भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

चौदहवाँ बयान


अब हम अपने पाठकों को एक कैदखाने के अन्दर ले चल कर थोड़ी देर के लिए वहाँ का दृश्य दिखाया चाहते है, इस कैदखाने में इस समय केवल जैपालसिंह ही कैद हैं जिसे इस बात की कुछ भी खबर नहीं कि यह कैदखाना किस शहर में है, इसका मालिक कौन है, तथा उसे किसने गिरफ्तार करके कैद कर रक्खा है।

उसके हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी पड़ी हुई है। कपड़े बिलकुल ही मामूली दर्जे के है। एक कम्बल बिछाने के लिए तथा दूसरा ओढ़ने के लिए उसे दिया गया है। उससे सिर्फ चार-पाँच हाथ की दूरी पर पानी से भरा हुआ एक मिट्टी का घड़ा तथा पीतल का एक गिलास दिखाई दे रहा है, बस इसके अतिरिक्त उस कैदखाने में कुछ भी नहीं है। हाँ, एक तरफ चिराग जरूर जल रहा है जिसकी रोशनी इस कैदखाने के अन्धकार को दूर कर रही है।

कैदखाने की यह कोठरी लगभग पाँच हाथ चौड़ी और आठ या दस हाथ लम्बी होगी। तीन तरफ संगीन दीवार और चौथी तरफ लोहे का जंगला है और उसी जंगले में जाने के लिए छोटा-सा एक दरवाजा भी बना हुआ है।

जंगले के आगे एक मुख्तसर-सा दालान, मोरी और दोनों तरफ दो कोठरियाँ हैं तथा कोने में ऊपर चढ़ जाने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियाँ भी दिखाई दे रही हैं जिससे मालूम होता है कि यह कैदखाना किसी मकान के निचले हिस्से में बना हुआ है।

जैपालसिंह कदाचित् इस बात को जानता है कि यह समय रात का है और कुछ ही समय बाद उसकी दुर्दशा होने वाली है। वह सर झुकाए हुए किसी गम्भीर चिन्ता में निमग्न है मगर थोड़ी-थोड़ी देर में उन सीढ़ियों की तरफ देख लेता है जो बाहर दालान में ऊपर चढ़ जाने के लिए बनी हुई थीं।

कैदखाने के ऊपर वाली छत पर कुछ धमधमाहट की आवाज हुई और जैपाल ने पुनः सर उठा कर सीढ़ियों की तरफ देखा। एक औरत कोड़ा लिए हुए नीचे उतरी तथा उसके बाद दूसरी और फिर तीसरी औरत भी नीचे उतरी जिनके हाथों में नंगी तलवारें थीं। इन्हें देख कर एक दफे जैपाल थर्रा उठा और उसके चेहरे पर मुर्दनी छा गई। हम नहीं कह सकते कि उन औरतों को वह पहिचानता था या नहीं।

उन औरतों के चेहरे पर नकाब पड़ी हुई थी और उनका तमाम बदन स्याह लबादों से ढका हुआ था। तीनों औरतें दरवाजा खोल कर कैदखाने के अन्दर आ गईं। जिस औरत के हाथ में कोड़ा था वह आगे बढ़ी और जैपाल के पास खड़ी होकर बोली, ‘‘कहिये आपने अपने सोच-विचार का क्या नतीजा निकाला? मेरी बातों का ठीक-ठीक जवाब दोगे या नहीं?’’

जैपाल० : हाँ। जो कुछ मैं जानता हूँ वह जरूर कह दूँगा, मगर जिन बातों का मुझे गुमान भी नहीं है उनके विषय में मैं क्या कह सकता हूँ।

औरत :मैं खूब जानती हूँ कि तुम्हें क्या-क्या भेद मालूम है, इसलिए मैं वही बात पूछूँगी जिसका जवाब तुम दे सकते हो। यह बात हम लोगों से छिपी हुई नहीं हि कि तुम दारोगा के कैसे दोस्त हो, दारोगा तुम्हें कितना मानता है और अपने पापकर्म तथा भेदों में तुम्हें कहाँ तक साथी बनाता है।

जैपाल : दुनिया में गप्पें बहुत उड़ा करती हैं मगर उनमें सार कुछ भी नहीं होता या बहुत ही कम होता है। दारोगा साहब का दोस्त बनने के लिए जितनी हैसियत, ताकत, होशियारी, बुद्धिमानी और ऐयारी की जरूरत है उसका सौवाँ हिस्सा भी मुझमें नहीं है, ऐसी अवस्था में वे क्योंकर मुझे अपना सच्चा हितैषी या दोस्त मान सकते हैं? मगर हाँ, गप्प उड़ाने वालों की जुबान रोकी नहीं जा सकती और न उसमें से असल तत्व को छाँट कर कोई अपनी दिलजमयी कर सकता है।

औरत० : बुरे और दुष्ट तथा दुराचारी लोगों के दोस्त बनने में पंडित होने की कोई आवश्यकता नहीं, कोई विद्वान, बुद्धिमान, होशियार और सच्चा ऐयार दारोगा जैसे पतित और दुष्ट प्रकृति के आदमी का दोस्त नहीं बन सकता। जो तुम्हारे ऐसे अदूरदर्शी और नालायक हैं वे ही उसके साथी बन सकते हैं। इसी तरह गप्पें भी बेबुनियाद नहीं हुआ करतीं, बिना एकवचन के बहुवचन का होना असम्भव है, किसी विद्वान का कथन है कि जब तक कोई एक चीज नहीं होती तब तक लोग उसे बहुत चीजें कह कर मशहूर नहीं कर सकते।

अस्तु तेरी ही कही बातों की पुष्टि करके मैं कहती हूँ कि तुझमें किसी तरह की हैसियत, ताकत, होशियारी और बुद्धिमानी नहीं और न तू सच्चा ऐयार ही है इसलिए दारोगा से तेरी पटती है और तुझे वह उल्लू समझ कर अपने पाप का साथी और भागी बनाए हुए है और वास्तव में तू उसी के योग्य है भी। इसके अतिरिक्त जिस बात को हम लोग जानते हैं उसके छिपाने की कोशिश करना भी तेरा व्यर्थ है।

जैपाल० : (कुछ सोच कर) मैं भी आप लोगों से बहस करना नहीं चाहता, जो कुछ जानता हूँ उसे सच-सच कह दूँगा क्योंकि आपके हाथ का कोड़ा मुझे किसी तरह पर भी बहाना नहीं करने देगा यह मैं खूब समझता हूँ। मगर आप लोग भी व्यर्थ अन्याय करके मुझे दुःख नहीं देंगी इसका भरोसा है।

औरत० :अच्छा पहिले यह बता कि दयारामजी कितने दिनों तक दारोगा के कैदखाने में रहे और इन दिनों वे कहाँ हैं?

जैपाल० : इन दिनों वे कहाँ हैं सो तो मैं नहीं जानता मगर यह कह सकता हूँ कि दारोगा के कैदखाने में वे चार-पाँच वर्ष से ज्यादे ही दिनों तक रहे, अभी हाल में उनका कोई दोस्त उन्हें छुड़ा ले गया।

औरत० : बेशक यह बात तूने सच कही, अच्छा यह तो बता कि आजकल उसके कैदखाने में कौन-कौन है?

जैपाल० : मेरी जानकारी में तो इन दिनों उसके यहाँ कोई भी कैद नहीं है।

औरत० : (बिगड़ कर) कैद है और जरूर है! तू इस बात को खूब जानता है और कैदियों को अच्छी तरह पहिचानता भी है।

जैपाल० : नहीं नहीं, मैं सच कहता हूँ कि और किसी कैदी के विषय में मैं कुछ भी नहीं जानता, हाँ भैयाराजा की स्त्री जरूर उनके कब्जे में है।

औरत० : उन्हें उसने कहाँ पर रक्खा है?

जैपाल० : सो मैं नहीं जानता ।

औरत० : (सिर हिला कर) बेशक तू नहीं जानता, क्योंकि कल की मार तुझे याद नहीं है। खैर कोई चिन्ता नहीं। मेरे हाथ का कोड़ा पता लगा लेगा कि कम्बख्त दारोगा ने उन्हें कहाँ पर कैद रक्खा है, मगर पहिले तुझे यह बताना पड़ेगा कि और कितने आदमियों को दारोगा ने कैद कर रक्खा है और वे इस समय कहाँ हैं! इस विषय में बहाना करना तेरे हक में अच्छा नहीं, कैदियों का हाल ठीक-ठीक बता देने ही से मैं तुझे छोड़ दूँगी, नहीं तो समझ रख कि इस कैदखाने में तेरी जिन्दगी समाप्त हो जाएगी और इस कोड़े से हर रोज तेरी खातिर की जाएगी।

जैपाल० : (कुछ देर तक सोच कर) मैं नहीं कह सकता कि मेरी बातों पर किस तरह आपको विश्वास होगा तथापि जो कुछ मैं जानता हूँ वह साफ कहे देता हूँ, दारोगा साहब के यहाँ अब भी चार-पाँच कैदी हैं मगर सिवाय भैयाराजा की स्त्री के और किसी को भी मैं नहीं पहिचानता।

पहिले तो वे कैदी उनके घर ही में तहखाने के अन्दर कैद थे परन्तु जब से दयाराम को कोई छुड़ा कर ले गया है तब से अपने मकान में वे किसी कैदी को नहीं रखते। महाराज से उन्होंने अजायबघर की ताली ले ली है और सब कैदियों को उसी अजायबघर में पहुँचा दिया है।

औरत० : मैंने भी ऐसा ही सुना है परन्तु तेरी इस बात को मैं आजमाऊँगी। अगर तू सच्चा निकला तो जरूर तुझे छोड़ दूँगी!

जैपाल० : क्या उस अजायबघर को तुम जानती हो?

औरत० : मैं खूब जानती हूँ।

जैपाल० : मगर उसके अन्दर जाना बिल्कुल ही असम्भव है।

औरत० : कदाचित ऐसा ही हो इससे कोई मतलब नहीं, तेरा कहना ठीक होने से ही मैं तुझे छोड़ दूँगी।

जैपाल० : जबकि वहाँ तक तुम पहुँच ही नहीं सकती हो बल्कि और भी किसी का पहुँचना असम्भव है तब मेरी बातों की सच्चाई का हाल तुम्हें जल्द कैसे मालूम हो सकता है। ऐसी अवस्था में सच कह देने पर भी मैं व्यर्थ की मुसीबत झेलता रहूँगा।

औरत० : नहीं, ऐसा नहीं होगा, मैं वहाँ पहुँचने का बन्दोबस्त कर लूँगी और तुझे ज्यादे दिनों तक यहाँ सड़ना न पड़ेगा।

जैपाल० : अगर मुझे अपने साथ ले चलो तो मै इस काम में तुम्हारी मदद भी कर सकूँगा।

औरत० : (हँस कर) तेरी मदद की मुझे जरूरत नहीं तथापि मैं सोच कर कल इस बात का जवाब तुझको दूँगी।

इतना कह कर वह औरत वहाँ से हट गई। कैदखाने का दरवाजा बन्द कर दिया गया और तीनों औरतें जिस राह से आई थीं ऊपर चली गईं। ये तीनों औरतें जमना, सरस्वती और इन्दुमति थीं जोकि आजकल इन्द्रदेव के कैलाश-भवन में दिखाई दे रही हैं और जैपाल कैलाश–भवन ही के एक कैदखाने में बन्द है जिसे दयाराम, भैयाराजा और प्रभाकरसिंह ने भूतनाथ के कब्जे से निकालकर यहाँ भेज दिया था तथा जिसका कुछ हाल ऊपर बयान हो चुका है और होगा।

उस समय दो-ढाई घण्टे रात जा चुकी थी, कैदखाने से निकल कर वे तीनों इन्द्रदेव के पास पहुँची जोकि इस समय अपने पूजा वाले कमरे में संगमरमर की एक चौकी पर बैठे श्रीमद्भवद्गीता का पाठ करते हुए उसकी गुत्थियों को सुलझाने का उद्योग कर रहे थे।

जमना, सरस्वती और इन्दुमति उनके पास जाकर चौकी के नीचे दाहिनी तरफ बैठ गईं। इन्द्रदेव ने मुस्कराते हुए उनकी तरफ देखा और पूछा, ‘‘कहो तुम तीनों जैपाल से मिल आईं?’’

जमना० :जी हाँ, वह तो बड़ा ही डरपोक है। उसमें इतनी हिम्मत कहाँ कि अपने मित्रों के भेदों को छिपाने के लिए जान समर्पण करे या कष्ट उठाये!

इन्द्र० : दुनिया में जितने लोभी-लालची और खुदगर्ज आदमी हैं उन सभी का यही हाल है। अच्छा कुछ हाल उसकी जुबानी मालूम हुआ?

जमना० : जी हाँ, यह भी उसी बात की पुष्टि करता है अर्थात कहता है कि दारोगा ने अपने सब कैदियों को अजायबघर में ले जाकर बन्द कर दिया है।

इन्द्र० : वास्तव में यही बात ठीक है, जिस दिन मुझे यह खबर लगी कि दारोगा ने अजायबघर की ताली राजा साहब से ले ली है उसी दिन मैं समझ गया कि अब वह अपने कैदियों को वहाँ ही ले जाकर रक्खेगा। पर कोई चिन्ता नहीं, दयाराम, प्रभाकरसिंह और भैयाराजा जिस उत्साह के साथ गये हैं आशा है कि अपने काम में अवश्य सफल-मनोरथ होंगे। यद्यपि वे तीनों बहुत कुछ कर गुजरने के योग्य हैं तथापि मुझे विश्वास नहीं हुआ, आज सवेरे मैंने अपने दो शिष्यों को भी उनकी मदद के लिए भेज दिया है।

जमना० : तो क्या मेरा मनोरथ सिद्ध न होगा?

इन्द्र० : तुम तो व्यर्थ ही इस मामले में पड़ना चाहती हो, बहुत दिनों तक दुःख भोगने के बाद ईश्वर ने तुम्हारे लिए अपूर्व सुख का सामान कर दिया है तो अब तुम पुनः दुःख भोगने का बन्दोबस्त करती हो! भला दारोगा और गदाधरसिंह का मुकाबला करना और उस अजायबघर के अन्दर जाना तुम औरतों का काम है? मैंने तुम दोनों के वास्ते गदाधरसिंह का मुकाबला करने के लिए कितना बड़ा सामान पैदा कर दिया था। और उस समय भूतनाथ को इसका गुमान भी न था कि तुम इस दुनिया में हो, तब तो तुम लोगों के किए कुछ हुआ ही नहीं आज गदाधरसिंह हर तरह से होशियार और जानकार हो रहा है तब तुम भला इस समय क्या कर सकती हो? मैं तुम्हारे इस इरादे को कदापि पसन्द नहीं करता।

जमना० : (हाथ जोड़ कर) आपका कहना बहुत ठीक है, मैं उसी शर्मिन्दगी को मिटाने के लिए इस समय आपसे प्रार्थना कर रही हूँ और दारोगा तथा गदाधरसिंह ने जो कुछ मुझे दुःख दिया है उसका बदला अपने हाथ से लिया चाहती हूँ। अगर मैं ऐसा न कर सकी तो सब तरह का सुख पाने पर भी जिन्दगी-भर मेरे दिल में यह दाग बना ही रहेगा। उस समय यदि हम लोगों से भूल हो गई तो क्या सदैव ही भूल हुआ करेगी? इसके अतिरिक्त जमाने का दुःख –सुख भोग कर पहिले की बनिस्बत आज हम लोग होशियार हो रही हैं तथा हर तरह का तजुर्बा भी हो गया और सबसे बढ़ कर यह कि आपका भरोसा हम लोगों के साथ है।

इन्द्र० : बेशक पहिले की बनिस्बत आज तुम लोगों की शक्ति बढ़ी हुई है मगर गदाधरसिंह भी पहिले की अपेक्षा आज चैतन्य है और दारोगा जैसे दुष्ट को अपना साथी बनाए हुए है। क्या दारोगा की होशियारी, मक्कारी और शैतानी गदाधरसिंह से कम है?

जमना० : यह सब कुछ सच है परन्तु यदि मेरे दिल की अभिलाषा पूरी न हुई तो इस दुनिया में मेरी जिन्दगी व्यर्थ है, तब तो मुझमें और एक निःसहाय कंगाल अबला में कुछ भी भेद न रहा।

जमना और सरस्वती की आँखों से आँसूओं की धारा बह चली।

इन्द्र० : उन दोनों ने जो कुछ तकलीफें तुम्हें दी हैं उनका बदला यदि तुम्हारे पति अपने हाथ से लेंगे तो क्या इससे तुम दोनों को सन्तुष्टि न होगी!

जमना० : नहीं, कुछ भी नहीं, इसके अतिरिक्त उनका भी दिल और दिमाग कुछ आप ही सा है, वे गदाधरसिंह को कभी भी दुःख न देंगे।

इन्द्र० : मैं तो अजीब संकट में पड़ रहा हूँ, सभी जिद्दियों से वास्ता पड़ा है।

जमना० : नहीं-नहीं, यदि आपको संकट है तो मैं जिद न करूँगी अब इस विषय में कुछ न कहूँगी।

इसके बाद कई पल तक सन्नाटा रहा और तब पुनः इन्द्रदेव ने कहा-

इन्द्र० : अच्छा तुम दोनों जाओ और अपना हौसला निकालो परन्तु और हर तरह का बन्दोंबस्त करने के अतिरिक्त मैं अपना एक आदमी तुम्हारे साथ कर दूँगा।

जमना० : (प्रसन्नता के साथ) कौन मेरे साथ रहेगा?

इन्द्र० : उसे तुम नहीं पहिचानती और न पहिचान सकोगी।

जमना० : तो फिर किस तरह उस पर हम लोगो को विश्वास होगा?

इन्द्र० : जिस आदमी को मैं तुम दोनों के साथ करूँगा उस पर विश्वास करने की कोई जरूरत नहीं, मैं स्वयं उस आदमी को तुम्हारे सुपूर्द कर देता परन्तु इस समय वह यहाँ है नहीं और मैं घण्टे-दो घण्टे में किसी काम के लिए बाहर जाने वाला हूँ अस्तु मैं उसके घर पर से होता हुआ जाऊँगा और सब बातें उसे समझा दूँगा, प्रातःकाल जब घंटा-भर रात रहते ही तुम दोनों वहाँ से बाहर निकलोगी तो दरवाजे ही पर वह आदमी तुम्हें मिलेगा। ‘दत्त’ के नाम से वह तुमको परिचय देगा और दो अदद तिलिस्मी खंजर भी तुम दोनों को देगा जिसका गुण वह स्वयं तुम्हें बतायेगा। उस आदमी को अपने साथ ले लेना और उसकी राय के खिलाफ कभी कोई काम मत करना!

जमना० : (प्रसन्नता से हाथ जोड़ कर) बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। कुछ देर तक और उन लोगों में बातें होती रहीं। इसके बाद इन्द्रदेव की आज्ञानुसार से सब उठ कर अपने ठिकाने चली गईं और सफर का इन्तजाम करने लगीं।

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