लोगों की राय

मूल्य रहित पुस्तकें >> भूतनाथ - खण्ड 3

भूतनाथ - खण्ड 3

देवकीनन्दन खत्री

Download Book
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :300
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8362
आईएसबीएन :978-1-61301-020-4

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

421 पाठक हैं

भूतनाथ - खण्ड 3 पुस्तक का ई-संस्करण

आठवाँ बयान


हाथों में नंगी तलवारें लिए दारोगा के आदमियों ने भीम, दत्त और भूतनाथ इत्यादि को चारों तरफ से घेर लिया परन्तु दत्त के खंजर से निकली हुई अद्भुत रोशनी के कारण उनकी आँखें बिल्कुल बेकार हो गईं। ज्यादा दूर रहने पर तो ये लोग कुछ-कुछ देख भी रहे थे मगर जब नजदीक पहुँचे तो उनकी आँखें एकदम चौंधिया गईं और ऐसी अवस्था में आँखें बन्द कर लेने अथवा पीछे हट जाने के सिवाय उनके किये हो ही क्या सकता था? अस्तु वे क्रम से पीछे हटते हुए दूर जाकर खड़े हो गए और हसरत तथा डर की निगाहों से खंजर में से निकलती हुई अपूर्व रोशनी को देखने लगे।

दारोगा जो अभी तक उसी जगह खड़ा यह सब कार्रवाई देख रहा था घबरा उठा और असली भेद को न जानने के कारण अपने सिपाहियों को बुजदिल समझने लगा। मगर बिहारी और हरनामसिंह, जो दारोगा से अलग हो कहीं दूसरी ही जगह से अपनी घात में लगे थे यह हाल देख आश्चर्य में डूब गए बल्कि उनके दिलों में एक प्रकार का डर समा गया और तरह-तरह के खयालात उनके दिमाग में तेजी के साथ चक्कर खाने लगे, यहाँ तक कि वे घबरा कर पुनः दारोगा की तरफ बढ़े और उससे बातें करने लगे।

इन लोगों में क्या बातें हुईं इसके लिखने की यहाँ आवश्यकता नहीं अस्तु हम इस समय इनका साथ छोड़ दत्त, भीम और नकली भूतनाथ की तरफ चलते और देखते हैं कि उन लोगों का क्या हाल है।

दारोगा के आदमियों से घिर जाने पर दत्त, भीम तथा उनके साथी हताश न हुए बल्कि आश्चर्य की निगाहें डालते हुए सोचने लगे कि यह सब सिपाही किसके हैं और यहाँ क्योंकर आ पहुँचे, साथ ही वे लोग म्यान से तलवारें निकाल मुकाबिले के लिए भी तैयार हो गए मगर जब इन्होंने देखा कि दुश्मन सब आपसे आप पीछे हटते हुए दूर चले गए हैं तो दत्त ने कुछ सोच कर कब्जा ढीला किया और अंधकार में छिपता हुआ सबको साथ ले पीछे लौट कर उस जगह पहुँचा जहाँ कैदियों को छोड़ दिया गया था। अब उन लोगों में इस तरह बातचीत होने लगी :—

दत्त : (भीम से) कुछ मालूम नहीं पड़ता कि ये सब आदमी किसके हैं?

भीम : निश्चय तो नहीं कह सकता परन्तु यदि दारोगा का शक किया जाय तो अनुचित भी न होगा।

भूत० : नहीं-नहीं, आपका विचार किसी तरह भी अनुचित नहीं कहा जा सकता और मेरा भी यही खयाल है कि वह सब आदमी अवश्य उसी के होंगे। रहा उनका ऐसे समय में यकायक आ जाना, सो यह भी कोई ऐसी बात नहीं जो शीघ्र समझ में न आ जाय। जैपाल की गिरफ्तारी तथा तालियों का दारोगा के कब्जे में चले जाना ही इस बात को साबित करता है कि दारोगा अपने कैदियों को यहाँ से निकालने के उद्योग में अवश्य लगा होगा और उसको इधर से एक क्षण के लिए भी निश्चन्ती न मिलती होगी कल रात भर उसे नागर के मकान ही से छुट्टी नहीं मिली होगी और इस कारण वह न आ सका होगा मगर आज वह अपने कैदियों की टोह में अवश्य आया होगा। यद्यपि अभी तक वह कहीं दिखाई नहीं पड़ा है तथापि जरूर यहीं कहीं छिपा होगा और बिहारीसिंह तथा हरनामसिंह भी उसे साथ निश्चय ही होंगे।

दत्त : निःसन्देह तुम्हारा ख्याल ठीक है। जब मैंने तुम लोगों को कैदियों के साथ अजायबघर से निकलते देखा था तो पहले मुझे भी यही खयाल हुआ था कि तुम लोग दारोगा के साथी हो बल्कि जमना ने मुझसे पूछा भी था कि आश्चर्य नहीं कि ये सब लोग उन्हीं लोगों को निकाल कर लिए जाते हों जिनको छुड़ाने के लिए हम लोग यहाँ आए हैं।

भीम : मुझे भी यही विश्वास है कि ये दारोगा के आदमी हैं मगर जमना और सरस्वती कहाँ चली गईं? कहीं वे दारोगा के कब्जे में पुनः न पड़ जायं! यदि ऐसा हुआ तो बहुत बुरा होगा। इस मरतबा उन बेचारियों को वह कदापि जीता न छोड़ेगा।

इतना कहते-कहते उसका गला भर आया और वह चुप हो गया।

दत्त : हाँ, बात तो ऐसी ही है, मगर तुम जरा भी चिन्ता न करो, ईश्वर ने चाहा तो मैं सवेरा होते-होते तक जमना और सरस्वती को जरूर खोज निकालूँगा।

भीम का साथी दारोगा : इस समय देर तक यहाँ बैठ कर सलाह-मशविरा करना उचित नहीं है। इस अनमोल समय को व्यर्थ न खोना चाहिए बल्कि चलने की तैयारी करने चाहिए। दुश्मन चारों तरफ छिपे हुए हैं और न-जाने कब हमला कर बैठें?

दत्त : निःसन्देह तुम ठीक कहते हो, अब हमको यहाँ से चल ही देना चाहिए।

जल्दी-जल्दी उन लोगों ने आपुस में कुछ सलाह की जिसके बाद दत्त ने अपना तिलिस्मी खंजर और उसके जोड़ की अंगूठी भैयाराजा के हवाले कर दी और वे भूतनाथ को साथ ले एक तरफ को रवाना हो गए मगर दत्त अपने साथियों को लिए उसी जगह ज्यों-का-त्यों खड़ा रहा।

भूतनाथ को अपने साथ लिए और तेजी के साथ चलते हुए राजाभैया लगभग सौ कदम की दूरी पर निकल गए और इस बीच में किसी दुश्मन से उनका सामना न हुआ इस समय जहाँ वे रुके एक गुँजान झाड़ी थी जहाँ पहुँच उन्होंने दत्त के दिए हुए खंजर का कब्जा दबाया जिससे पहले की तरह अद्भुत रोशनी प्रकट हुई और भूतनाथ रूपी नन्दराम की आँखें बन्द हो गईं। यद्यपि चन्द्रदेव अभी तक अस्त नहीं हुए थे और भैयाराजा को रास्ते का पूरा अन्दाजा मिलता जाता था तथापि कब्जा दबा कर रोशनी पैदा करने से भैयाराजा का क्या तात्पर्य था यह शायद नकली भूतनाथ समझ न सका क्योंकि उनसे तुरन्त ही कहा, ‘‘भला आप यह क्या करते हैं, दुश्मन इस रोशनी को देख कर इधर ही चले आवेंगे और हम लोगों का पीछा करेंगे।’’

भैया० : दुश्मन मेरे पीछे-पीछे चले आवें यही मैं चाहता हूँ और रोशनी करने से भी मेरा यही मतलब है। (खंजर का कब्जा ढीला छोड़ कर) लो तुम आँखें तो खोलो!

भूत० : अच्छा अब मैं समझा! आपका मतलब यह है कि दुश्मन को इधर बुला कर उधर का मैदान खाली करा दें ताकि कैदियों के ले जाने में बाधा न रहे।

भैयाराजा : बेशक मेरा यही मतलब है।

भूत० : अगर यही बात है तो फुर्ती से आगे बढ़िए और यहाँ ज्यादा न ठहरिए।

बेशक भैयाराजा की इस कार्रवाई से दुश्मनों ने बेतरह धोखा खाया। वे लोग बिना सोचे-विचारे भैयाराजा और भूतनाथ के पीछे चल पड़े। अभी वे पहली जगह पर अर्थात् उस झाड़ी के पास जहाँ भैयाराजा ने रोशनी की थी पहुँचे भी न थे कि पुनः कुछ दूरी पर वैसी ही रोशनी मालूम हुई जिसे देख ये लोग पहले रास्ते को छोड़ उस तरफ मुड़े जिधर अब रोशनी दिखाई पड़ रही थी।

इसी तरह सवेरा होने के पहले तक इनको कई बार वह अद्भुत रोशनी दिखायी पड़ी और ये लोग भी बराबर पीछा करते ही चले गए यहाँ तक कि अजायबघर से बहुत दूर निकल गए मगर उसके बाद बहुत खोज करने पर भी भैयाराजा, भूतनाथ अथवा उनके किसी साथी का उन लोगों को कुछ पता न लगा। पहर दिन चढ़े तक सभों की तलाश होती रही पर कुछ पता न चला और आखिर निराश हो दारोगा सिपाहियों और उन दोनों औरतों (जमना-सरस्वती) को साथ ले जमानिया की तरफ लौटा, मगर बिहारीसिंह और हरनामसिंह उसके साथ न हुए, उन्होंने दारोगा से कुछ कह-सुन किसी दूसरी ही तरफ का रास्ता लिया।


...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book