भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

तीसरा बयान


रात का समय है और दारोगा अपने खासबाग १ वाले मकान में एकान्त कमरे में बैठा हुआ जैपाल से बातें कर रहा है। (१. खासबाग में दारोगा के लिए एक मकान मुकर्रर था और वह भी खासबाग के तिलिस्म से मिला हुआ था।)

दारोगा: न-मालूम क्या समझ कर भैयाराजा ने मेरी जान छोड़ दी नहीं तो मैं बड़े ही बेमौके जा फँसा था! कार्रवाई तो मैंने बहुत अच्छी की थी मगर इस बात की खबर न थी कि भैयाराजा के पास तिलिस्मी तलवार मौजूद है।

जैपाल० : खैर, जो कुछ होना था सो हो गया अब आपको बहुत सावधानी के साथ काम करना चाहिए, ताज्जुब नहीं कि भैयाराजा अब खुद राजा साहब के पास आवें और आपका मुकाबला करें। यद्यपि मेरा तो खयाल यहीं है कि अब राजा साहब उनकी बातों पर कदापि विश्वास न करेंगे क्योंकि आपने उनको खूब ही दुरूस्त कर रक्खा है।

दारोगा : बेशक अब राजा साहब उनका पक्ष न करेंगे, हाँ, गोपालसिंह का बन्दोबस्त करना जरूरी है।

जैपाल० : जबकि आप सोचते हैं कि भैयाराजा और उनकी स्त्री को मार डालने के बाद रानी साहबा और राजा साहब को भी मार डालोगे तो गोपालसिंह को छोड़ने की क्या जरूरत है? उन्हें भी निपटा कर निष्कण्टक राज्य कीजिए।

दारोगा: यह सोचना तुम्हारी भूल है। हमारी कमेटी के बड़े-बड़े रईस लोग जो अभी तक मेरी इज्जत करते हैं वे एकदम से मेरे दुश्मन हो जायेंगे और समझेंगे कि दारोगा ने राजा बनने की नीयत से यह कमेटी रची थी। वे मुझे कदापि राजा न बनने देगें और तमाम फौज भी मेरी दुश्मन बन जायेगी।

ऐसी अवस्था में ताज्जुब नहीं कि कोई दूसरा राजा आकर जमानिया में दखल जमा ले और अगर ऐसा हुआ तो मैं बड़ी दुर्दशा से मारा जाऊँगा, मुझे राजा बनने में सुख नहीं है, मैं नाममात्र के लिए गोपालसिंह को राजा बनाऊँगा और खुद राज्य करूँगा। जब गोपालसिंह की शादी हेलासिंह की लड़की से हो जाएगी तब बेशक गोपालसिंह मारे जाएँ तो कोई हर्ज नहीं। उस समय उनकी स्त्री को रानी बनाऊँगा और उसे ऐयाशी पर उतारू करके आप आनन्द करूँगा। फिर मेरा मुकाबला करने वाला कोई भी न होगा।

जैपाल० : बात तो आपने बड़े दूर की सोची! मेरा खयाल इन सब बारीकियों की तरफ नहीं गया था। बेशक आप बुद्धि के तेज हैं और आप नीति को खूब समझते हैं।

दारोगा : अब तो गोपालसिंह को खुशामद से या जिस तरह बनेगा अपने ऊपर प्रसन्न करूँगा और तब देखूँगा कि किस्मत क्या दिखाती है। सबसे बड़ा काम तो यह है कि उनकी शादी हेलासिंह की लड़की से हो जाए।

जैपाल० : मगर दयाराम वाला खुटका मेरे दिल को बहुत ही बेचैन किये हुए है। न-मालूम उसे कौन छुड़ा ले गया और अब वह कहाँ है। यह और भी ताज्जुब है कि वह अभी तक प्रकट नहीं हुआ। जब वह प्रकट होगा तो मुझे बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा और उस समय इन्द्रदेव भी मेरा दुश्मन बन जायगा।

जैपाल० : बेशक दयाराम का गायब हो जाना बहुत ही बुरा हुआ। मेरा तो खयाल है कि खुद गदाधरसिंह उसे छुड़ा ले गया। जमना, सरस्वती, इन्दुमति और प्रभाकरसिंह का भी कुछ हाल मालूम नहीं हुआ, वे सब भी तो आपकी फिक्र में होंगे।

दारोगा : बेशक उनके लिए भी मैं तरद्दु में हूँ, हाँ, अगर गदाधरसिंह ने मेरा साथ दिया तो मैं उन सभी की तरफ से शायद बेफिक्र हो जाऊँगा।

जैपाल० : गदाधरसिंह का तो खुद ही उन लोगों की बदौलत नाक में दम हो रहा है।

दारोगा : सही है, मगर फिर भी जब वह उन लोगों की फिक्र में है तो कुछ करके ही छोड़ेगा।

जैपाल० : अगर वह ऐसा करे भी तो उसमें आपकी क्या भलाई हो सकती है जबकि वह स्वयं आपसे रंज है? इधर वाला मामला बहुत ही बुरा हो गया, भैयाराजा के साथ-ही-साथ आप गदाधरसिंह पर भी वार कर बैठे सो अच्छा नहीं किया।

दारोगा: अगर मेरा वार खाली न जाता और भैयाराजा तथा गदाधरसिंह मारे जाते तो तुम ऐसा न कहते बल्कि मेरी तारीफ करते, अब जब मामला बिगड़ गया है तो जो चाहे कहो, फिर भी मुझे इस बात से दिलजमई है कि गदाधरसिंह लालची है, दौलत के आगे वह धर्म, ईमान और इज्जत वगैरह कुछ नहीं समझता।

जैपाल० : गदाधरसिंह को कब्जे में करने के लिए यह तरकीब बहुत अच्छी होगी कि आप उसके बागी ऐयारों और शार्गिदों को अपना पक्षपाती बनावें।

दारोगा : बात बहुत अच्छी है मगर मैं उन लोगों को खोजूँ क्योंकि! उन सभों का मिलना ही तो बड़ा कठिन है।

जैपाल० : उनमें से एक आदमी मुझे मिला था और मैंने उससे आपके विषय में बातचीत भी की, अगर आप कहें तो मैं इस बारे में उद्योग करूँ।

दारोगा : जरूर कोशिश करनी चाहिए, खर्च करने के लिए मैं हर तरह से तैयार हूँ। बात यह है कि या तो गदाधरसिंह हमारे कब्जे में आ जाय और या फिर दुनिया से उठा दिया जाय। (ऊँची साँस लेकर) अफसोस! दयाराम का हमारे कब्जे से निकल जाना बहुत बुरा हुआ, नहीं तो गदाधरसिंह मेरे तलवे चाटा करता और जो कुछ मैं कहता वह झख मार के करता। तुम कहते हो कि दयाराम को गदाधसिंह छुड़ा ले गया मगर मेरा दिल बात को कबूल नहीं करता। जब दयाराम के विषय मे बातचीत करने के लिए वह मेरे पास आया था उसके पहिले ही कोई मेरी सूरत बन कर दयाराम को छुड़ा ले गया था, जैसाकि भूतनाथ ने भी मुझसे कहा था। और मैंने भूतनाथ से बहाना किया था कि वह दूसरा ही कैदी था।

जैपाल० : हो सकता है, तो अगर गदाधरसिंह नहीं तो भैयाराजा का यह काम होगा क्योंकि व जमना और सरस्वती की दिलोजान से मदद कर रहे हैं।

दारोगा ‘सम्भव है कि भैयाराजा ही ने ऐसा किया हो। अफसोस यह कई दफे मेरे पंजे में आकर निकल गया है। अच्छा बकरे की मां कब तक खैर मनावेगी अबकी दफे तो भैयाराजा को तिलिस्मी तलवार ने बचा लिया, जख्म लगते ही मैंने पहिचान लिया कि फलानी तलवार होगी, मैं बहुत जल्द उसे महाराज से माँग लूँगा।

जैपाल० : आप तिलिस्म के दारोगा ठहरे, आपके पास तो जरूर ऐसी तलवार होनी चाहिए। बल्कि मेरे पास भी पास भी होनी चाहिए क्योंकि मैं आपका मित्र हूँ।

दारोगा : अच्छा अब मैं उस काम की फिक्र करता हूँ जिसके लिए तुमने राय दी थी। तुम जाकर अपना रथ तैयार कराओ और खुद हाँकते हुए खासबाग के पिछले दरवाजे की तरफ लाकर मेरा इन्तजार करो। ईश्वर चाहेगा तो आज ही मेरा वह काम हो जाएगा फिर दूसरे की फिक्र करूँगा।

जैपाल० : बहुत अच्छा मैं जाता हूँ।

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