भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

नौवाँ बयान


दारोगा को तो भूतनाथ ने ठीक कर लिया और उसे अच्छी तरह धोखे में डाल कर उसका दोस्त भी बन बैठा। मगर जब वह दारोगा से बिदा होकर नागर के मकान से बाहर निकला तो उसका ध्यान रामेश्वरचन्द्र वाली दूकान की तरफ गया और वह सोचने लगा कि वहाँ मैं हरनामसिंह को कैद कर आया हूँ और अपने को उस पर प्रकट भी कर चुका हूँ, वह इस बात को जान चुका है कि उसे गदाधरसिंह ने कैद किया है, ऐसी अवस्था में मुझे उचित है कि अगर मैं अपने को दारोगा का दोस्त बनाया चाहता हूँ तो हरनामसिंह से भी दोस्ती का ढंग रचूँ और उसके दिल से इस खयाल को दूर कर दूँ कि उसे कैद करने वाला भूतनाथ है। अगर ऐसा न हुआ तो जब कभी हरनामसिंह छूटेगा और दारोगा के पास पहुँचेगा तो मेरी चालबाजी प्रकट हो जाएगी और दारोगा मुझे झूठा और दगाबाज समझ कर मुझसे खटक जायगा, अस्तु ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि हरनामसिंह के दिल में मेरी तरफ से दुश्मनी का खयाल न रहे और उसे विश्वास हो जाय कि मेरा कैद करने वाला भूतनाथ नहीं बल्कि कोई दूसरा ही है।

रास्ते में चलते-ही-चलते भूतनाथ ने इन बातों पर विचार किया और कोई तरकीब सूझ जाने पर पीछे की तरफ लौट कर पुनः दारोगा से मुलाकात करने के लिए नागर के मकान में घुस गया।

आधे घण्टे के बाद जब भूतनाथ अपनी असली सूरत में नागर के मकान के बाहर निकला तो तेजी के साथ चल कर सीधा रामेश्वरचन्द्र वाली ऐयारी की दूकान में पहुँचा।

अबकी दफे भूतनाथ ने रामेश्वरचन्द्र से मिलने के लिए एक परिचय का शब्द बना लिया था जिसमें किसी तरह का धोखा न हो, अस्तु सामना होने पर भूतनाथ रामेश्वरचन्द्र को एकान्त में ले गया और परिचय देने तथा लेने के बाद जो कुछ घटना हुई थी सब बयान करके अन्त में बोला, ‘‘इस समय मैं इसीलिये यहाँ आया हूँ कि हरनामसिंह को कैद से छुड़ा कर अपना दोस्त बनाऊँ।

यद्यपि मैं अपने हाथ से उसे कैद कर चुका हूँ परन्तु उसे धोखा देने के लिये अच्छा सामान भी अपने साथ लाया हूँ। तुम जल्द ताला खोल कर मुझे उसके पास तहखाने में ले चलो। (कुछ सोच कर) नहीं, मैं अकेला ही उसके पास जाऊँगा।’’

इतना कह कर भूतनाथ ने अपना जो कुछ इरादा था और भविष्य में जो कुछ किया चाहता था पुनः रामेश्वरचन्द्र से बयान किया और इसके बाद तहखाने का ताला खोल कर हरनामसिंह के पास पहुँचा और बोला-

भूत० : वाह-वाह हरनामसिंह, तुम इतने बड़े ऐयार होकर इस तरह कैदखाने की हवा खा रहे हो!

हर० : यह सब तुम्हारी ही बदौलत है! यद्यपि मैं ऐयार हूँ परन्तु तुम्हारा मुकाबला किसी तरह भी नहीं कर सकता।

भूत० : भला तुम इस विषय में मुझे क्यों बदनाम करते हो? यद्यपि मेरे शागिर्द को धोखा देकर भैयाराजा के साथ-ही-साथ उसे भी कैद कर लिया था, परन्तु मैंने तुमसे उसका बदला कुछ भी नहीं लिया बल्कि इस समय तुम्हें इस कैद से छु़ड़ाने के लिये आया हूँ।

हर० : यदि तुम वास्तव में गदाधरसिंह हो तो मैंने जो कुछ कहा है वह निःसन्देह, सच है। परन्तु तुम्हारी बातों में मुझे आश्चर्य होता है। तुम खुद अपने हाथ से मुझे कैद कर गये हो और अब कहते हो कि मैं तुम्हें छु़ड़ाने के लिये आया हूँ!

भूत० : बेशक तुम्हें आश्चर्य होता होगा, परन्तु मैं तुम्हारे इस आश्चर्य को अभी-अभी दूर किये देता हूँ। मेरी बातें सुनने से तुम्हें अच्छी तरह सन्तोष हो जायेगा। मैं कई दिनों के बाद इस दूकान में आया हूँ, रामेश्वरचन्द्र से मुलाकात होने पर मुझे सब हाल मालूम हो गया। भैयाराजा और रामेश्वरचन्द्र को कैद से छुड़ाने और तुम्हें यहाँ कैद करने वाला वास्तव में भैयाराजा का दोस्त दलीपशाह था जिसने अपने को गदाधरसिंह बना कर तुम्हें धोखे में डाला और अपने मित्र भैयाराजा को छुड़ा कर ले गया। मेरे शागिर्द को इस कैद से छुड़ा कर उसने बेशक मुझ पर भी अहसान किया परन्तु तुम्हारे ऊपर मेरी शिकायत शुरू से बनी रही है। इस समय मैं दारोगा साहब का काम कर रहा हूँ इसलिए तुम्हारे साथ भी दोस्ताना ही बर्ताव करना पड़ता है। लो पहिले तुम इस चीठी को पढ़ो।

इतना कह कर भूतनाथ ने हरनामसिंह के हाथ-पैर खोल दिये और दारोगा साहब की लिखी हुई चीठी उसके हाथ में दी जिसे उसने चिराग की रोशनी के सामने ले जाकर अच्छी तरह पढ़ा।

हरनाम० : इस चीठी के पढ़ने से मुझे विश्वास हो गया कि तुम्हारा कहना ठीक है। निःसन्देह दारोगा साहब ने बुरा धोखा खाया, परन्तु यदि तुम बराबर उनका साथ दोगे तो उन पर किसी तरह की आँच न आ सकेगी और यह तुम्हारे तथा उनके दोनों ही के लिये सौभाग्य की बात होगी।

भूत० : बेशक मैं उनकी मदद करूँगा और बराबर उनका दोस्त बनकर रहूँगा इस समय जैपालसिंह का पता लगाना बहुत जरूरी है, अस्तु अब तुम जल्द इस तहखाने के बाहर निकलो और मेरे साथ जैपाल की खोज में चलो। मुझे जैपालसिंह का कुछ पता लग भी चुका है अस्तु रास्ते में सब बातें होती रहेंगी और उधर जो कुछ घटना हो चुकी है वह सब मैं तुमसे बयान करूँगा।

हर० : मैं हर तरह से तुम्हारा साथ देने के लिये तैयार हूँ।

भूत० : अच्छा तो आओ, मेरे पीछे आओ।

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