भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

ग्यारहवाँ बयान


अब हम कुछ समय के लिए इन्द्रदेव की तिलिस्मी घाटी की तरफ चलते तथा अपने पाठकों को वहाँ की सैर कराते और दिखाते हैं कि वह वहाँ के रहने वाले इन्द्रदेव के नये मेहमान और रिश्तेदार लोग किस धुन में है और क्या कर रहे हैं।

पाठक महाशय भूले न होंगे कि उस तिलिस्मी घाटी में जमना, सरस्वती, इन्दुमति, प्रभाकरसिंह और दयाराम को हम लोग छोड़ आये हैं जो वहाँ बड़ी ही बेफिक्री और स्वतन्त्रता के साथ रह कर उस मलामत को सुख के साबुन से धो रहे हैं जोकि बहुत दिनों तक मुसीबत झेलने और दुश्मनों के सताने से उनके दिलों पर बैठ गई थी, परन्तु अब देखना चाहिए कि वे लोग वहाँ बैठे क्या कर रहे हैं, अपने सुख के आगे दुनिया को बिल्कुल ही भूल गए हैं या उस घाटी के बाहर की भी कुछ फिक्र रखते हैं?

इन सभों को उस घाटी में रहते बहुत दिन बीत गये और इस बीच में इन्द्रदेव की तालीम और उनकी सच्ची मदद ने उनका दिल ही मजबूत नहीं कर दिया बल्कि हिम्मत और उत्साह की दौलत से भी वे मालामाल हो रहे, ऐयारी का भरोसा हो जाने के अतिरिक्त इन्द्रदेव ने उन सभों की सूरत भी कुछ ऐसी हिकमत से बदल दी कि सूरत के लिहाज से कई दिनों तक साथ रहने पर भी कोई उनको पहिचान नहीं सकता और न कोई ऐयार ही उनकी सूरत धोकर उसके पक्के रंग की सफाई कर सकता है, अर्थात उनकी सूरत-शक्ल तमाम बदन की हालत में ऐसा फर्क डाल दिया था कि अब अगर वे चाहें तो बिना कुछ ऐयारी ढंग किये ही हर तरफ घूम-फिर सकें और पहिचाने जाने का कुछ खौफ न रहे।

यह सूरत तब्दीली कुछ कच्चे ढंग की न थी बल्कि पक्के तौर से थी जो कि मुद्दत तक बिना दवा की मदद के कायम रह सकती थी और जिससे खूबसूरती और सुघड़ता में भी किसी तरह का फर्क नहीं आता था। यद्यपि इन लोगों को इस घाटी से बाहर निकलने की कोई खास जरूरत न थी परन्तु प्रभाकरसिंह का एक बड़ा जरूरी काम रुका हुआ था जिसका पूरा होना भैयाराजा की मदद के भरोसे पर ही निर्भर था।

अर्थात बिना भैयाराजा की मदद के वह काम हो ही नहीं सकता था और भैयाराजा आजकल स्वयं संकट में पडे हुए थे। उन्हें स्वयं दूसरे की मदद की जरूरत थी, अतएव प्रभाकरसिंह को उस घाटी से बाहर निकालने की जरूरत थी और दयाराम भी दिलोजान से उनकी मदद किया चाहते थे।

पाठकों को याद होगा और वे भूले न होगे कि प्रभाकरसिंह को एक महात्मा बाबाजी ने इस बात का विश्वास दिलाया था कि ईश्वर की कृपा से तुम अपने माता-पिता से मिल जाओगे जिनके मिलने की प्रभाकरसिंह को कुछ भी आशा नहीं थी और जिन्हें वे पंचतत्व में मिल गया जानते थे। अस्तु इस समय प्रभाकरसिंह को यही लगी हुई है कि किसी तरह भैयाराजा के इष्ट की सिद्धि हो और उनकी मदद से उन्हें अपने माता-पिता के दर्शन हों। (१. देखिए भूतनाथ तीसरा भाग, आठवाँ बयान।)

सूर्य भगवान अस्त होने के लिए उतावली कर रहे हैं और अपनी लालिमा को अपने स्थान पर छोड़ जाने की इच्छा करते हैं परन्तु नहीं, वह लालिमा जो संध्या होने के कुछ पहिले ही उनकी सेवा में उपस्थिति हो जाती है उनका अनुकरण कर रही है और साथ नहीं छोड़ना चाहती इस समय इन्द्रदेव की उस तिलिस्मी घाटी की कुछ विचित्र ही शोभा हो रही है। पहाड़ी की चोटी पर लालिमा की एक सुनहरी लकीर इस प्रकार की खिंच गई है मानो सूर्य भगवान ने इस काले पहाड़ को सोने का यज्ञोपवीत पहिरा दिया है जिसे देख चारों तरफ के गुलबूटे बहुत ही प्रसन्न हो रहे हैं और यहाँ के रहने वाले जमना, सरस्वती, इन्दुमति, दयाराम और प्रभाकरसिंह भी एक साफ-सुथरे स्थान पर बैठे उस अपूर्व शोभा को देख रहे हैं तथा कुछ बातें करते जाते हैं, बाते सुनने लायक हैं और इनसे कई भेदों का पता लग जायगा।

प्रभा० :भैयाराजा मुझे विश्वास दिलाते हैं कि ‘तुम अपने माता-पिता से अवश्य मिलोगे, मैं अपने काम से निश्चिन्त होकर उनका पता लगा दूँगा जोकि निःसन्देह दारोगा के कब्जे में हैं।’’

दया० : कोई बात मालूम हुई होती तभी तो ऐसा कहते हैं, मुझे विश्वास नहीं होता कि वे किसी तरह पर झूठ बोल कर तुम्हारा दिल बहलावेंगे, वे ऐसे आदमी नहीं।

प्रभा० : बेशक मेरा भी यही खयाल है, अस्तु किसी तरह उनकी स्त्री का पता लग जाय और वह दारोगा के कब्जे से निकाल ली जाय तब भैयाराजा का दिल ठिकाने हो और वे हमारे लिए कुछ उद्योग करें।

दया० : आशा है कि यह काम बहुत जल्द हो जायगा। काम तो परसों ही हो गया होता मगर कम्बख्त भूतनाथ ने हम लोगों से चिढ़ कर और दारोगा से मिल कर सब मेहनत बर्बाद कर दी और भैयाराजा के काम में बाधक बन बैठा, खैर कोई चिन्ता नहीं अबकी दफे (अपनी छाती ठोंक कर) मेघराज बिना कोई काम किए कदापि घर न आवेगा। कल सवेरे तुम भी तैयार होकर मेरे साथ चलो और देखो तो सही कि मैं क्या करता हूँ!

प्रभा० : बेशक मैं तुम्हारे साथ चलूँगा, भैयाराजा बड़ी उत्कंठा के साथ हम लोगों का इन्तजार करेंगे। भूतनाथ के इस तरह पर फिसल जाने का उन्हें बड़ा ही दुःख है, इसके अतिरिक्त आशा है कि उनके दोस्त नन्दराम ने दारोगा के किसी आदमी को जरूर गिरफ्तार कर लिया होगा और स्वयं उसकी सूरत बन कर कोई काम करते होंगे।

दया० : आशा तो मुझे भी ऐसी ही है क्योंकि उनकी मदद पूरे तौर पर कर दी गई थी।

प्रभा० : इसके अतिरिक्त अब तो आपको उस तिलिस्म के अन्दर घूमने की ताकत भी हो गई है जिसमें भैयाराजा ने मेरी मदद की थी, अतएव आप वहाँ के कई स्थानों में घूमकर दारोगा के कैदियों को तलाश कर सकते हैं।

दया० : बेशक तलाश कर सकता हूँ मगर दारोगा ऐसा उल्लू नहीं है जो अपने कैदियों को उस जगह में रक्खे जो तिलिस्म का बाहरी हिस्सा है और जहाँ हमारे-तुम्हारे ऐसे बहुत-से आदमी जा-आ सकते हैं। उसने अपने कैदियों के लिए जरूर कोई खास जगह मुकर्रर की होगी और इसका सबूत इससे बढ़ कर और क्या होगा कि मुझ ऐसे कैदी को भी उसने तिलिस्म में नहीं पहुँचाया और न निश्चिन्ती से कुछ दिन तक एक जगह रहने दिया, बराबर स्थान बदलता ही रहा, फिर भी जो कुछ हो मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अबकी बिना कोई काम निकाले कभी घर लौट कर न आऊँगा।

प्रभा० : ईश्वर तुम्हारी मदद करे। इन्द्रदेवजी ने तुम्हें सब लायक बना दिया और तुम जो चाहे कर सकते हो। जिस समय तुम मेघराज की सूरत में सज कर और तन कर खड़े हो जाते हो उस समय तुम्हारे ऊपर ऐसा रोआब छा जाता है कि यकायक दुश्मन निगाह भर कर तुम्हारी तरफ देख नहीं सकता। उस दिन तुम्हें देख कर भूतनाथ कैसा चक्कर में आया!

दया० : निःसन्देह मेरे चाचा (इन्द्रदेव) की मुझ पर बड़ी कृपा है और उनकी बदौलत आज मैं अपने दुश्मनों से अच्छी तरह बदला लेने लायक हो गया हूँ। परन्तु सब कुछ कर सकने पर भी कोई काम ऐसा न करूँगा जिसमें उनके बँधे हुए मार्ग में किसी तरह का काँटा पैदा हो। हर तरह से अपने को और चाचाजी के प्रण को बचाता हुआ मैं तुम्हारा और भैयाराजा का काम करूँगा, भैयाराजा के कथन पर मुझे भी विश्वास होता है। अब जो मैं अपने कैद के जमाने को याद करता हुआ अपने साथी कैदियों की अवस्था सोचता हूँ तो निश्चय होता है कि मेरे साथ तुम्हारे माता-पिता भी अवश्य कम्बख्त दारोगा के यहाँ कैद थे।

प्रभा० :(आश्चर्य और उत्कण्ठा के साथ) क्या तुमने अपने साथ और भी किसी कैदी को देखा था जिस पर कि आज इस तरह का शक तुम्हें होता है?

दया० : हाँ, बेशक देखा था। अफसोस है कि मैं तुम्हारे माता-पिता को नहीं पहिचानता था और न ही वे मुझे पहिचान सके, नहीं तो मैं उनके विषय में बहुत कुछ तुमसे कहता।

प्रभा० : तथापि उन कैदियों का हुलिया अथवा शिख-नख यदि कुछ बयान करोगे तो मैं उस पर गौर करूँगा।

दया० : मेरे साथ ही साथ दारोगा के यहाँ चार कैदी और थे जिनमें एक स्त्री और तीन मर्द थे। उन मर्दों में एक का चेहरा वृद्धावस्था होने पर भी बहुत ही सुन्दर और गम्भीर तथा रोबीला था। कैद की सख्तियाँ सहने पर भी उसकी हिम्मत ने उसका साथ नहीं छोड़ा था और जब कभी दारोगा का सामना होता तो वह उसे तुच्छ समझता था और उसकी धमकियों से उसका दिल नहीं टूटता था। मुद्दत तक अंधेरे कैदखाने में बन्द रहने के कारण पीला पड़ गया था।

लम्बा कद और बदन की हड्डियाँ मजबूत तथा मोटी मालूम पड़ती थीं, बदन के लिहाज से सर उसका बहुत बड़ा था और बाल बारीक और धुँघराले थे। यद्यपि कैद की अवस्था में हजामत न बनने के कारण उसके बाल बहुत बढ़ गये थे परन्तु उनमें ऐंठन इतनी ज्यादे थी कि कभी भी कन्धे से नीचे लटकते हुए दिखाई न पड़ें। बातचीत के समय वनिस्बत ऊपर के, निचले दाँत ज्यादे दिखाई देते थे और कुछ रुकता और हकलाता भी था। दाहिनी कनपटी में एक जख्म का निशान था जिसके बारे में उसने कहा था कि किसी समय में नेजे की चोट लगी है। ‘हर हर’ शब्द का उच्चारण वह बहुत किया करता था और कभी-कभी यह भी कहता था कि ‘हाय मन्नो पर न-मालूम क्या गुजरी होगी’!

कई दफे पूछने पर भी उसने अपना परिचय न दिया और न यही बताया कि मन्नो उसका कौन था। यद्यपि हम कैदी लोग अलग रक्खे गये थे मगर एक दफे चार-पाँच महीने के लिए हम लोगों को एक साथ रहना पड़ा था इसीलिए उसके विषय में आज मैं इतना कह सका। अब बताओ कि उस कैदी के विषय में तुम क्या खयाल करते हो?

दयाराम की बातें सुनते-सुनते प्रभाकरसिंह का जी उमड़ आया और उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। जब दयाराम की बात खतम हुई तब आखिरी जुमले के जवाब में प्रभाकरसिंह ने रूमाल से आँसू पोंछ कर कहा-

प्रभाकर : निःसन्देह वे मेरे पिता ही थे, कनपटी का दाग और ‘मन्नो’ शब्द का उच्चारण किसी तरह का शक रहने नहीं देता। उनका मन्नो नामी कम्बख्त बेटा मैं ही हूँ और मुझको वे हद से ज्यादे प्यार करते थे। हाय, क्या मैं उनका दर्शन पा सकता हूँ! मैं उन्हें मरा हुआ समझता था इसलिए निश्चिन्त था, बेफिक्र था, मगर अब इस समय मेरे दिल की क्या अवस्था हो रही है सो मेरे प्यारे भाई दयाराम तुम खुद समझ सकते हो मैं क्या कहूँ।

दया० : (बेचैनी से) क्या तुम्हें विश्वास होता है कि वे ही तुम्हारे पिता होंगे?

प्रभा० : इसमें किसी तरह का भी सन्देह मत समझो। अफसोस इन्द्रदेव जी को ये बातें मालूम न हुईं! अगर हो जाती तो कदाचित वे तुम्हारे साथ ही साथ उनको भी कैद से छुड़ा ही लाते।

दया० : बेशक उन्हें ये बातें मालूम न होंगी मगर साथ ही इसके यह भी तो है कि इधर साल-भर से वे मुझसे अलग हो रहे हैं अर्थात दारोगा ने उन्हें किसी दूसरी जगह ले जाकर रख दिया है तथा और कैदी लोग भी वहाँ नहीं थे जहाँ मैं था!

प्रभा० : बेशक इन्द्रदेवजी को भी मेरी तरह विश्वास था कि उनका देहान्त हो चुका है और भैयाराजा की बातों पर भी मुझे पूरा विश्वास न था जो उनसे कुछ कहता। इस समय मुझसे और तुमसे जो कुछ बातें हुई हैं उन्हें जब इन्द्रदेव जी सुनेंगे तो उन्हें भी विश्वास हो जाएगा कि मेरे माता-पिता अभी तक जीते हैं और दारोगा की कैद में हैं।

दया० : बेशक उन्हें भी विश्वास हो जाएगा और वे मदद करने के लिए तैयार हो जायेंगे। मेरा खयाल है कि भैयाराजा को पहिले से इस बात की खबर नहीं थी, इन्हीं दिनों में उन्हें भी इस मामले की कुछ आहट लगी है।

प्रभा० : मैं भी ऐसा समझता हूँ।

दया० : अच्छा तो अब रात–भर में हम लोगों को हर तरह से तैयार हो जाना चाहिए, प्रातःकाल यहाँ से हम दोनों आदमी श्री गणेश जी का ध्यान करके विदा होंगे और चाचाजी से सब हाल कह कर।। देखो-देखो, चाचाजी तो स्वयं यहाँ चले आ रहे हैं, लक्षण अच्छे मालूम पड़ते हैं, हमारा काम जरूर सिद्ध होगा! इन्द्रदेव को आते हुए देख सब कोई उठ खड़े हुए और इस्तकबाल के लिये उस तरफ बढ़े जिधर से वे आ रहे थे। पास पहुँचने पर सभों ने उन्हें दण्ड-प्रणाम किया और बातचीत करते हुए सब कोई धीरे-धीरे बँगले की तरफ रवाना हुए।

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