भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

आठवाँ बयान


भूतनाथ, क्या तू भूल कर नेक रास्ते पर चला आया था? क्या तू इस साफ और सुथरी राह को छोड़ कर पुनः उस कंटीली पगडण्डी पर चला चाहता है? अगर तू वास्तव में ऐसा करता है तो निःसन्देह बदकिस्मत है। अबकी दफे तू चूकेगा तो कहीं का भी न रहेगा, दुनिया में किसी को मुँह न दिखला सकेगा और जीते-जी कब्र के अन्दर धकेल दिया जाएगा। खैर देखा चाहिये तेरी किस्मत में क्या है और तू क्या करता है!

भूतनाथ का वहाँ से चला जाना भैयाराजा, मेघराज और उसके साथी को बहुत गढ़ाया और ये तीनों आदमी बड़े तरद्दुद में पड़ गए, तथापि मेघराज ने हिम्मत नहीं हारी और उसने अपने साथी तथा भैयाराजा को भी अपनी उमंग-भरी बातों से उत्साहित किया पर वे लोग अब जो कुछ करेंगे पीछे जायगा। हम इस समय भूतनाथ के साथ चलते और देखते हैं कि वह क्या करता है!

दिन लगभग तीन पहर के ढल चुका था और दारोगा साहब नागर के यहाँ बैठे हुए जैपाल के आने का इन्तजार कर रहे थे। ज्यों-ज्यों जैपाल के आने में देर होती थी त्यों-त्यों उनका तरद्दुद बढ़ता जाता था।

उन्होंने नागर के आदमियों को कई दफे बाहर भेजा कि आगे बढ़ कर देखे कि जैपाल आता है या नहीं मगर किसी ने भी लौट कर कोई दिल खुश करने वाला जवाब न दिया, हाँ आखिरी मर्तबे जो आदमी भेजा गया उसने लौट कर एक चीठी दारोगा साहब के हाथ में जरूर दी जिसे दारोगा ने उछलते हुए कलेजे के साथ लिया और पढ़ने लगा-

‘‘आप यहाँ चुपचाप बैठे हुए किसका इन्तजार कर रहे हैं? रात को आपका दुश्मन आपके दोस्त जैपाल को आपके पास ही से गिरफ्तार करके ले गया और आपको कुछ खबर तक न हुई!

सुबह को जिस जैपाल को आपने कई काम सुपुर्द करके बाहर भेजा था वह वास्तव में आपका जैपाल नहीं बल्कि दुश्मन था, बस इसी से समझ जाइए कि आपने कितना बड़ा धोखा खाया और अब आपका काम किस तरह चौपट हुआ चाहता है!

-आपका

(अगर आप माने तो) दोस्त, गदाधरसिंह।’’

इस चीठी को पढ़ते ही दारोगा साहब के तो होश उड़ गए। घबराहट के मारे उनके सर में चक्कर आने लगा। उसकी ऐसी अवस्था देख कर नागर ने, जो उनके पास ही बैठी हुई थी पूछा, ‘‘कहिए क्या मामला है, यह चीठी किसकी है?

इसके जवाब में दारोगा ने हाथ बढ़ा कर वह चीठी नागर को दे दी और बड़ी बेचैनी से उसका मुँह देखने लगा।

नागर० : (चीठी पढ़ कर) बात तो ठीक मालूम होती है!

दारोगा० : अब मैं सुबह के मामले पर ध्यान देता हूँ तो मुझे भी यही निश्चय होता है कि गदाधरसिंह का लिखना ठीक है। (उस आदमी की तरफ देख कर जो चीठी लाया था) जिसने यह चीठी तुम्हें दी वह है या गया?

आदमी० : मैं समझता हूँ कि वह अभी तक बाहर खड़ा होगा।

दारोगा० : तो उसे बहुत जल्द मेरे पास बुलाओ।

‘‘जो आज्ञा!’’ कह कर आदमी बाहर चला गया और थोड़ी ही देर के बाद गदाधरसिंह को साथ लिए हुए पुनः उस कमरे में दाखिल हुआ।

दारोगा साहब ने उठ कर और आगे बढ़ कर बड़ी खातिर के साथ गदाधरसिंह को लिया और अपने पास बैठाने बाद नौकर को बिदा करके इस तरह बातचीत करने लगे-

गदाधर० : कहिए मिजाज तो अच्छा है?

दारोगा० : मिजाज क्या खाक अच्छा होगा! आपकी बदौलत तरह-तरह की तकलीफे उठा रहा हूँ।

गदाधर० : (आश्चर्य की सूरत बना कर) मेरी बदौलत! मैंने आपको क्या नुकसान पहुँचाया है!

दारोगा० : हाँ-हाँ बेशक आपकी बदौलत! जितना मैं आपको मानता हूँ उसका चौथाई भी अगर आप मेरी खातिर करते तो मेरे बराबर दुनिया में कोई भी सुखी नहीं दिखाई देता और आपको भी किसी बात की कमी न होती। जब कभी आप कहते है, मैं आपकी मदद करता हूँ और भविष्य में भी मदद करने के लिए तैयार रहता हूँ, मगर आपको मेरा कुछ खयाल नहीं होता।

गदाधर० : यह आप कैसे कहते हैं? अगर आपका मुझे खयाल न होता तो इस समय मैं यहाँ आकर आपको सचेत क्यों करता! और अगर मैं सचेत न करता तो क्या आप बेतरह मुसीबत में गिरफ्तार न हो जाते!

दारोगा० : इसको मैं मानता हूँ और आपकी इस कृपा का धन्यवाद देता हूँ इसी से तो इतना कहने का मुझे हौसला भी हुआ, नहीं तो यदि मैं आपको बिल्कुल बेगाना समझता तो उलाहना ही क्यों देता? मगर फिर भी मुझे कहने के लिए बहुत जगह है, अभी उस दिन की बात है कि भैयाराजा के साथ आपने मुझ पर और मेरे आदमियों पर हमला किया था और मेरी दुर्दशा में शरीक हुए थे।

गदाधर० : यह आपका भ्रम है, आपकी शिकायत तब ठीक होती जब आप अपनी असली सूरत में होते, मैंने दारोगा साहब समझ के पीछा नहीं किया था। बल्कि भैयाराजा का दुश्मन समझ कर पीछा किया था। फिर भी जब उस घाटी में आपकी सूरत दिखाई पड़ी तब मैंने आपकी जान बचाने की चेष्टा की नहीं तो भैयाराजा उस समय आपको जान से ही मार डालने के लिए तैयार थे, मैंने बड़ी कोशिश से आपको बचाया।

दारोगा० : अगर आपका कहना ठीक है तो अब भी मैं अपने को धन्य मानूँगा।

गदाधर० : बेशक यही बात है, हाँ, इस बात का मैं दोषी जरूर हूँ कि भैयाराजा के विरूद्ध आपकी मदद न कर सका और न कर सकूँगा क्योंकि उन्हें मित्रभाव से देखने के लिए प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।

दारोगा० : (कुछ चिन्ता करके) यह बात तो ठीक नहीं है, मैं आपसे बहुत बड़ी उम्मीद रखता हूँ और आपके लिए सब कुछ करने को तैयार हूँ!

गदाधर० : माफ कीजिएगा, मेरी तरफ से आपका दिल भी स्वच्छ नहीं है, यदि स्वच्छ होता तो आप दयाराम वाला भेद मुझसे कदापि न छिपाते।

दारोगा० : छिःछिः! आपके दिल से अभी तक यह भ्रम दूर नहीं होता! न-मालूम किस कम्बख्त ने आपसे कह दिया कि दयाराम अभी तक जीते हैं और मेरी कैद में हैं! इस काम के कर्ता-धर्ता तुम खुद होकर फिर ऐसी बात कहते हो!

गदा० : स्वयम् ध्यानसिंह ने यह बात मुझसे कही है और यह भी समझा दिया है कि दयाराम के विषय में मैं बिल्कुल ही निर्दोष हूँ।

दारोगा० : वह झक मारता है जो ऐसा कहता है, आपके और हमारे बीच में लड़ाई लगा कर फायदा उठाया चाहता है!

भूत० : शायद ऐसा ही हो, खैर देखा जायगा। अच्छा अब मैं अपना काम कर चुका, दुश्मनों की कार्रवाई से आपको सचेत कर दिया, अब जाता हूँ।

दारोगा० : वाह-वाह, अभी तो मैंने इस बारे मे आपसे कुछ पूछा ही नहीं।

भूत० :(मुस्कराते हुए) अच्छा पूछिये। क्या पूछते हैं?

दारोगा० : पहिले तो यह बताइये कि मेरा वह दुश्मन कौन है जिसने मेरे साथ ऐसी धूर्तता की, और जैपालसिंह का क्या हाल है, दुश्मनों के हाथ से किस तरह उसकी जान बचेगी, और इस मामले में आप मेरी क्या मदद कर सकते हैं?

भूत० : मैं आपके उस दुश्मन को अभी तक पहिचान न सका क्योंकि वह सैदव ही अपनी सूरत बदले रहता है। हाँ भैयाराजा और इन्द्रदेव वगैरह उसे जरूर जानते होंगे मगर उसका असल भेद वे लोग मुझसे कुछ भी नहीं कहते। मेघराज के नाम से वे लोग उसे सम्बोधन करते हैं बस इतना ही मुझे मालूम है। बड़ी मुश्किल से मैंने उसके स्थान का पता लगाया है मगर उस तक पहुँचना अथवा उसको धोखा देना बड़ा ही कठिन है।

दारोगा० : तो इस समय जैपालसिंह भी उसी के कब्जे में होंगे?

भूत० : जरूर! जैपालसिंह को ले जाने के समय वह अपने कई ऐयारों को लेकर खुद यहाँ आया हुआ था बल्कि अब भी वह इसी जगह इर्द-गिर्द घूम रहा है और आपके मकान में घुसा तथा आपको फँसाया चाहता है।

दारोगा० : (कुछ सोच कर) तो आपको इस मामले में जरूर मेरी मदद करनी पड़ेगी, मैं आपका बहुत कुछ भरोसा रखता हूँ।

भूत० : बेशक मैं आपकी मदद करूँगा, मगर..।

दारोगा० : मगर की कसर अभी तक लगी हुई है!

भूत० : खैर, मैं आपसे कुछ देर के लिए एकान्त में बातें किया चाहता हूँ, इसके बाद (नागर की तरफ देख कर) इनसे भी दो-चार बातें एकान्त में करूँगा।

दारोगा० : (मुस्कुराता हुआ) इनसे तो आप सदैव ही एकान्त में बातें किया करते हैं और करेंगे, इन पर आपका हक है, मगर मैं अपने लिए अभी एकान्त कराए देता हूँ।

इतना कह कर दारोगा ने हँसते हुए नागर की तरफ देखा, नागर उठ खड़ी हुई और यह करती हुई कमरे के बाहर चली गई कि ‘ऐसी मुसीबत में भी दिल्लगी से बाज नहीं आते!

करीब आधे घण्टे तक भूतनाथ और दारोगा में इस मामले की बातचीत होती रही। दोनों ने तरह-तरह के वादे किये, दोनों ने तरह-तरह की कसमे खाईं, और अन्त में दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा कर अपनी-अपनी मुहब्बत दिखलाई, इसके बाद भूतनाथ दारोगा से बिदा होकर कमरे के बाहर निकला जहाँ नागर चहलकदमी करती हुई उसके आने का इन्तजार कर रही थी, नागर ने भूतनाथ की कलाई पकड़ ली और अठखेलियों के साथ चलती हुई उसे एक दूसरे कमरे में ले गई।

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