिनमें से एक उसने अपनी पूरी ताकत से उस शैतान की तरफ चलाया। गेंद उस ढांचे से टकराते ही बड़े जोर की आवाज के साथ फूटी और उसमें से आग की लपट, शोले और धुएं के बादल निकलने लगे। वह शैतान दो कदम पीछे को हटा ही था कि तब तक भूतनाथ का फेंका दूसरा गेंद पहुंचा और इसने और भी गजब कर दिया। इन दोनों गेदों से निकालने वाले आग और धुएं से शैतान एकदम ढंक गया।

आग के शोलों से वह शैतान ही क्यों समूचा कमरा ढंक गया था और इसमें कोई शक नहीं कि मामूली आदमी तो क्या वहाँ अगर कोई पत्थर का पुतला भी होता तो साबुत न बचता मगर वह शैतान न-जाने किस चीज का बना था कि इस हमले ने भी उसका बाल न बांका किया। धुएं के अन्दर से उसकी भयानक गरज भूतनाथ को सुनाई पड़ी और तभी उसने देखा कि जहाँ वह शैतान खड़ा था उस जगह आग का एक फव्वारा-सा पैदा हो रहा है जिसकी लपट और तेजी से क्षण-क्षण में बढ़ती जा रही है और जो कुछ की सायत में यहाँ तक बढ़ी कि भूतनाथ के फेंके बम के गोलों की लपट और आंच उसके आगे की फीकी पड़ गई।

भूतनाथ ताज्जुब के साथ यह तमाशा देख रहा था कि उस आंच के बीच में से आवाज आई, ‘‘अच्छा भूतनाथ होशियार रहना! तुमने मुझ पर हमला किया है, उस पर- जो तुम्हारी पिछली सब करतूतों से अच्छी तरह वाकिफ है, जो तुम्हारी नस-नस को पहचानता है! तुम्हारी वह प्यारी चीज जिसके लालच में तुमने बड़े-बड़े पातक किए अर्थात् शिवगढ़ी की चाबी तो मैं ले ही जा रहा हूँ साथ ही यह भी सुन रखो कि भानुमति का पिटारा भी मेरे कब्जे में आ गया है। बहुत जल्द उसका भेद इस दुनिया में सब पर जाहिर करके मैं तुम्हें जीते दोजख में पहुंचा दूंगा!’’

न-जाने इन शब्दों के भीतर कौन-सा भेद छिपा हुआ था कि इन्हें सुनने के साथ ही भूतनाथ के मुंह से एक चीख की आवाज निकल पड़ी और वह बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ा।

जब भूतनाथ होश में आया, उसने अपने को एक नाले के किनारे हरी-हरी दूब पर पड़ा हुआ पाया। पौ फट चुकी थी और पूरब की तरफ का आसमान लाली पकड़ रहा था। अपने रंगीन पंखों की खूबसूरती के साथ-साथ सुरीली तानों से मन को प्रसन्न कर देने वाली नाजुक चिड़ियों ने इस डाल से उस डाल पर फुदकना शुरू कर दिया था और दक्खिन तरफ से आने वाली खुशबूदार जंगली हवा के झपेटे दिलोदिमाग के साथ तन-बदन को भी मस्ती और ताकत देने लगे थे।

मगर भूतनाथ के परेशान दिमाग को इन सब चीजों को देखने-समझने और इनका आनन्द लेने की फुरसत ही कहाँ?

वह तो होश में आने के साथ ही उठकर बैठ गया और इधर-उधर देखता हुआ ताज्जुब के साथ बोल उठा, ‘‘हैं, मैं कहाँ हूँ?’’ इसके साथ ही उसकी निगाह एक आदमी पर पड़ी जो इसके सिरहाने की तरफ बैठा हुआ था और अब तक शायद उसके माथे को पानी से तर कर रहा था। उसको देखते ही वह ताज्जुब के साथ बोल उठा, ‘‘है, शेरसिंह, तुम यहाँ कहाँ!’’

शेरसिंह ने कहा, ‘‘पहले यह बताओ कि तुम यहाँ कहाँ? ऐसी सुनसान निराली जगह में एकदम बेहोश और अकेले तुम क्यों और कब के पड़े हुए हो?’’

भूत० : (ताज्जुब से) मैं इस मैदान में पड़ा हुआ था!

शेर० : हाँ, और ऐसी गहरी बेहोशी की हालत में कि बार-बार लखलखा सुँघाने माथा तर करने और हवा खिलाने पर भी बड़ी मुश्किल से तुम्हें होश आई है। वह तो कहो कोई खूँखार जानवर इधर से नहीं गुजरा, नहीं तो....

भूत० : अफसोस कि ऐसा न हुआ, नहीं तो अच्छा ही होता और मेरी मुसीबतों का खात्मा हो जाता!

शेर० : (ताज्जुब से) इसके क्या माने?

भूत० : इसके माने यह कि भूतनाथ की जिन्दगी का खात्मा हो गया, आज से जीते-जी कोई मुझे इस सूरत और हालत में देख नहीं सकता।

शेर० : अब इस तरह पहेली बुझाने से तो काम नहीं चलेगा। तुम जरा खुलासा और साफ-साफ कहो कि क्या मामला है और तुम्हारा मतलब क्या है?’’

भूत० : साफ-साफ कहने की जरूरत ही क्या है मेरे भाई। तुम्हें तो मेरा सब हाल शुरू से आखिर तक मालूम ही है। तुम अच्छी तरह जानते हो कि किस चीज की लालच मुझे सबसे ज्यादा थी और किसके लिए मैंने जमाने-भर के पाप किए और दुनिया भर में बदनाम हुआ। बस इतने से ही समझा लो कि वह ‘सोने का उल्लू’ मेरे कब्जे से निकलकर मेरे दुश्मन के पास चला गया!

शेर० : (चौंककर) हैं! यह तुम क्या कर रहे हो?

भूत० : बस वही जो मैंने कहा।

शेर० : सोने का उल्लू तुम्हारे दुश्मन के कब्जे में चला गया? किस दुश्मन के?

भूत० : उसी तिलिस्मी शैतान के?

शेर० : कौन तिलिस्मी शैतान?

भूत० : वही जिसका हाल मैं तुमसे कह चुका हूँ। गंगापुर के पास एक मैदान में जिसको मैंने देखा था, या जिसने ‘रोहतासगढ़ के पुजारी’ के नाम से अपना परिचय दिया था।१ (१. देखिये सोलहवें भाग का अन्त।)

शेर० : मेरी समझ में कुछ नहीं आता कि तुम क्या कर रहे हो! तुम साफ-साफ सही-सही मामला पूरा मुझसे कहो तो मेरी समझ में आए और मैं कोई राय कायम कर सकूं।

इसके जवाब में ‘बहुत अच्छा’ कह भूतनाथ कुछ घटा-बढ़ी के साथ वह सब किस्सा बयान कर गया जो पिछले हिस्से में पाठक पढ़ चुके हैं, अर्थात् जिस समय झोंपड़े के अन्दर शेरसिंह के सामने कामेश्वर ने उसके आगे प्रकट होकर उसके किसी पुराने पाप का भण्डा फोड़ा था और वहीं मौका पा उस पीतल की सन्दूकड़ी और तस्वीर को ले उस झोंपड़े के बाहर गया था १ उस समय से लेकर अब तक का सब किस्सा यानी वह तस्वीर और पीतल की सन्दूकड़ी लेकर भागना, किसी का उसे कुएं में ढकेलकर उन दोनों को ले लेना, शागिर्दों की मदद से कुएं के बाहर निकलना, राजा बीरेन्द्रसिंह के महल से रिक्तगन्थ चुराना, उसे लाकर रामदेई को देना (भूतनाथ अभी तक नहीं जानता कि यह नागर का काम है), नानक के मुंह से उसका विचित्र हाल सुनना और रिक्तगन्थ वापस लेने जाकर जख्मी होना, नानक को अपने गायब होने की बात कह श्यामा के पास जाना, वहाँ कुछ दिन बीमार रहने के बाद उस लुटिया पहाड़ी पर तिलिस्मी कुएं में अपनी चीज खोजने जाना।उसको सही-सलीमत देख वापस लौटना, रास्ते में दारोगा से भेंट और पुतले की विचित्र बातचीत और अन्त में पुन: उस ठठरियों वाले कमरे में जाकर उस चीज को गायब और शैतान के हाथ में पाना, यह लम्बा किस्सा वह बयान कर गया। शेरसिंह चुपचाप ध्यान से सब कुछ सुनता रहा और जब अपना हाल कह भूतनाथ चुप हो रहा तो एक लम्बी सांस फेंककर बोला, ‘‘देखो भूतनाथ, मैं बार-बार जिस बात से तुमको होशियार करता था वही आखिर सामने आई! जिस चीज की लालच में तुमने सब दुष्कर्म किए वह चीज भी तुम्हारे हाथ से निकल गई और अब तुम्हारे पिछले भेद प्रकट होकर तुम्हें दुनिया में किसी के आगे मुंह दिखाने लायक भी न रखेंगे। तुम्हें याद होगा कि मैंने तुमसे कहा था कि शिवदत्त, दारोगा और मायारानी तीनों को चकमा देकर अपना काम निकालना तो चाहते हो मगर इस काम का नतीजा अच्छा न होगा, अगर कभी भंडा फूटा तो तुम दुनिया भर में अपना मुँह छिपाते फिरोगे और किसी काम के न रह जाओगे, क्यों कही थी न मैंने यह बात!’’ (१. देखिये भूतनाथ अट्ठारहवाँ भाग, तीसरा बयान।)

भूतनाथ की आँखों से आंसू गिरकर उसके कपड़ों को तर कर रहे थे। वह भरे हुए गले से बोला, ‘‘बेशक मेरे भाई, तुमने यह बात कही थी और जो कुछ कहा उसका एक-एक हरुफ अब सामने आना चाहता है। अफसोस मैं भी कैसा अभागा हूँ!

शेर० : अभागा नहीं बल्कि ये कहो कि अपने सुख-सौभाग्य को अपने पैर से ठुकरा देने वाला! कैसे मजे में तुम रणधीरसिंह के यहाँ रहते थे, अपनी स्त्री और लड़के-बच्चे के साथ सुख की जिन्दगी बिताते थे! तिलिस्म खोल तिलिस्मी खजाना लेकर अमीर बनने की लालच तुम्हारे मन में उठी। दारोगा के दिखाए सब्जबाग में तुम फंस गए और शिवदत्त की बातों में पड़ तुमने वह काम कर डाला जिसे छोटी-से-छोटी तबीयत का आदमी भी न करता। उस शिवगढ़ी की ताली पा तुम फूले न समाते थे, मगर मैंने तुमसे उसी वक्त कहा था कि तुम बदनाम हो जाओगे और कहीं के न रहोगे। कहो, हुई न वही बात?

भूत० : बेशक। जो-जो आपने कहा वही-वही हुआ। अफसोस मैं कहीं का न रहा!

शेर० : खैर तो अब क्या विचार है? अब तुम क्या चाहते हो?

भूत० : अब भी मैं क्या कुछ करने लायक रह गया? क्या आपने गौर नहीं किया कि उस शैतान ने आखिरी बात मुझको क्या कही थी? ‘भानुमति का पिटारा’ इस जुमले के मानी पर क्या आपने गौर नहीं किया?

शेर० : बेशक गौर किया और अच्छी तरह समझ लिया कि अब तुम दीन-दुनिया कहीं के न रहे। इसी से तो मैं पूछ रहा हूँ कि अब तुम्हारा क्या विचार है? क्या अभी तिलिस्मी खजाना लेकर अपना घर भरने की इच्छा तुम्हारे मन में बनी है?

भूत० : (हाथ जोड़कर) अब बार-बार उन्हीं बातों को दोहरावें नहीं मैं कह जो चुका कि अब मैं कहीं का न रहा। उस झोंपडे में ही मैंने आपसे कहा था कि अब जीते रहने की इच्छा मेरे मन में नहीं है, अब आज वाली घटना हो जाने के बाद भी क्या मैं पुन: इस दुनिया में रह सकता हूँ?

शेर० : तुम्हारा क्या विचार है? क्या तुम अपनी जान दे देना चाहते हो?

भूत० : बेशक दे देना चाहता हूँ, मगर अभी नहीं पहले अपने दुश्मनों से पूरा-पूरा बदला लेकर जिनके सबब से मैं इस हालत को पहुंचा जमाने के आगे इस बात को रखकर कि मैं उतना बड़ा कसूरवार नहीं जितना दुनिया मुझे समझती है, तभी मैं अपनी जान दूंगा। बचने की कोई साध मेरे मन में बाकी नहीं है।

शेर० : अपने माथे की बदनामी दूर करने का ख्याल तो जितना कुछ बना रहे अच्छा ही है मगर मैं यह समझ नहीं पाया कि तुम कैसे अपने को बेकसूर साबित करोगे? खैर यह सब तुम्हारे सोचने की बात है जैसा चाहो करो और जो उचित समझो करो, मैं इस बारे में कर ही क्या सकता हूँ।

भूत० : नहीं-नहीं मेरे भाई, इस वक्त अगर कोई मेरी मदद कर सकता है तो तुम्हीं हो। तुम्हारी मदद के वगैरह जो कुछ मैंने सोचा है, वह किसी तरह पूरा नहीं हो सकता।

शेर० : (ताज्जुब के साथ) तुमने क्या सोचा है और मेरी कैसी मदद तुम चाहते हो?

भूत० : बस दो काम तुम मेरे लिए कर दो, एक तो यह कि कोई छिपने की जगह मुझे ऐसी बताओ जहाँ रहकर मैं दुनिया का हाल-चाल मालूम कर सकूँ और दूसरा यह कि मैं इस दुनिया से उठ गया इस खबर को सब तरफ फैला दो, इस खूबी के साथ कि किसी को इसमें कोई सन्देह न रह जाय।

शेर० : (कुछ सोचता हुआ) दोनों ही काम कुछ मुश्किल तो हैं मगर असम्भव नहीं। लेकिन मेरे दोस्त, मैं अब तक न समझा कि तुम क्या सोच रहे हो, तुम्हारा असली मतलब क्या है और अपने को मरा मशहूर करके तुम क्या करना चाहते हो?

भूत० : बदनामी की कालिख में मैं अपना चेहरा खूब अच्छी तरह रंग चुका। पहले जब दयाराम वाला भण्डा फूटा था तो मैं कलेजे पर सिल रखकर बैठा रह गया था और बेहयाई के अन्दर अपना मुंह छिपा इन्द्रदेव के वायदे पर विश्वास कर इस कारण चुप रह गया था कि वह सब किस्सा दुनिया की निगाहों से छिपा ही रह जायेगा। मगर उसके बाद इधर मेरे इस दूसरे और उससे भी भयानक तीसरे पातक का भण्डा फूटने को हुआ है और अब मेरे लिए किसी को मुंह दिखाना असंभव हो गया है। अब अगर कुछ हो सकता है तो यही कि कोशिश करके इस दुनिया में नेकनाम बनूं और यह बताऊं कि इन मामलों से पूरा कसूर मेरा ही नहीं है और मैं व्यर्थ ही बदनाम किया जा रहा हूँ। अगर दस काम मेरे हाथ से बुरे हो चुके हैं तो सौ काम अच्छे करके मैं इस दुनिया की निगाहों को पलट देना चाहता हूँ। कहो मेरे दोस्त, क्या इस काम में मेरी मदद करने की हिम्मत तुममें है?

शेर० : (जोश के साथ) बेशक है, हजार बार है! भला नेकनामी का ख्याल तो तुम्हारे मन में उठा! मैं हमेशा ही सब तरह से तुम्हारी मदद करने को तैयार था और अब भी हूँ, मगर पहले तुम साफ-साफ मुझसे बताओ कि तुम्हारा विचार क्या है? कहीं ऐसा न हो कि तिलिस्म खोलकर अमीर बनने के तुम्हारे उस पिछले विचार की तरह नेकनाम बनने का तुम्हारा यह इरादा भी कुछ उल्टा रंग लाए और पीछे तुम्हारे साथ-साथ मुझसे भी दीन-दुनिया छुड़ा दे!

भूत० : (कुछ अफसोस के साथ शेरसिंह का मुंह देखकर) अफसोस तुमने कभी मुझ पर सच्ची तरह से यकीन न किया! तुम हमेशा मेरे सब कामों को शक की निगाह से देखते रहे!!

शेर० : और तुम मंजूर करोगे कि मेरा शक हर हालत में सही निकला। मगर खैर, यह बात मैं ताने के साथ नहीं कह रहा हूँ। मुमकिन है कि अब दुनिया के ये थपेड़े खाकर, तुम ठीक-ठीक तौर पर सब बातें सोचने-समझने लायक हो गए हो। बताओ कि तुम्हारा विचार किस तरह पर क्या करने का है?

भूतनाथ खासकर शेरसिंह के पास चला आया और धीरे-धीरे उससे बातें करने लगा।

घण्टे-भर से ऊपर समय तक भूतनाथ अपने दिल की बातें शेरसिंह से कहता रहा। इस बीच उसके मन में जो कुछ था उसने सब सच-सच शेरसिंह से बयान किया और शेरसिंह के मन में जिन-जिन बातों की शंका उत्पन्न हुई उन्हें भी पूरी तरह से दूर किया, यहाँ तक कि उसकी बातों को सुनकर शेरसिंह प्रसन्न होकर बोल उठे, ‘‘बेशक भूतनाथ, मैं तुम्हारे विचारों की तारीफ करता हूँ। तुमने जो कुछ सोचा उसे अगर पूरा उतार सको तो जरूर दुनिया में फिर से नेकनामी के साथ मशहूर हो सकते हो। मगर यह याद रखना कि अगर तुम्हारी नीयत बदली और तुम लालच या ऐयाशी के फेर में पड़े तो कहीं के न रहोगे और मरकर भी तुम्हारी जान को चैन न मिलेगा!!’’

भूतनाथ बोला, ‘‘मैं इस बात को खूब समझता हूँ और सब कुछ सोच-समझ कर ही अपना विचार मैंने तुम्हारे सामने रखा है। तुम विश्वास रखो कि या तो अब मैं नेकनाम होकर दुनिया के आगे आऊंगा और या फिर आज से कोई मेरी यह सूरत ही न देखेगा।’’

शेरसिंह ने कहा, ‘‘तो मैं भी दिलोजान से तुम्हारी मदद करने को तैयार हूँ।’’

भूत० : तो फिर वही दोनों काम कर दो जिनके लिए मैंने तुमसे कहा, अर्थात् मुझे मुर्दा मशहूर कर दो और छिपने की कोई ऐसी जगह बता दो जहाँ दुनिया की निगाहों से दूर रहता हुआ भी मैं चारों तरफ की खोज-खबर लेता रह सकूं।

शेर० : अच्छी बात है, मैं यह दोनों ही काम कर दूंगा। मगर यह तो कहो कि शान्ता को तुम किस तरह अपने साथ....

भूत० : नहीं-नहीं, उसे मैं अपने साथ नहीं रखना चाहता, खासकर तो उसी की निगाहों से अपने को दूर करना चाहता हूँ और उसी के विषय में तुम्हारी मदद चाहता हूँ। तुम्हें ऐसी कार्रवाई करनी होगी जिससे उसे विश्वास हो जाए कि मैं अब इस दुनिया में नहीं रहा।

शेर० : यह तो बड़ी कठिन बात है।

भूत० : कुछ भी कठिन नहीं। आज सारा जमाना, कम-से-कम जानकार जमाना जानता है कि भूतनाथ के हाथों लोहगढ़ी उड़ गई और वह खुद भी उसी में ढेर हो गया!

शेर० : सो बात नहीं, मुश्किल से मेरी मुराद उस सच्ची औरत को यह झूठी खबर पहुंचाने से हैं! भूतनाथ, सचमुच तुमने अपनी उस सती-साध्वी औरत को अभी तक नहीं पहचाना और न उसके दिल की गहराई की थाह पाई!

भूत० : बहुत कुछ पाई और इसी से अब उसके सामने जाना नहीं चाहता हूँ। (हाथ जोड़कर) बस आप मेरा विचार बदलने की कोशिश मत कीजिये और चाहे जैसे भी हो शान्ता को यकीन करा दीजिए कि मैं इस दुनिया से उठ गया।

शेर० : (एक लम्बी सांस लेकर) बहुत अच्छा, मैं करा दूंगा। अपने कलेजे पर पत्थर रखकर तुम्हारी स्त्री को यह झूठी खबर मैं सुनाऊंगा। और कहो?

भूत० : बस वही--कोई गुप्त स्थान मेरे लिए ठीक कर दो।

शेर० : अच्छा तो सुन लो। गयाजी की रामशिला पहाड़ी तुमने देखी ही है?

भूत० : हाँ, बहुत अच्छी तरह। वही तो जिसके पूरब पुराना मसान है और जहाँ नदी के बीचोंबीच एक भयानक टीले के ऊपर हम लोगों के गुरु महाराज के गुरुदेव की समाधि है।

शेर० : हाँ-हाँ, वही, मेरी उसी जगह से मुराद है, उस समाधि के पास ही आजकल एक साधु महाराज रहते हैं।

भूत० : हाँ, मैंने सुना है कि वहाँ कोई पहुंचे हुए सिद्ध अपनी कुटिया बनाकर रहते हुए उस भयानक स्थान में योग साधना कर रहे हैं। तब?

शेर० : उन महात्मा के पास कभी-कभी मैं जाया करता हूँ। अभी हाल ही में जब मैं उनके दर्शन करने को गया तो उनसे सुना था कि वे अब उस स्थान को छोड़ उत्तराखण्ड की ओर चले जाना चाहते हैं। उन्होंने अमावास वाले दिन वह स्थान छोड़ देने का अपना विचार प्रकट किया था और साथ ही यह भी कहा था कि अपना यह विचार वे और किसी पर प्रकट नहीं होने देना चाहते हैं।

भूत० : तब?

शेर० : मेरा विचार है कि जब महात्मा वह स्थान छोड़कर चले जाएं तो तुम उनकी जगह वैसा ही भेष बनाकर उस कुटिया में रम जाओ। उनके भक्त और शिष्य लोग तुम्हें खाने-पीने की तकलीफ न होने देंगे और उन्हीं के जरिए तुम्हें दुनिया का हाल भी मालूम होता रहेगा।

भूत० : (कुछ सोचकर) विचार तो तुम्हारा अच्छा है, मगर कहीं से महापुरुष मेरी इस कार्रवाई से रुष्ट न हो जाएं!

शेर० : नहीं-नहीं, इसका प्रबन्ध मैं कर लूंगा, चिन्ता करने की जरूरत नहीं।

भूत० : तो ठीक है, मुझे भी वह स्थान मंजूर है, मेरे मन के लायक ही वह जगह है भी।

शेर० : अच्छा तो फिर उठो, उधर ही चला जाए। रास्ते में और बातें तय कर ली जायेंगी।

भूतनाथ और शेरसिंह उठ खड़े हुए और गयाजी की तरफ रवाना हो गए।१ 

(१. यहाँ पर भूतनाथ नोट लिखता है- शेरसिंह की मदद से मैं फलगू नदी के मसान के उस साधक के रूप में बरसों तक छिपा रह गया। दुनिया-भर में यही मशहूर हुआ कि भूतनाथ मर गया मगर भूतनाथ वास्तव में साधु बना हुआ उसी मसान पर विराज रहा था। मैं नहीं कह सकता कि मेरे विषय में शेरसिंह ने क्या कार्रवाई की या किस तरह शान्ता तथा दूसरों को विश्वास दिला दिया कि मैं अब इस दुनिया में नहीं रहा मगर इसमें कोई शक नहीं कि मेरे खास एक-दो दोस्त या दुश्मन को छोड़ तमाम जमाना यहीं जानता रहा कि गदाधरसिंह मर गया, इस जगह। अखण्डनाथ बाबाजी के भेष में रहकर मैं दुनिया से अलग रहता हुआ भी उसके हाल-चाल पर नजर रखता था। 

इस स्थान और इस भेष के बाहर निकलने का मौका इस बीच में सिर्फ दो ही चार दफे मुझे पड़ा (जिसका जिक्र आगे आयेगा) नहीं तो अपनी जिन्दगी के कई वर्ष बराबर इसी जगह मैंने बिताए, वहीं पर जब इन्द्रजीत सिंह के इश्क में माधवी पड़ गई थी तो मुझसे सलाह लेने मेरे पास आई थी १, और वहीं पर आकर देवीसिंह मुझे मिले थे तथा उन्होंने मेरा रूप धारण कर इन्द्रजीतसिंह की मदद की थी जिनके असली हाल-चाल का पता उन्हें मुझसे लगा था। जब प्रतापी राजा बीरेन्द्रसिंह का जमाना बढ़ता हुआ मैंने देखा, उनके शेरदिल लड़कों का दौरदौरा हुआ और कमलिनी ने मायारानी से अलग होकर सिर उठाया तब मौका अच्छा जान मैं फिर से भूतनाथ के रूप में जमाने के आगे आया (मैं पहले कई जगह लिख चुका हूँ कि अभी तक मैं गदाधरसिंह के नाम से ही मशहूर था मगर लोगों में मेरा ‘भूतनाथ’ नाम प्रचलित होने के कारण इस ग्रन्थ में भी मैं यही नाम लिखता हूँ।) और राजा वीरेन्द्र सिंह का ऐयार बनने की धुन मुझे लगी। यहीं और इसी रूप से निकलकर मैं तहखाने में शेरसिंह से मिला था और इनसे मैंने अपना विचार प्रकट किया था पर इस बीच में इतना कुछ फेर-बदल हो गया और दुष्टों और शैतानों ने तरह-तरह की बदमाशियों का जाल इस कदर फैला दिया था कि शेरसिंह को मेरा प्रकट होना न भाया बल्कि मुझको प्रकट होता देख वे स्वयं ही कहीं लुप्त हो गए। मगर खैर उन्होंने चाहे जो कुछ भी सोचा हो, पर मेरे लिए तो मेरा प्रकट होना शुभ ही हुआ और प्रतापी महाराज सुरेन्द्रसिंह की दया और उनके सत्यवादी ऐयार देवीसिंह की कृपा से मैं राजा बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों की पंक्ति में बैठने योग्य हुआ। (१. देखिए चन्द्रकांता सन्तति दूसरा भाग, पन्द्रहवाँ बयान। २. देखिए चन्द्रकांता सन्तति तीसरा भाग, तेरहवाँ बयान।)

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