भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

नौवाँ बयान


संध्या का समय है। सूर्य भगवान अस्त हो चुके हैं। हवा में किसी कदर खुनक है तो सही परन्तु वह भली मालूम होती है। ऐसे समय में हम नहीं कह सकते कि तिलिस्मी दारोगा साहब किस नीयत से अपने मकान के पीछे वाले नजरबाग में टहल रहे हैं, मगर इनकी ऐसी आदत न थी और इन्हें लोगों ने संध्या के समय दिल बहलाने के लिए किसी बाग में टहलते हुए बहुत कम ही देखा होगा। पर आज गौरमामूली तौर पर उसका टहलना बेसबब नहीं है, उसका घड़ी-घड़ी ठण्डी साँसें खींचना और घबराहट के साथ इधर-उधर देखना कहे देता है कि इस समय वह किसी गम्भीर चिन्ता में निमग्न हो रहा है, साथ ही इसके बीच-बीच में उसके बदन में कम्प तथा रोमांच के हो आने से यह भी विश्वास होता है कि वह किसी कारण से भयभीत हो रहा है। केवल इतना ही नहीं, एक दफे उसने बड़ी बेचैनी के साथ दाहिने हाथ से अपना माथा भी ठोंका जिससे जाना जाता है कि उसने जरूर कोई बुराई का काम किया है जिसके लिए अब पछताता और दिल में कहता है कि कहाँ की शामत आई थी जो मैंने यह काम किया!

इसी तरह के बहुत-से परेशानी और घबराहट के चिन्ह प्रकट करता हुआ दारोगा बड़ी देर तक बेचैनी से कदम उठाता अपने बाग में टहलता और थोड़ी-थोड़ी देर में सर उठा कर फाटक की तरफ देखता रहा। लगभग आधे घण्टे के बाद जैपालसिंह पर उसकी निगाह पड़ी जो कदम बढ़ाये हुए उसी की तरफ आ रहा था। उसके नजदीक पहुँचते ही दारोगा ने उससे कहा, ‘‘ओफ, तुमने आने में बहुत विलम्ब कर दिया!’’

जैपाल : (गौर से दारोगा के चेहरे की तरफ देख के) नहीं तो, मगर क्यों? और इस समय आप बहुत ही उदास और दुखित भी जान पड़ते हैं।

दारोगा : मेरे दोस्त, इस समय मेरी अवस्था बहुत ही बुरी हो रही है और मैं अपने किये पर बहुत पछता रहा हूँ। सच तो यह है कि आज मैं अपनी जिन्दगी से निराश हो बैठा हूँ जिसके अंधकारमय कैदखाने में तुम ही एक टिमटिमाते हुए चिराग हो, टिमटिमाते हुए मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मेरी जिन्दगी के साथ तुम्हारी जान का भी बहुत बड़ा सम्बन्ध है।

जैपाल : बेशक ऐसा तो है ही।

दारोगा : और मुझे इस समय केवल एक तुम्हारा ही भरोसा रह गया।

जैपाल : आखिर मामला क्या है सो तो कहिये? क्या भैयाराजा की लाश में कुछ धोखा निकला?

दारोगा : कुछ क्या बल्कुल ही धोखा निकला, जिसे मैंने भैयाराजा की लाश समझ जमीन के अन्दर गाड़ दिया था, वह वास्तव में मेरे ही एक ऐयार की लाश निकली और मैं कुछ नहीं कह सकता कि कब और किस ढंग से उनकी बदली हुई, क्योंकि मैं यह भी नहीं कह सकता कि वे भैयाराजा वास्तव में भैयाराजा थे या नहीं जिन्हें मैंने अपने मकान में पाकर फंसाया था!

जैपाल : और फिर यह भी कोई बात है कि आप ही का ऐयार भैयाराजा बन कर आवे और आपको ही डाँट बताये!

दारोगा : हाँ, यह भी कदापि नहीं हो सकता!

जैपाल : मगर यह बात वास्तव में बहुत ही बुरी हुई! उधर जमना, सरस्वती, इन्दुमति के मामले में किसी ने धोखा दिया और इधर भैयाराजा के बारे में..।

दारोगा : मेरी कुछ समझ ही में नहीं आ रहा है कि यह बात क्योंकर हुई! क्या मेरा कोई दुश्मन मेरे घर में घुस आया और मेरे ही घर में से उन सभों को बदल कर ले गया? मगर यह भी एक असम्भव-सी बात है, मेरे भूलभुलैये मकान की किसी दुश्मन को खबर ही क्या हो सकती है!

जैपाल : अब यह तो न कहिये, आपके मकान को एक ही रात में कुछ विश्वकर्मा ने तो बना ही नहीं दिया है, आखिर राज-मजदूरों ही ने तो बनाया है!

दारोगा : हाँ, यह तो ठीक कहते हो। खैर, परन्तु यह बताओ कि अब किस तरह जान बचे, किस तरह दुश्मन का पता लगे, और किस तरह इस मामले का सच्चा हाल मालूम हो!

जैपाल : यह कोई मामूली बात नहीं है, इसके लिए बहुत कुछ मेहनत करनी पड़ेगी तब कहीं दुश्मन का पता लगेगा। खैर इस काम को तो पीछे रखिये पहिले अपने को इलजाम से बचाने की फिक्र करिये, मेरा तो अब खयाल हो रहा है कि महाराज ने जो सूरत देखी थी वह भूत न था बल्कि वास्तव में भैयाराजा ही थे और आपको जहन्नुम में मिलाने के लिए कोई नाटक कर रहे हैं!

दारोगा : बेशक ऐसा ही है और मुझे भी तो भूत दिखाई दिया था वे जरूर असली राजाभैया ही रहे होंगे।

जैपाल : बेशक वह भी भैयाराजा ही होंगे, अपना नाटक दिखाकर किसी अनूठे ढंग से प्रकट हुआ चाहते हैं।

दारोगा : फिर अब क्या किया जाय?

जैपाल : मैं क्या बताऊँ, आपसे ज्यादे इस विषय में और कौन सोच सकता है? हाँ, यह कह सकता हूँ कि मुझे जो कुछ आज्ञा दीजिये उसे करने के लिए मैं तैयार हूँ।

दारोगा : (कुछ सोच कर) चाहे जो कुछ भी हो मगर भैयाराजा मुझे महाराज के सामने दोषी नहीं ठहरा सकते। यों उन्हें अख्तियार है चाहे स्वयं अपने हाथ से मेरा सर काट डालें मगर यह जबर्दस्ती के सिवाय इन्साफ का काम कदापि न कहला सकेगा, और हमारे महाराज जो इन्साफ के लिए जान देते हैं बेइन्साफी का काम कदापि न होने देंगे!

जैपाल : (आश्चर्य से) क्यों साहब, यह क्या बात आपने कही? भैयाराजा अगर जीते हैं तो आपको दोषी क्यों न ठहरा सकेंगे?

दारोगा : भैयाराजा को यह मालूम ही नहीं होगा कि मैंने उन्हें मुर्दा समझ कर बदनीयती के साथ जमीन के अन्दर गाड़ दिया है।

जैपाल : हाँ ठीक है, वह बात उन्हें भला कैसे मालूम हो सकती है! मगर हां, इस बात का सवाल जरूर हो सकता है कि आखिर उस लाश को जो उन्हीं की सूरत की-सी थी आपने क्या किया? अगर आपकी नीयत ठीक थी तो आपने हल्ला क्यों न मचाया, प्रकट क्यों नहीं किया, और महाराज से यह हाल क्यों नहीं कहा, उस बात को छिपाया क्यों?

दारोगा : ओफ! यह दूसरी बात है, इसके लिए समय पर काफी जवाब हो सकता है। और इसके लिए मैं इनकार कर सकता हूँ कि वहाँ अर्थात् मेरे घर में कोई भी लाश नहीं पाई गई, भैयाराजा स्वयं भाग के चले गये, दूसरे की तो बात ही दूर है खुद भैयाराजा ही मुझे किसी तरह कायल नहीं कर सकते और न वे यही बता सकते हैं कि मैंने उनके साथ किसी तरह की बेअदबी की। हाँ एक बात जरूर है वे इतना कह सकते हैं कि उन्हें उस भूलभुलैया जैसे मकान में फँसा कर हम चले गये और फिर लौट कर नहीं आये! सो खैर इसके लिए भी मैं कोई जवाब सोच लूँगा।

जैपाल : अगर यही बात है तो फिर आप इतना डर क्यों रहे हैं?

दारोगा : हाँ डरता जरूर हूँ, मेरी हिम्मत टूटी जाती है और भैयाराजा के नाममात्र से ही मेरा कलेजा उछलने लगता है।

जैपाल : जिसका सबब यही होगा कि आप किसी-न-किसी बात में जरूर लाजवाब हो जायेंगे, और नहीं तो सिर्फ इन्हीं बातों का जवाब देना आपके लिए कठिन हो जायगा कि भैयाराजा के असली मामले की महाराज को खबर क्यों नहीं की? यह क्यों नहीं जाहिर किया कि वे आपके बाग में आये थे और जमना, सरस्वती तथा इन्दुमति को आपकी कैद से छुड़ाने की उन्होंने फिक्र की थी—इत्यादि।

दारोगा : हाँ यह बात जरूर खुटके की है! (कुछ सोच कर) अगर तुम्हारी राय हो तो राजा साहब को मैं इस मामले की खबर कर दूँ और कुछ अपनी तरफ से भी समझा-बुझा दूँ। तुम जानते ही हो कि वे निरे भोलेनाथ हैं। (रुक कर और चौंक कर) हाँ एक बात तो मैंने तुमसे कही ही नहीं।

जैपाल : वह क्या?

दारोगा : मुझे खबर मिली है कि आज जनाने महल के पीछे वाले नजरबाग में गुप्त रीति पर सख्त पहरे का इन्तजाम हो रहा है, पहरा देने वाले इस तरह छिप कर पेड़ों की आड़ में बैठेंगे कि बाग के अन्दर आने वाला कोई आदमी उन्हें देख न सकेगा पर वे बाग के अन्दर आने वाले को बखूबी देख और गिरफ्तार कर सकेंगे।

जैपाल :यह खबर आपको किसने दी?

दारोगा : उन्हीं पहरे पर मुकर्रर किए गए आदमियों में से एक ने यह खबर सुनाई है।

जैपाल : हाँ वे सब तो आपके हितैषी ही हैं, मगर यह भी कुछ मालूम हुआ कि ऐसा इन्तजाम करने का सबब क्या है?

दारोगा : सो तो ठीक मालूम नहीं हुआ मगर अन्दाज से हम समझते हैं कि जिस तरह भैयाराजा भूत बन कर मुझे और महाराज को दिखाई दिये हैं उसी तरह भूत बन कर शायद महल में भी गये होंगे और यकायक भूत की तरह गायब न हो सके होंगे, किसी ने भागते हुए देख लिया होगा और समझा होगा कि यह कोई आदमी है, या किसी तरह की कोई बात हुई होगी जिस पर महाराज ने यह समझकर कि आज पुनः आवेगा गिरफ्तार करने के लिए ऐसा इन्तजाम किया होगा।

जैपाल : हाँ, जरूर कोई ऐसी ही बात हुई होगी और ऐसी अवस्था में आपको ऐसा इन्तजाम करना चाहिए कि जब वह आदमी गिरफ्तार हो (ईश्वर करे व भैयाराजा ही हों) तो उसे महाराज के पास पहुँचाने के बदले गिरफ्तार करने वाले सीधे आप ही के पास पहुँचा दें। अगर वह वास्तव में भैयाराजा निकले तो फिर कहना ही क्या है, आपके पौ बारह हैं!!

दारोगा : हाँ, यह तुमने अच्छी सलाह बताई और इस काम को मैं बखूबी कर भी सकूँगा। इस तरह पर अगर राजाभैया हाथ में आ गए तब तो मेरे समान इस दुनिया में कोई नहीं, लेकिन अगर ऐसा न हुआ तो फिर अपने लिए बहुत कुछ चिन्ता करनी पड़ेगी। अच्छा अब मैं तुमसे थोड़ी-सी बातें और करूँगा मगर यहाँ नहीं।

इतना कहकर दारोगा ने जैपाल का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने साथ लिए हुए मकान की तरफ चला।

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