भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

पाँचवाँ बयान


नौकरों की जुबानी यह सुनकर कि भूतनाथ एक कुएं के अन्दर कूद गया, दारोगा उठा और तेजी के साथ उसी तरफ रवाना

कंटीले पेड़ों और गुंजान झाड़ियों के बीच की पेचीली पगडंडियों पर से चक्कर लगाते हुए दारोगा ने बहुत जल्द उस जंगल को समाप्त किया जिसमें वह मनोरमा के साथ बैठा बातें कर रहा था और तब सीधा उस पहाड़ी की तरफ बढ़ा जो वहाँ से दिखाई पड़ रही थी और जिसका नाम उसने लुटिया पहाड़ी बताया था।

सचमुच ही दूर से देखने से यह पहाड़ी गोलमटोल बिल्कुल एक लुटिया की शक्ल की दिखाई पड़ती थी और यह समझ में नहीं आता था कि इसके ऊपर जाने का रास्ता किधर से होगा, मगर पथरीले ढोकों और चट्टानों के अगल-बगल से घूमता-फिरता दारोगा बहुत जल्दी उसकी आधी से ज्यादा ऊंचाई पार कर गया। जिस समय वह एक बड़े इमली के पेड़ के पास से होकर जा रहा था उसी समय उसकी आड़ से एक आदमी बाहर निकल आया और दारोगा को सलाम करके बोला, ‘‘बहुत अच्छा हुआ जो आप आ गए! हम लोग तो डर और घबराहट से परेशान हो यही सोच रहे थे कि क्या करें क्या न करें!’’

दारोगा ने पूछा, ‘‘क्यों क्या बात है?’’ जिसके जवाब में वह बोला, ‘‘हम दोनों आदमी भूतनाथ का पीछा करते हुए यहाँ तक आ पहुंचे थे कि यकायक वह (हाथ से बताकर) उस कुएं की जगत पर चढ़ गया और एक निगाह अंदर झांकने के बाद उसी में कूद पड़ा। कूदने के साथ ही कूएं के अन्दर से तरह-तरह की आवाजें आने लगीं। हम लोग इस डर से कुएं पर न गए कि शायद यह कुआं तिलिस्मी हो और उस पर जाने में कोई खतरा हो या भूतनाथ ही वहाँ किसी तरह हम लोगों को न देख ले। आखिर मैंने महाबीर को आपकी तरफ भेजा और खुद यहाँ छिपा बैठा हुआ हूँ। अब आप आ गए, अब जो मुनासिब समझें, कीजिए!’’

उस आदमी ने मुश्किल से अपनी बात खत्म ही होगी कि यकायक एक डरावनी आवाज जो किसी शेर की गरज की तरह मालूम होती थी चारों तरफ फैल गई। यह आवाज उसी कुएं की तरफ से आती मालूम हो रही थी जिधर बताकर वह आदमी फिर बोला, ‘‘वह देखिए, फिर आवाज आई। रह-रहकर इसी तरह की आवाजें कुएं के अन्दर से आ रही हैं।’’ दारोगा यह सुनकर बोला, ‘‘कोई हर्ज नहीं, मैं इस आवाज को पहचानता हूँ और जब चाहूँ इसे बन्द कर सकता हूँ। तुम दोनों इसी जगह रहो और चारों तरफ की आहट लेते रहो, मुझे थोड़ी देर के लिए उस कुएं के अन्दर उतरना पड़ेगा।’’

वह आदमी बोला, ‘‘मगर सरकार, वह कुआं तो बड़ा खतरनाक मालूम होता है।’’ जिसे सुन दारोगा ने जवाब दिया, ‘‘नहीं, नहीं, सो बात नहीं है रघुनाथ, मैं जान-बूझकर किसी तरह के खतरे में पड़ने वाला आदमी नहीं हूँ, यह तुम अच्छी तरह जानते हो। तुम बेफिक्री से यहाँ रहो, मैं बहुत जल्ही वापस लौटूंगा।’’

अपने बदन का कुछ फाजिल और बोझ वाला सामान दारोगा ने उसी जगह छोड़ा और तब कुएं की तरफ बढ़ा जिसकी पक्की जगत उस जगह से कुछ-कुछ दिखाई पड़ रही थी। छोटी-छोटी तीन-चार सीढ़ियों पर से होता हुआ दारोगा जगत पर चढ़ गया और आहिस्ता से चलता हुआ कुएं के पास पहुंचा। वहाँ पहुंच वह जमीन पर लेट गया और तब कुएं के अन्दर से सिर बढ़ा भीतर झांकने लगा।

कुआं पहाड़ी के कारण बहुत ही गहरा था और उसके अन्दर के पानी की कोई आहट यहाँ से मिल न रही थी मगर जिस चीज ने दारोगा का ध्यान अपनी तरफ खींचा वह एक बहुत ही हल्की रोशनी थी जो कुएं की गहराई के बीचोंबीच में दिख रही थी। बहुत गौर करने पर मालूम हुआ कि कूएं की गहराई का लगभग आधा फासला तय करने पर वहाँ की दीवार कुछ टूटी हुई-सी नजर आती है और एक गड्हा-सा दिखता है जिसके अन्दर से वह रोशनी की आभा निकल रही है। बहुत देर तक देखते रहने पर यह भी दिखा कि इस कुएं में ऊपर से नीचे तक थोड़ी दूर पर लोहे की कड़ियां लगी हुई हैं जिनकी मदद से नीचे उतरा जा सकता है। कुछ देर दारोगा अपने चारों तरफ कुएं के अन्दर की आहट लेता रहा और जब कहीं से कोई खतरा नजर न आया तो उन्हीं कड़ियों को पकड़ धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।

अभी दारोगा दो ही गज नीचे उतरा होगा कि उसे छेद के अन्दर से आती हुई रोशनी की आभा कुछ हिलती-सी जान पड़ी और साथ ही फिर उसी तरह की एक डरावनी आवाज कुएं के अन्दर से आई, मगर दारोगा ने उस पर कुछ ख्याल न किया और बेधड़क नीचे उतरता हुआ बहुत जल्द ही उस जगह के पास जा पहुंचा जहाँ से रोशनी बेधड़क निकल रही थी। लोहे की कड़ियां उस जगह के बिल्कुल पास से ही आती हुई नीचे पानी तक चली गई थीं। दारोगा इस छेद के पास पहुंचकर रुक गया और तब उसने देखा कि उस जगह बड़े आले की तरह का एक गड्ढा कुएं की दीवार में बना हुआ है जो यद्यपि बाहर से तो छोटा है मगर भीतर से खूब प्रशस्त और दूर तक गया हुआ जान पड़ता है। जरा-सी कोशिश में दारोगा कड़ियां छोड़ इस ताक में उतर गया और तब कुछ दूर तक अन्दर चला गया जहाँ वह रास्ता फैल के तथा लम्बा, ऊंचा और गहरा होकर किसी सुरंग की शक्ल में बदल गया था। दारोगा इस मोड़ तक पहुंचा और यहाँ उसने एक विचित्र दृश्य देखा।

इस जगह सुरंग बढ़कर एक चौड़ी और एक ऊँची कोठरी की शक्ल में हो गई थी जिसके बीचोबीच के छोटे-से चबूतरे पर लाल रंग की एक मूरत बैठी थी। उस मूरत के सामने एक मोमबत्ती जमीन पर खड़ी जल रही थी जिसकी मद्विम रोशनी चारों तरफ फैल रही थी और इसमें कोई शक नहीं कि इसी की आभा को दारोगा ने कुएं के ऊपर से देखा था। इस रोशनी ने उस कोठरी के चारों तरफ कोने में बैठाये हुए और शायद किसी धातु के बने चारों शेरों की शक्ल दिखाई जो कुछ अजीब ढंग के थे और न-जाने किस ताकत से असली जानवरों की तरह हरकत कर रहे थे। दारोगा के देखते-देखते एक ने मुंह खोलकर जम्हाई ली और तब अपने गले से एक गुर्राहट की डरावनी आवाज निकली जो इस बन्द जगह में गूंज गई। आवाज के साथ-ही-साथ उसके मुंह से आग की एक लपट निकली जो बहुत डरावनी मालूम होती थी, मगर दारोगा ने उस पर कोई ख्याल न किया, वह बेधड़क शेर के पास चला गया और उसके कान के पास हाथ रखकर कोई खटका ऐसा दबाया कि जिसके साथ ही उसका खुला हुआ मुंह बन्द हो गया और वह अपनी जगह चुपचाप बैठ गया।

दारोगा वहाँ से हटा और घूमकर उस मूरत के पीछे की तरफ पहुंचा। जो सुरंग कुएं से यहाँ तक आई थी वह इस मूरत के पीछे से होती हुई फिर आगे को निकल गई थी। दारोगा इसी तरफ बढ़ा मगर दो-चार कदम से ज्यादा न गया होगा कि भीतर से घनघोर अन्धकार में से उसे किसी के पैर की आहट सुनाई पड़ी। उसने दबी जुबान से कहा, ‘‘मालूम होता है, कम्बख्त भूतनाथ लौट रहा है। अफसोस मैं यह न देख पाया कि उसने किताब कहाँ छिपाई है’’ और तब पिछले पांव लौट उस मूरत के सामने की तरफ आकर खड़ा हो गया। उसके कुछ ही देर बाद एक आदमी उस अंधेरी सुरंग में से आता हुआ दिखाई पड़ा और जब वह घूमकर मोमबत्ती की रोशनी में आया तो दोनों ने एक दूसरे को पहचाना।

यह आने वाला सचमुच ही भूतनाथ था जो दारोगा को इस जगह खड़ा देखते ही चौंक पड़ा। उसकी भृकुटी चढ़ गई और हाथ खंजर की मूठ पर पहुंचा, मगर दारोगा उसे देखते ही बड़े दोस्ताना ढंग से आगे बढ़ा और उसे गले से लगाता हुआ बोला, ‘‘ओफ मेरे दोस्त, क्या तुम सचमुच गदाधरसिंह ही हो या मेरी आँखें धोखा दे रही हैं!’’

भूतनाथ ने कुछ घृणा की मुद्रा से अपने को दारोगा से अलग किया और कहा, ‘‘नहीं, मैं सचमुच गदाधरसिंह हूँ और यह जानना चाहता हूँ कि आप कितनी दूर से मेरा पीछा कर रहे हैं जो अब यहाँ भी आ पहुंचे तथा अब आप मेरे साथ क्या सलूक करना चाहते हैं।’’

दारोगा : (अफसोस की मुद्रा से) तुम्हारा ढंग तो अजीब बेरुखी का हो रहा है मेरे दोस्त! मैं तो तुम्हें देखकर बेतरह खुश हुआ क्योंकि मुझे यह खबर लगी थी कि लोहगढ़ी में जो दुर्घटना हुई उसके सबब से उस खूबसूरत इमारत के साथ तुम्हारा भी इस दुनिया से नाम-निशान उठ गया। इस वक्त मुझे यह देख बेहद खुशी हुई कि वह खबर गलत थी और ईश्वर की कृपा से तुम जीते-जागते और तंदरुस्त हो मगर तुम्हारा रंग-ढंग मेरी खुशी को अफसोस में बदल रहा है।

भूत० : बेशक आपको अफसोस हो रहा होगा कि आपकी चाल व्यर्थ गई और मैं जीता-जागता बच गया....

दारोगा : मेरी चाल? क्या तुम मुझ पर किसी तरह का इलजाम लगा रहे हो?

भूत० : बेशक क्योंकि आपके ही कहने से मैं लोहगढ़ी में गया था!

दारोगा : तो क्या मेरी खबर झूठ निकली? क्या तुमने वहाँ नन्हों और गौहर वगैरह को मौजूद और अपने बर्खिलाफ साजिश करते हुए नहीं पाया?

भूत० : जरूर पाया, सिर्फ उन्हीं को नहीं, बल्कि उनके साथ-साथ आपकी मुन्दर को भी मैंने वहाँ देखा और मुझे इस बात की खुशी है कि और सबों के साथ मैं उसको भी मिट्टी में मिला सका, जिससे वह आपका षड्यन्त्र व्यर्थ हो गया और अब मुमकिन है कि बेचारे गोपालसिंह और बलभद्रसिंह की जान बच जाए। नहीं, मेरे कहने का मतलब यह नहीं था कि आपकी दी हुई खबर गलत थी, बल्कि यह था कि आपने मुझे बहुत गहरा धोखा दिया जो यह नहीं बताया कि उस कम्बख्त इमारत में आपने बारुद का खजाना भी इकट्ठा कर रखा है। अगर मैं इस बात को जानता तो न उस इमारत के सत्यानाश होने का कारण ही बनता और न मेरी जान ही खतरे में पड़ती!

दारोगा : (जोर से हंसकर) ओह, अब मैं समझा! तुम शायद यह समझ रहे हो कि मैंने उस जगह बारुद का खजाना इकट्ठा किया और सो भी तुम्हें नुकसान पहुंचाने की गरज से! (फिर हंसकर) मगर वाह, तुम भी कैसे शक्की और कितने भुलक्कड़ आदमी हो! तुम तो पहले उस इमारत में जा चुके हो! मर्दे आदमी, बारुद तो न-जाने कितने बरसों से उस जगह इकट्ठी है! तुम तो पहले उस इमारत में जा चुके हो, क्या तुम्हें याद नहीं कि एक मुद्दत से वहाँ की कई कोठरियां इसी तरह के सामानों से भरी हुई हैं? भला मुझे वहाँ बारूद रखने की गरज ही क्या थी और मैं ऐसा करता ही क्यों? और फिर यह तो सोचो कि उस बारुद में आग किसने लगाई? क्या तुम समझते हो कि मैंने तुम्हें खुद वहाँ भेजा और जब तुम गए तो तुम्हारे पीछे-पीछे जाकर बारूदखाने में आग लगा दी! अगर ऐसा होता तो भला मैं जीता क्योंकर बचता?

भूत० : नहीं, नहीं, आग तो मेरी गलती से लगी। मैंने वहाँ एक ऐसी डरावनी चीज देखी कि घबराहट में हाथ की मशाल इस बारूद पर ही फेंक दी।

दारोगा : ठीक है, ऐसे ही किसी तरह की दुर्घटना का खयाल मैं भी कर रहा था क्योंकि मेरी समझ में यह न आ रहा था कि आखिर लोहगढ़ी उड़ क्यों गई? अब मालूम हुआ कि तुमने अपने हाथ से ही खुद वह काम किया था, मगर तब फिर तुम मुझ पर क्यों खफा हो? मुझ पर क्यों इलजाम लगा रहे हो?

भूत० : इसलिए, कि अगर आपने वहाँ बारूद इकट्ठी न कर रखी होती तो इतनी बड़ी दुर्घटना न घटती और न मेरी जान ही जोखिम में पड़ती।

दारोगा : मेरे दोस्त, मैं तुमसे बार-बार कह चुका हूँ कि तुम्हारी याददाश्त तुम्हें धोखा दे रही है और वह बारूद वहाँ बहुत पहले से इकट्ठी है। अगर तुम्हें विश्वास न हो तो तुम हेलासिंह से पूछ सकते हो।

भूत० : खैर जो कुछ भी हो, मगर अब आप मुझसे क्या चाहते हैं।

दारोगा : तुम्हारी एक-एक बात से शक टपकता है। खैर इसमें तुम्हारा कसूर नहीं, तुम्हारा मिजाज ही ऐसा है। इस समय भी तो तुम यही समझ रहे हो कि मैं तुम्हारा पीछा करता हुआ आ पहुंचा हूँ।

भूत० : बेशक मेरा यही ख्याल है! आपके इस बेवक्त यहाँ आने का और कारण भी क्या हो सकता है?

दारोगा : जरूर एक कारण है और वह ऐसा है कि जिससे तुम्हारा भी बहुत गहरा संबंध है।

भूत० : क्या मैं उसे सुनने लायक हूँ।

दारोगा : जरूर मगर पहले यह बता चुकने के बाद कि तुम यहाँ क्यों आए और क्या कर रहे हो?

भूत० : मेरे आने का कारण तो सीधा है। मैं दुश्मनों के डर से भागता हुआ यहाँ आकर छिप गया था और अब तक सब डर दूर न हो जाए तब तक यहीं रहने का विचार था मगर अब आप आ गए तो कोई बात नहीं, शायद मैं आपके साथ ही यहाँ से लौट चलूं!

दारोगा : (जोर से हंसकर) भूतनाथ और दुश्मनों के डर से छिपता फिरे! क्या तुमने मुझे इतना बड़ा बेवकूफ समझा है कि मैं इस बात पर विश्वास कर लूंगा?

भूत० : नहीं, मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ।

दारोगा : अगर ठीक है तो और भी बड़े ताज्जुब की बात है। ऐसा कौन तुम्हारा दुश्मन निकल आया जरा मैं भी नाम सुनूं।

भूत० : राजा बीरेन्द्रसिंह के कई ऐयार मेरा पीछा कर रहे हैं जिनमें से दो ऊपर वाली पहाड़ी तक मेरे पीछे-पीछे चले आए, लाचार उनसे अपना पिण्ड छुड़ाने और कुछ देर सुस्ताने के लिए इससे अच्छी और कोई तरकीब मुझे न मिली कि यहाँ आ छिपूं।

दारोगा : राजा बीरेन्द्रसिंह के ऐयार और तुम्हारा पीछा कर रहे हैं? मगर सो क्यों?

भूत० : (कुछ हिचकिचाहट के साथ) सो सब पूँछ के आप क्या कीजिएगा?

दारोगा : यह न समझो कि मैं केवल कौतूहलवश ये सब बातें पूछ रहा हूँ। सच तो यह है कि मुझे भी उड़ती-उड़ती खबरें लगी हैं और इसी से मैं असल मामला जानने को उत्सुक हूँ।

भूत० : आपने क्या सुना है?

दारोगा : तुम चाहे मुझसे अपनी बातें छिपाओ मगर मुझे साफ-साफ कह देने में कोई हर्ज नहीं मालूम होता है। मैंने यह सुना है कि तुमने राजा बीरेन्द्रसिंह के महल से रिक्तगन्थ चुराया था मगर कोई आदमी तुम्हें उल्लू बना उसे तुम्हारे कब्जे से निकाल ले गया। वह आदमी कौन था इसके बारे में भी कुछ खबर लगी है मगर अभी मैं कुछ निश्चित रूप से नहीं कह सकता।

भूत० : (ताज्जुब से) खैर कुछ तो बताइए कि वह कौन था?

दारोगा : अगर सुनना ही चाहते हो तो सुन लो, मगर यह जाने रहो कि इसकी सच्चाई का मैं कोई दावा नहीं करता, केवल सुनी-सुनाई बात कहता हूँ।

भूत० : खैर कुछ भी कहिए।

दारोगा: सुनो, तुम्हारे कब्जे से रिक्तगन्थ ले जाने वाला दलीपशाह था।

भूत० : दलीपशाह! (कुछ गौर से) नहीं, नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। बेचारे दलीपशाह को आप इस मामले में व्यर्थ घसीटते हैं, उसको भला उस किताब से क्या मतलब हो सकता है?

दारोगा : तुम्हें असली बात की खबर ही नहीं है तभी ऐसा कह रहे हो। दलीपशाह को उस किताब की बहुत सख्त जरूरत है और जहाँ तक मेरा ख्याल जाता है उसके सिवाय और किसी की वह कार्रवाई हो ही नहीं सकती।

भूत० : नहीं, नहीं, यह आप मुझसे धोखा देने के लिए कहते हैं। रिक्तगन्थ की जरूरत अगर किसी को है तो आपको और अगर किसी की यह कार्रवाई हो सकती है तो आपकी। मगर आप यह न समझिए कि मैं इस मामले में ठंडा पड़ जाऊंगा।नहीं-नहीं, मैंने अपने जासूस चारों तरफ छोड़े हुए हैं और जिस समय मुझे विश्वास हो जाएगा कि आप ही ने धोखा देकर रिक्तगन्थ मुझसे छिनवा लिया है मैं आपके साथ इस तरह पेश आऊंगा कि आप भी समझिएगा कि भूतनाथ से पाला पड़ा था। देखिए दारोगा साहब, अभी तक मैं जान-बूझकर तरह दिया जाता था। मगर अब आप साफ सुन लीजिए कि इस मामले में मुझे पूरा शक आपके ऊपर है और दृढ़ निश्चय है कि आप ही ने धोखा देकर यह कार्रवाई मेरे साथ की है। अगर आप कुशल चाहते हैं तो अब भी साफ-साफ अपनी कार्रवाई मंजूर करके मेरी चीज मेरे हवाले कर दीजिए नहीं तो याद रखिए कि भूतनाथ सहज में पिण्ड छोड़ने वाला आदमी नहीं है, जरूरत पड़ने पर वह मौत के घर में जाकर वहाँ से भी अपना भेद निकाल लाता है। आपकी बेईमानी भी छिपी न रहेगी, जरूर कभी-न-कभी प्रकट होगी और जब प्रकट होगी तो फिर भगवान ही आपको बचावे मनुष्य में आपको बचाने की सामर्थ्य नहीं, सो आप अच्छी तरह समझिए।

दारोगा : (जिसका चेहरा भूतनाथ की बातें सुन कुछ फीका पड़ गया था) भूतनाथ तुम व्यर्थ ही मुझ पर शक कर रहे हो। मैं तुमसे बार-बार और जोर देकर कह कहता हूँ कि अगर तुम वह किताब लाकर मुझे दो तो लाख दो लाख क्या मुंह-मांगा इनाम तुम्हें दे सकता हूँ मगर फिर भी मैं तुमसे सच कहता हूँ कि तुम्हारे कब्जे से रिक्तगन्थ ले लेने वाला मैं नहीं हूँ। मुझे इस मामले की कोई खबर नहीं थी और जो कुछ मेरे जासूसों ने मुझसे कहा सिर्फ उतना ही मैं जानता हूँ, हाँ इतना मैं जोर देकर कह सकता हूँ कि इस मामले से दलीपशाह का संबंध जरूर है और अगर तुम जांच करोगे तो जरूर असलियत तक पहुंच जाओगे।

भूत० : आप लाख सफाई दें मगर मैं कदापि न मानूंगा कि आप इस मामले में एकदम बेकसूर हैं, हाँ, मैं तब तक कोई कार्रवाई न करूंगा जब तक कि पूरी-पूरी खबर न पाऊंगा, इतना आप विश्वास रखिए, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप मुझसे भागकर कहीं जी नहीं सकते।

फिर यह तो मुझे विश्वास है कि दो-चार रोज के अन्दर जो कुछ सही-सही मामला है और जिस किसी की भी वह कार्रवाई है वह मुझ पर जाहिर हो जाएगी। अस्तु आप अपनी कुशल चाहते हों तो अब भी साफ कह दीजिए वरना मर्जी आपकी, और आप जो बार-बार दलीपशाह का नाम लेते हैं सो बिल्कुल व्यर्थ है, मैं खूब जानता हूँ कि मेरे साथ वह और जो कुछ भी करे या कर चुका हो, मगर इस रिक्तगन्थ वाले मामले में बिल्कुल बेकसूर है। रिक्तगंथ की उसे कोई जरूरत न थी और न है बल्कि उसने शायद इसका नाम भी न सुना होगा।

दारोगा : यही तो तुम्हारे सोचने की भूल है। तुमको इधर का हाल कुछ मालूम ही नहीं है और न यही जानते हो कि दलीपशाह को उस किताब की जरूरत क्यों पड़ गई!

भूत० : मुझे तो मालूम नहीं, अच्छा तो आप ही वह बात मुझे बता दीजिए।

दारोगा : हाँ सुनो, लेकिन जो कुछ भी मैं कहूँ गौर से सुनो और अपनी अक्ल से जांच कर तब तय करो कि जो मैं जो कहता हूँ वह सही है या नहीं। (धीरे से और भूतनाथ के कान के पास मुंह ले जाके।) तुम्हें मालूम ही होगा कि लोहगढ़ी वाला तिलिस्म टूट रहा है।

भूत० : हाँ, आप यह बात मुझे कह चुके हैं।

दारोगा : अच्छा तो अब सुन लो कि वह तिलिस्म टूट गया और उसके अंदर कई ऐसे कैदियों का पता लगा जिनको अब तक हम लोग मुर्दा समझे हुए थे।

भूत० : वे कौन?

दारोगा : उनके नाम भी बताता हूँ।

इतना कह दारोगा भूतनाथ के और पास हो गया और उसके कान में धीरे-धीरे कुछ कहने लगा। हम कह नहीं सकते कि उसने क्या कहा, मगर जो कुछ भी कहा उसे सुनते ही भूतनाथ का का चेहरा फक हो गया और उसकी शक्ल से मुर्दनी टपकने लगी। वह घबराकर कई कदम पीछे हट गया और बेचैनी के साथ दारोगा का मुंह देखता हुआ बड़ी मुश्किल से बोला, ‘‘क्या जो कुछ आप कहते हैं वह सही है?’’

दारोगा : बिलकुल सही है।

भूत० : मगर ऐसा कैसे हो सकता है। ये लोग किस तरह अभी तक जीते ही रह सकते हैं! (सिर हिलाकर) नहीं, नहीं, या तो आपको गलत खबर लगी है और या आप मुझे धोखा देना चाहते हैं।

दारोगा : (हंसकर) ताज्जुब की बात है कि मेरा इस मामले से जो संबंध है उसको जानते हुए भी तुम यह कहते हो कि मुझे गलत खबर लगी है। मैं जो कुछ कह रहा हूँ विश्वास रखो कि वह बिल्कुल सही है और जिनके नाम मैंने तुमसे लिए वे लोग जीते-जागते मौजूद हैं मगर खैरियत इतनी ही है कि अभी तक वे तिलिस्म के अन्दर ही बन्द हैं, तुम्हें अब विचार करने की बात सिर्फ इतनी ही रह जाती है कि इस खबर को जब दलीपशाह सुनेगा तो उस पर क्या असर होगा और वह रिक्तगन्थ पाने के लिए व्याकुल हो जाएगा या नहीं?

भूत० : (कुछ देर तक सोचकर) बेशक अगर यह खबर सही हो और दलीपशाह के कानों तक पहुंच भी गई हो तो लोगों को छुड़ाने के लिए वह सब कुछ कर सकते हैं, फिर भी यह सोचना कठिन है कि वह रिक्तगन्थ मुझसे छीन कर अपना काम निकालना चाहता है।

दारोगा : तुमने सब तरह से मुझे झूठा ही मान लेने का अगर निश्चय कर लिया हो तो बात ही दूसरी है वरना कोई भी बुद्धिमान् आदमी जिसे तुम्हारी तरह सब बातों की खबर हो सिवाय इसके और किसी नतीजे पर पहुंच ही नहीं सकता कि रिक्तगंथ को तुम्हारे कब्जे से ले लेने की सबसे बड़ी जरूरत इस वक्त दलीपशाह को है। खैर मर्जी तुम्हारी, जितना कुछ मैं जानता था वह मैंने तुमसे कह दिया, उसके बारे में अगर जांच करोगे तो तुम्हें खुद मालूम हो जाएगा कि मैं बिल्कुल बेकसूर हूँ।

इसमें शक नहीं कि दारोगा की चलती-फिरती बातों ने भूतनाथ को एकदम चक्कर में डाल दिया। अब तक के सोच-विचार के बाद वह इसी नतीजे पर पहुंचा था कि उसके कब्जे से रिक्तगंथ छीन लेना सिवाय दारोगा के और किसी का काम हो नहीं सकता मगर इस समय जो-चार बातें दारोगा ने कहीं उन्होंने उसका दिमाग फिरा दिया और वह कुछ दूसरे ही सोच में पड़ गया! यकायक बिना कोई सबूत हाथ में आए वह दारोगा के खिलाफ कोई कार्रवाई करना नहीं चाहता था और यद्यपि अभी थोड़ी देर पहले उसने यह निश्चय कर रखा था कि दारोगा से भेंट होते ही चाहे जिस तरह से भी हो उसके पेट से यह बात निकाल लेगा कि रिक्तगंथ के मामले में उसका हाथ है मगर इस जगह उसे पाकर भी वह यकायक कोई कार्यवायी नहीं कर सकता था, क्योंकि वह इस बात को बखूबी समझता था कि बिना पूरी मजबूती किए दारोगा कदापि इस जगह आया न होगा! आखिर सब तरह की बातें सोच इस समय मौका बचा जाना ही उसने मुनासिब समझा और अपने मन को यह तसल्ली देकर कि आखिर यह ‘वन का गीदड़ जाएगा किधर’ वह दारोगा से दूसरे ढंग की बातें करने लगा।

भूत० : क्या आपके पास इस बात का कोई सबूत है कि दलीपशाह को रिक्तगंथ का हाल मालूम है और वह उसकी मदद से अपना काम निकालना चाहता है?

दारोगा : इसमें भी क्या किसी सबूत की जरूरत है? दलीपशाह को रिक्तगंथ के बारे में तुमसे कहीं ज्यादा हाल मालूम है और खुद तुम कई दफे यह बात मुझसे कह चुके हो कि अगर दलीपशाह के हाथ में रिक्तगंथ पड़ जाए तो वह गजब कर दे।

भूत० : क्या ऐसा मैंने कहा था? शायद कहा हो, मुझे याद नहीं पड़ता। सच तो यह है कि तरह-तरह के तरद्दुदों ने इस समय मेरा माथा फिरा दिया है और मैं आप में नहीं हूँ।

दारोगा : (बनावटी सहानुभूति के स्वर में) बेशक तुम्हारे चेहरे से परेशानी और बदहवासी जाहिर होती है। मैं तो तुम्हें यह राय दूंगा कि तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें शान्ति की एक जगह ले जाकर बैठा दूंगा, जब तक तुम्हारा मन चाहे वहाँ रहना। वहाँ किसी तरह का कोई खतरा तुम्हारे पास फटक नहीं सकता और तुम पूरे आराम से अपना समय काट सकते हो (कुछ मुस्कराकर) अगर तुम चाहो तो तुम्हारे आनन्द का साधन भी वहीं जुटा सकते हो।

भूत० : (कुछ सोचता हुआ) ऐसी कौन-सी जगह है?

दारोगा : वह एक बाग है जो असल में तो तिलिस्म का ही हिस्सा है, मगर बाहर की तरफ होने के कारण वहाँ तक की आवाजाही बहुत मुश्किल नहीं है। तुम्हारा कोई दुश्मन वहाँ फटक नहीं सकता। जिसको तुम वहाँ का रास्ता बताओगे केवल वही तुम्हारे पास पहुंच सकेगा और या फिर मैं आ-जा सकूंगा कहो ऐसी जगह रहना तुमको मंजूर है? अगर चाहो तो मैं अपने साथ ले जाकर अभी वह जगह तुम्हें दिखा दूं, कारण वह यहाँ से बहुत दूर भी नहीं है। स्थान इतना रमणीक और सुन्दर है कि मैं तो समझता हूँ कि देखते ही तुम मोहित हो जाओगे और वहाँ से आने की इच्छा न करोगे।

दारोगा की इस बात ने भूतनाथ को एक नए सोच में डाल दिया वह वास्तव में खुद एक ऐसी जगह की तलाश में था जहाँ लोगों की निगाहों से बच कर कुछ दिन आराम और शान्ति से रह सके क्योंकि उसे राजा बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का बहुत खौफ हो रहा था और बराबर यही डर बना रहता था कि न जाने कब वह मिट्टी सूंघते और रिक्तगंथ की खोज लगाते हुए उसके पास पहुंच उसकी दुर्गति कर डालें।वह अपनी जान-पहचान की लामा घाटी, पिपलिया घाटी, तिलिस्मी गुफा तथा और बहुतेरी अन्य जगहों की बात सोच चुका था मगर किसी-न-किसी तरह का ऐब सभी जगहों में पाकर वहाँ छिपने का ख्याल न करता था। शायद दारोगा सचमुच ऐसी कोई जगह उसे बता दे जहाँ वह छिपकर आराम से रह सके और उसके दुश्मन पास न फटक सकें, यह विचार उसके मनोनुकूल था। अस्तु बहुत सोच-विचार के बाद वह बोला, ‘‘वास्तव में मैं एक ऐसी जगह की तलाश में तो जरूर हूँ जहाँ कुछ दिन लोगों की निगाह से बचकर रह सकूं मगर मालूम नहीं, आप जिस जगह का जिक्र कर रहे हैं और जिसे तिलिस्मी भी बता रहे हैं वह मेरे काम की कहाँ तक सिद्ध होगी?

दारोगा : इसकी जांच करना तो कोई मुश्किल नहीं! यहाँ से मुश्किल से घण्टे-भर के रास्ते पर वह जगह होगी। तुम इसी समय मेरे साथ चलो और इस जगह को देख लो, पसन्द आवे तो वहाँ रुक जाना नहीं वापस लौट आना। जो चाहो तो अपना कोई विश्वासी आदमी या शागिर्द भी अपने साथ लेते चलो मगर वह ऐसा होना चाहिए जो तिलिस्मी रास्तों को गुप्त रख सके।

दारोगा के इस प्रस्ताव ने कि ‘अगर जो चाहो तो अपना कोई शागिर्द भी साथ लेते चलो’ भूतनाथ का रहा-सहा शक भी दूर कर दिया। अभी तक चाहे उसके मन में यह ख्याल रहा भी हो कि शायद दारोगा अपने किसी गुप्त स्थान में उसे बन्द करके अपना कोई मतलब निकालना चाहता है मगर उसकी इस बात ने इस शक की जगह भी न छोड़ी और उसने सोचा कि मेरे शागिर्द के साथ रहते शैतानी करने की दारोगा को क्या हिम्मत पड़ सकती है। जल्दी-जल्दी उसने कई बातें सोचीं और तब दारोगा से बोला, ‘‘बहुत अच्छा, मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ, अगर कोई निराली और गुप्त जगह हुई तो मैं जन्म-भर आपका अहसान मानूंगा मगर अपने दो शागिर्दों को मैं उस जगह तक जरूर ले चलूंगा!’’ दारोगा ने हंसकर जवाब दिया, ‘‘तुम्हारे मन से शक कभी दूर नहीं होगा। खैर दो ही लेते चलो मगर यह भी समझ लो कि वह स्थान तिलिस्मी है और वहाँ आने-जाने का रास्ता पेचीदा है, थोड़ी सी भूल करने से ही आदमी भटक और तकलीफ उठा सकता है। अच्छा, मेरे साथ आओ।’’ कहकर दारोगा घूमा और बाहर की तरफ चला तथा भूतनाथ ने भी उसके पीछे कदम बढ़ाया।

मगर यकायक इन दोनों ही के पैर रुक गए। हम पहले लिख आए हैं कि जिस कोठरी में ये दोनों इस समय थे उसके बीचों बीच में एक चबूतरे पर लाल रंग की मूरत बैठी हुई थी और कोठरी के चारों कोने में चार शेर किसी धातु के बने बैठे थे। जिस समय दारोगा इस मूर्ति के बगल में से होकर निकला यकायक इस मूर्ति के मुंह से आवाज आई- ‘‘ठहरो, ठहरो!!’’ इस आवाज ने जो डरावनी और गूंजने वाली थी इन दोनों के ही पैर रोक दिए और दोनों आदमी घबराहट के साथ उस मूरत की तरफ देखने लगे कुछ ही सायत बाद वह मूरत फिर बोली, ‘‘मेरी एक-दो बातों का जवाब देकर तब तुम लोग यहाँ से जाओ।’’

दारोगा और भूतनाथ ने एक-दूसरे की तरफ ताज्जुब भरी निगाहों से देखा। यह सम्भव हो सकता है कि आज के पहले भी दोनों ने इस मूरत को देखा हो, पर बोलते अभी तक कभी न देखा था और यही सबब उनकी घबराहट का था। आखिर बहुत कुछ सोच-विचार कर दारोगा ने कहा, ‘‘तुम कौन हो और क्या कहना चाहते हो?’’

उस मूरत के गले से डरावनी आवाज निकली, ‘‘मैं इस जगह का पहरेदार हूँ। बिना मेरी इजाजत के कोई न तो यहाँ आ और न यहाँ से जा सकता है।’’ दारोगा एक सूखी हंसी हंसकर बोला, ‘‘तुम चाहे जो भी हो मगर मैं भी इस तिलिस्म का दारोगा हूँ और इसलिए खूब जानता हूँ कि ऐसा कोई पहरेदार तिलिस्म का पैदा नहीं हुआ जो मेरी आवाजाही को रोक सके!’’

मूरत डरावनी हंसी हंसकर बोली, ‘‘जब तुम ऐसी बातें कहते हो तब मुझे जांच कर देखना पड़ेगा कि तुम सचमुच इस तिलिस्म के दारोगा हो या नहीं और अगर हो तो क्या कुदरत रखते हो, अच्छा देखो!’’

‘‘अच्छा देखो’’ कहने के साथ ही उस मूरत के मुंह से आग का एक फव्वारा-सा निकल पड़ा जिसकी चमकदार चिनगारियां उस गुफा-भर में फैल गईं। ये चिनगारियां धीरे-धीरे बढ़ने लगीं और कुछ ही देर में यहाँ तक बढ़ीं कि वह समूची सुरंग जिसमें से होकर दारोगा और भूतनाथ को जाना था अर्थात् इस जगह से निकलकर बाहर वाले कूएं में जाने का पूरा रास्ता इन चिनगारियों से भर गया। दोनों आदमी डर और घबराहट के साथ इस भयानक दृश्य को देखने लगे बल्कि अपनी जगह से कई कदम पीछे की तरफ हटकर मूरत की आड़ में हो गये जिसमें चिनगारियां उनके बदन को नुकसान न पहुंचा सकें। कुछ देर इसी तरह बीत गया और तब मूरत के मुंह से यह आवाज निकलती सुनाई पड़ी, ‘‘अगर तुम सचमुच इस तिलिस्म के दारोगा हो तो यहाँ से बाहर निकल जाओ!’’

दारोगा अब तक बेचैनी के साथ यह सोच रहा था कि यह कौन-सी बला पैदा हो गई और इसके फंदे से निकलने की क्या तरकीब हो सकती है मगर अब अपने को सम्भालकर उसने कहा, ‘‘बेशक यह तो मुझे विश्वास हो गया कि तुम हो चाहे जो भी पर सचमुच कुछ कुदरत रखते हो मगर अफसोस यही है कि इस वक्त मेरे पास कोई चीज नहीं है जिसमें मैं कोई ताकत तुम्हें दिखाता मगर खैर अब तुम अपना आग का फव्वारा बन्द करो और बताओ कि तुम हम लोगों से क्या चाहते हो?’’

दारोगा की बात सुनते ही मूरत पुन: ठठाकर हंसी और इसके साथ ही वे चिनगारियां जो उसके मुंह से बेतहाशा निकल रही थीं कम होने लगीं। कुछ देर में वे सब कम होती गईं और एकदम बन्द हो गईं और अब सिवाय एक तरह के पीले धुएं के उस सुरंग में और कुछ रह न गया। कुछ सायत बाद वह मूरत फिर बोली, ‘‘मुझे तुम दोनों आदमियों से सिर्फ कुछ बातें पूछनी हैं। उनका जवाब देकर तुम लोग खुशी से चले जा सकते हो!’’

दारोगा : अच्छा पूछो, क्या पूछना चाहते हो?

मूरत : पहले तो तुम्हारे उस साथी से कुछ पूछूंगा जो तुमसे पहले इस जगह आया है और उसकी पोशाक और रंग-ढंग उसका कोई ऐयार होना बता रहा है।

भूत० : (जो अब तक बड़े गौर से मूरत की सब कार्रवाइयों को देख रहा था मगर जुबान से कुछ भी न बोला, कुछ आगे बढ़कर) अच्छा, मुझसे ही पूछो क्या पूछते हो!

मूरत : तुम जिस चीज को खोजने आये थे वह तुम्हें मिली?

भूत० : (चौंककर) तुम्हें कैसे मालूम कि मैं किसी चीज की तलाश में यहाँ आया था?

मूरत : (जोर से हंसकर) कह तो दिया मैं कि इस जगह का पहरेदार हूँ और यहाँ की सब चीजों की हिफाजत करना आने-जाने वालों पर निगाह रखना ही मेरा काम है। अगर कहो तो मैं बता दूं कि तुम यहाँ आकर कहाँ-कहाँ गए और क्या-क्या किया! खैर जाने दो जबकि मुझे मालूम ही है कि जिस चीज की तुम्हें तलाश थी वह तुम्हें मिल गई और तुमने उसे पुन: हिफाजत की जगह में रख दिया, तो मेरा तुमसे यह सवाल करना ही व्यर्थ है। अच्छा यह बताओ कि अब तुम पुन: कब यहाँ आओगे?

भूत० : इस सवाल का भी क्या मतलब? क्या तुमको मेरे पुन: आने में कोई आपत्ति है या तुम उसमें बाधा डालना चाहते हो?

मूरत : (पुन: हंसकर) नहीं, दोनों में से कुछ भी नहीं, अगर मेरा कुछ मतलब है तो बस इतना ही कि जान जाऊं कि तुम्हारा अब क्या इरादा है।

भूत० : इसको जानकर तुम क्या करोगे?

मूरत : तुम्हारी चीज की हिफाजत!

भूत० : क्यों? क्या बिना मेरी मर्जी के उसे कोई ले जा सकता है?

मूरत : बेशक!

भूत० : सो कौन और कैसे!

मूरत : सो तुम खुद ही अच्छी तरह सोच सकते हो--जिसे उस चीज की जरूरत हो और जो उसके छिपाने की जगह जानता हो!

भूत० : क्या ऐसा भी कोई आदमी हो सकता है?

मूरत : एक तो वही है जिसने तुमसे रिक्तगंथ छीन लिया।

भूतनाथ मूरत की यह बात सुनकर चुप हो गया और किसी गौर में पड़ गया। उसके चेहरे से मालूम होता था कि मूरत की बातों ने उसे किसी गम्भीर चिन्ता में डाल दिया है। सम्भव है कि इन बातों का कोई ऐसा गूढ़ तात्पर्य हो जो सिर्फ वही समझ सकता हो। दारोगा पर भी मूरत की बातों का कुछ अजीब असर पड़ा था और वह भी किसी चिन्ता में पड़ गया-सा जान पड़ता था मगर साथ-ही-साथ वह कभी-कभी छिपी निगाहों से भूतनाथ की तरफ भी देखता हुआ इस बात को जानने की कोशिश कर रहा था कि मूरत की बातों का उस पर क्या असर पड़ा रहा है।

आखिर कुछ देर बाद भूतनाथ ने सिर उठाया और लम्बी सांस लेकर कहा, ‘‘तुम्हारी बातों का जो गूढ़ मतलब है वह मैं अच्छी तरह समझ गया मगर जिस तरह तुमने इस बात से मुझे होशियार किया है उसी तरह क्या कुछ और भी मदद मेरी नहीं कर सकते और यह नहीं बता सकते कि मेरे हाथों से रिक्तगन्थ छीन लेने वाला कौन आदमी था?’’

मूरत : शायद मैं यह बात तुमको बता सकूं पर यह विश्वास नहीं होता कि तुमको मेरे कहे पर यकीन होगा।

भूत० : सो क्यों? मैं समझता हूँ कि तुम जो कुछ कहोगे ठीक कहोगे।

मूरत : शायद आगे मैं जो कुछ कहूँ उस पर इतना विश्वास तुम्हें न हो।

भूत० : तो भी अगर कहने में कोई हर्ज न हो तो कह डालो। सुनकर मैं स्वयं ही निश्चय कर लूंगा कि तुम्हारा कहना कहाँ तक सही है। क्या तुमको कहने में कोई परहेज है?

मूरत : कुछ भी नहीं! खैर तो मैं बताए देता हूँ! तुम्हारे कब्जे से वह किताब ले लेने वाला वही है जो इस वक्त तुम्हारे बगल में खड़ा है!!

यह एक ऐसी बात थी जिसने भूतनाथ और दारोगा दोनों ही को चौंका दिया।

भूतनाथ ने ताज्जुब-भरी निगाह दारोगा पर डाली और मूरत से कहा, ‘‘क्या तुम्हारा मतलब है कि इन दारोगा साहब ने मुझे रिक्तगन्थ छिनवा लिया है!!’’

मूरत : छिनवा लिया है न कहकर छिनवा लिया था कहना ज्यादा मौजूं होगा क्योंकि यद्यपि इसके ऐयारों ने तुमसे वह किताब ले ली मगर वह उसके भी कब्जे में पहुंच न पाई, कोई तीसरा उसे उड़ा ले गया।

दारोगा अपनी सूरत पर बहुत बड़ा काबू रखे हुए था जिसमें भूतनाथ कुछ देख या समझ न पावे मगर मूरत की इस बात ने उसके चेहरे पर भी क्षण-भर के लिये बल पैदा कर ही दिया जिसे उसने एक बनावटी गुस्से के साथ यों कहकर छिपाया :--

दारोगा : क्यों झूठी-मूठी बातें कहकर हम दो दिली दोस्ती में झगड़ा लगाने की कोशिश कर रहे हो! तुम्हारी कोशिश का कोई नतीजा न निकलेगा क्योंकि मेरे दोस्त भूतनाथ को कभी मेरे ऊपर इस तरह का कोई शक हो ही नहीं सकता। मैं अच्छी तरह समझ गया कि इस मूरत की आड़ में छिपे हुए तुम कोई धूर्त आदमी हो और जरूर अपना कोई मतलब साधना चाहते हो।

मूरत : (जोर से अपनी डरावनी हंसी हंसकर) तुम चाहे जो कुछ भी समझो, उससे मेरा कुछ बिगड़े-बनेगा नहीं, फिर भूतनाथ को तुमसे झगड़ने की कोई बात भी अब नहीं रह गई है क्योंकि मैंने कह दिया कि वह किताब अब तुम्हारे कब्जे में नहीं रह गई, कहीं और ही चली गई। खैर अब मुझे तुम लोगों से और कुछ कहना या पूछना नहीं है, तुम लोग अपने रास्ते जा सकते हो।

इतना कहकर मूरत चुप हो गई, भूतनाथ और दारोगा दोनों ही ने उससे तरह-तरह के कितने ही सवाल किये मगर उसने फिर किसी बात का कोई उत्तर न दिया। लाचार हो वे दोनों आदमी वहाँ से हटे और सुरंग के बाहर की तरफ चले।

जिस तरह से दारोगा उस सुरंग तक पहुंचा था उसी तरह से कड़ियों की मदद लेते हुए दोनों आदमी कुएं के बाहर हुए और कुएं की जगत पर पहुंचे। रास्ते में कोई बात न हुई पर दारोगा ने जो किसी तरह की फिक्र में डूबा हुआ था यहाँ पहुंचकर भूतनाथ से कहा, ‘‘मेरे दोस्त, मैं नहीं समझ सकता कि उस पत्थर की मूरत के मुँह से निकली हुई ऊलजलूल बातों ने तुम्हारे दिल पर किसी तरह का असर किया होगा जो जरूर किसी शैतान की शैतानी है, पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि अगर तुम यह सोचते हो कि मैंने तुमसे रिक्तगंथ ले लिया है या ऐसा करने का इरादा भी किया है तो यह बिल्कुल गलत बात है, तुम खुशी से चलकर मेरे घर की तलाशी ले सकते हो, मेरे नौकरों से पूछ सकते हो या जिस तरह से चाहो अपनी दिलजमई कर सकते हो। मैं तुमसे सच कहता हूँ कि मैंने उस किताब को कभी आंख से भी नहीं देखा।’’

भूतनाथ यह सुन बोला, ‘‘नहीं-नहीं, दारोगा साहब, भला मैं आपकी बात पर इस कदर यकीन न करूँगा कि आपकी तलाशी लूंगा!! और फिर उस मूरत ने खुद ही जब यह कह दिया कि वह किताब आपके पास भी नहीं रही और किसी तीसरे के कब्जे में चली गई तब फिर आपसे मेरा झगड़ा ही क्या रह गया?’’दारोगा : मगर इसके माने तो यह होते हैं कि तुम्हें मूरत की बात पर विश्वास है! खैर मर्जी तुम्हारी, अब यह कहो तुम्हारा इरादा क्या है? मेरे साथ चल कर वह स्थान देखना चाहते हो या वह भी नहीं?

भूत० : मैं जरूर आपके साथ चलकर वह स्थान देखूंगा और अगर वह ठीक जंचा तो कुछ समय तक वहाँ रहूँगा भी, मगर अभी नहीं। इस समय मेरे ध्यान में कुछ नई बातें घूमने लगी हैं जिनकी फिक्र में जाना मैं ज्यादा जरूरी समझता हूँ। अगर आपका विशेष हर्ज न हो तो मैं दो-तीन रोज बाद आपके पास आऊं और वह स्थान दिखाने के लिए कहूँ।

दारोगा : कोई हर्ज नहीं, तुम जब चाहे तब आ सकते हो।

दारोगा और भूतनाथ में कुछ मामूली बातें हुई और तब दोनों आदमी अलग-अलग हो गए। मगर हम अब इस समय इन दोनों में किसी के भी साथ न चलकर पुन: कुछ देर के लिए कुएं के अन्दर वाले उसी स्थान में पाठकों को ले चलना चाहते हैं जहाँ से अभी-अभी ये दोनों आ रहे हैं।

वह मूरत और उसके चारों तरफ के चारों शेर तो ज्यों-के-त्यों हैं मगर मूरत के सामने की जमीन में एक छोटे-से तहखाने का खुला हुआ मुंह दिखाई पड़ रहा है और अन्दर कुछ सीढ़ियां नजर आ रही हैं। इन सीढ़ियों की राह आइए नीचे उतर चलें और देखें भीतर क्या हाल है।

एक छोटी कोठरी में जो लम्बाई-चौड़ाई में ऊपर वाली कोठरी के समान ही होगी मगर किसी भी तरह के सामान से बिल्कुल ही खाली है हम कुछ आदमियों को खड़े देख रहे हैं और उस मोमबत्ती की रोशनी में जो एक आले में जल रही है उनको बखूबी पहचान भी सकते हैं।

इनमें से एक तो अर्जुनसिंह हैं और दूसरे दलीपशाह, और ये दोनों ही कोठरी के बीचोंबीच में खड़े ऊपर की तरफ देख रहे हैं जहाँ एक बड़ा-सा छेद इस तरह का दिखाई पड़ रहा है मानो वहाँ ऊपर की तरफ कोई पोली जगह या कोठरी बनी हुई हो। अचानक कुछ खटके की-सी आवाज आई और उस छेद में से एक छोटी-सी सीढ़ी नीचे को लटक पड़ी जिस पर होता हुआ गिरिजाकुमार नीचे उतर आया और उसने इस सीढ़ी को ऊपर की तरफ जोर से ढकेल दिया जिससे वह सरसराती हुई पुन: ऊपर चली गई और तभी एक खटके की आवाज के साथ वह गड्ढा या छेद बन्द हो गया। दोनों तरफ से दो पत्थर की सिल्लियों ने आगे बढ़कर उस मुंह को इस तरह ढांक लिया कि अब वहाँ की छत एकदम बराबर साफ और चिकनी दिखाई पड़ने लगी।

गिरिजाकुमार ने नीचे आते ही पूछा, ‘‘ कहिये गुरुजी, मैंने दोनों शैतानों से ठीक बातों कीं तो? अब दोनों आपस में लड़ मरेंगे! भूतनाथ यों तो बहुत ही चालाक है पर कभी-कभी बातों में आ जाता है, खास कर दारोगा की!’’

अर्जुन : हाँ, उसने भूतनाथ को यकीन करा दिया था कि रिक्तगन्थ ले लेना उसका काम नहीं था और न-जाने कैसे भूतनाथ को इस बात पर यकीन आ भी गया।

दलीप० : नहीं, मैं तो समझता हूँ कि भूतनाथ को दारोगा की इस बात पर यकीन बिल्कुल नहीं हुआ और वह उसे रिक्तगन्थ का चोर समझता ही रहा मगर शायद इस वक्त उससे झगड़ना नहीं चाहता था या किसी कार्रवाई की फिक्र में था इसी से उसकी बात मान बैठा।

अर्जुन० : यह भी हो सकता है, खैर अब क्या करना चाहिए?

दलीप० : इन्द्रदेवजी आ जायं तो बस यहाँ से चलना चाहिए।

गिरिजा० : लीजिये वे भी आ ही पहुंचे।

सीढ़ियों पर कुछ आहट मालूम हुई और साथ ही नीचे उतरते हुए इन्द्रदेव दिखाई पड़े जिन्होंने इस कोठरी में पहुंच कोई तरकीब ऐसी की कि उस तहखाने का मुंह बन्द हो गया।

इन्द्रदेव को देखते ही दलीपशाह ने पूछा, ‘‘गये वे दोनों शैतान?’’ जिसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘हाँ, मगर दोनों दो तरफ को गए, इस पाजी ने (गिरिजाकुमार की तरफ बताकर) दोनों में झगड़ा लगा ही दिया।’’

गिरिजा० : (हंसकर) मगर मैंने कोई बात गलत नहीं कही, क्या दारोगा ही ने नागर को भेजकर उसके जरिये भूतनाथ से रिक्तगन्थ नहीं छिनवा मंगवाया था!

इन्द्र० : खैर, तुमने जो किया ठीक किया, अब इधर बढ़ो और वह किताब मेरे हवाले करो।

गिरिजा० : (अपनी कमर में से कपड़े की कई तहों में लपेटी हुई एक पोथी निकाल और इन्द्रदेव की तरफ बढ़ाकर) लीजिए, यह अनूठी किताब।

इन्द्रदेव ने आग्रह के साथ वह पुस्तक जो कुछ अजीब ढंग की थी ले ली और उसका एक पृष्ठ खोलकर जांचने की निगाह से उसे देखा, इसके बाद इज्जत के साथ उसे माथे से लगाया और यह कहते हुए कि ‘बेशक रिक्तगंथ ही है’ अपनी जेब के हवाले किया, इसके बाद गिरिजाकुमार की पीठ ठोंककर बोले, ‘‘आज तुमने ऐसा काम किया है कि जिसका कोई जोड़ नहीं हो सकता, यह चीज अगर उन शैतानों के हाथों में पड़ जाती तो गजब कर डालते!’’

गिरिजाकुमार का चेहरा इन्द्रदेव की बात सुनकर खिल गया और वह प्रसन्नता के स्वर से बोला, ‘‘इतना तो मैं समझ गया था कि यह कोई बहुत ही विचित्र चीज मेरे हाथ लग गई मगर यह पता आप ही से लगा कि यह ऐसी अनूठी वस्तु है। मगर अब आप इसको क्या कीजिएगा? राजा बीरेन्द्रसिंह के पास पहुंचा दीजिएगा?’’

इन्द्र० : उचित तो यही होता मगर ऐसा नहीं होगा। अब इस पुस्तक के काम में आने के दिन आ गए हैं और यह शीघ्र ही ऐसे हाथों में चली जायेगी जो इसकी मदद से तिलिस्म तोड़कर उसका खजाना निकालेंगे। अच्छा अब यहाँ से चल देना चाहिए।

इन्द्रदेव इस कोठरी की पूरब तरफ वाली दीवार के पास गए जहाँ छोटे-से आले पर एक मूरत गणेशजी की बनी हुई थी। इस मूरत के पेट में अंगूठे से दबाते ही आले के एक तरफ की दीवार में छोटा सा छेद दिखाई पड़ने लगा जिसके अन्दर हाथ डालकर इन्द्रदेव ने कोई पेंच दबाया, साथ ही आले के नीचे की तरफ दीवार में छोटे तहखाने का मुंह निकल पड़ा जिसमें उतरने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियां बनी हुई थीं। आगे-आगे इन्द्रदेव और पीछे-पीछे ये तीनों आदमी उस तहखाने में उतर गए और इनके जाते ही एक खटके की आवाज के साथ उस तहखाने का मुंह बन्द हो गया।

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