भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

पन्द्रहवाँ बयान


भैयाराजा को अब जिस स्थान में भूतनाथ ले गया वह यद्यपि खंडहर कहा जाता था परन्तु दालान और तीन-चार कोठरियाँ ऐसी थीं कि जिनकी मजबूती में अभी तक किसी तरह का खलल नहीं आया था, तथा इस इमारत की चारदीवारी भी अभी तक अपनी आधी हैसियत के साथ मौजूद थी जिसमें लगा हुआ बिना दरवाजे का फाटक दिखाई दे रहा था।

भूतनाथ ने भैयाराजा को एक कोठरी के अन्दर ले जाकर लिटा दिया और शागिर्दों सहित स्वयम् बाहर वाले दालान में बैठ कर अपने अनूठे मामलों पर विचार करने लगा। कदाचित् उसने निश्चय कर लिया था कि जब आप-से-आप भैयाराजा की बेहोशी दूर होगी तभी उनसे बातचीत करेगा क्योंकि इस समय उनकी बेहोशी दूर करने के लिए उसने कोई कार्रवाई नहीं की।

हम ऊपर लिख आये हैं कि भैयाराजा की सूरत ऐयारी ढंग पर बदली हुई थी फिर भी भूतनाथ ने उन्हें अच्छी तरह पहिचान लिया था। यद्यपि बेहोश करके भूतनाथ ने उन पर कब्जा कर लिया है परन्तु उनके हाथ-पैर खुले ही छोड़ दिए हैं।

तमाम रात बीत जाने के बाद जब भैयाराजा की बेहोशी दूर हुई तो उन्होंने अपने को एक मामूली कोठरी में पड़े हुए पाया। चूँकि बेहोश होने के पहिले ही उन्हें मालूम हो चुका था कि भूतनाथ ने ही धोखा देकर उन्हें अपने कब्जे में किया है इसलिए इस समय बेहोशी दूर होने के साथ ही उन्हें वह बात याद आ गई और वह आश्चर्य के साथ इधर-उधर आँखें दौड़ा कर भूतनाथ को खोजने लगे। भूतनाथ यह देखते ही फौरन उनके सामने आकर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘शायद आप मुझे खोज रहा हैं?’’ हम यह यह लिखना भूल गये कि भूतनाथ ने उनके चेहरे पर से वह नवीन झिल्ली भी उतार ली थी।

भैया० : हाँ, बेशक ऐसा ही है, और सबसे पहिले मैं तुमसे यही पूछा चाहता हूँ कि तुमने मुझे कैद करके भी खुला क्यों छोड़ रक्खा है तथा मेरे साथ दुश्मनी पर क्यों कमर बाँधी है?

भूत० : खुला इसलिए छोड़ा है कि मुझे आपसे किसी तरह की दुश्मनी नहीं है और सिर्फ अपना एक छोटा-सा काम निकालने के लिए ही मैं आपको यहाँ ले आया हूँ।

भैया० : वह कौन-सा काम है जो मुझे सता कर तुम निकाल सकते हो?

भूत० : नहीं-नहीं, मैं आपको जरा भी सताना नहीं चाहता बल्कि सिर्फ इतना ही चाहता हूँ कि आप किसी एक ठिकाने बैठे रहें और मैं आपकी सूरत बन कर अपना काम निकाल लूँ।

भैया० : (कुछ सोच कर) खैर कम-से-कम यह तो मालूम होना चाहिए कि वह काम कौन-सा है?

भूत० : जमना, सरस्वती, इन्दुमति और प्रभाकरसिंह को इस दुनिया से उठा देना, यही एक काम है जिसके लिए मैं तरह-तरह की तकलीफें उठा रहा हूँ और मुझे दारोगा ऐसे कमीने आदमी की खुशामद करनी पड़ती है।

भैया० : दारोगा तुम्हारा दोस्त है, वह अपनी जान पर खेल कर तुम्हारी मदद करता है, उसी ने जमना, सरस्वती और इन्दुमति को तिलिस्म से निकाल कर तुम्हारे हवाले किया, उसी ने तुम्हारी इच्छानुसार सब कार्रवाइयाँ की, तुम्हारे ही सबब से मुझे मारने के लिए तैयार हो गया। फिर भी तुम उसे कमीना क्यों कहते हो?

भूत० : आपका कहना ठीक है मगर मेरे काम के लिए उसने आपको मारना नहीं चाहा था बल्कि अपनी भलाई के लिए ऐसा किया था, और जो आदमी अपने मालिक को मारने में संकोच न करे उसे कमीना नहीं तो और क्या कहा जाय?

भैया० : (मुस्करा कर) इस इल्जाम से तो तुम भी नहीं बच सकते, दयाराम के साथ जो कुछ सलूक तुमने किया सो तो जाहिर ही है और अब उनकी औरतों के साथ जो कुछ किया चाहते हो वह भी मालूम हो गया। बात यह है कि तुम और दारोगा दोनों एक ही मिट्टी के बने हुए हो, तुमसे बढ़ कर वह और उससे बढ़ कर तुम हो!

भैयाराजा की बातें सुन कर भूतनाथ लाजवाब तो हो गया मगर क्रोध से उसकी आँखें सुर्ख हो आईं। कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोला—

भूत० : आप इस वक्त हर तरह से मेरे कब्जे में होकर भी ऐसी कड़वी बातें कहते हैं कि मुझे ताज्जुब होता है।

भैया० : बात जो कुछ थी वह मैंने सच-सच कह दी, अब चाहे तुम्हें कड़वी मालूम पड़े या मीठी। खैर इन बातों से कोई मतलब नहीं, तुम और दारोगा जैसे हो उसे मैं खूब पहिचानता हूँ, अब जो कुछ तुम्हारे जी में आवे करो और मेरी सूरत बन कर जो कुछ काम निकाला चाहते हो निकालो, देखूँ तुम अपने काम में क्योंकर कृतकार्य होते हो!

भूत० : खैर जैसा होगा देखा जायगा, अगर आप सीधी तरह से तीन-चार दिन तक मेरे कब्जे में रहना पसन्द करेंगे तो आपको बड़ी स्वतन्त्रता के साथ रखूँगा, नहीं तो आपको हथकड़ी और बेड़ी उठानी पड़ेगी।

भैया० : जैसे तुम कहोगे मैं वैसा ही करूँगा, मगर यह तो बता दो कि मुझे कहाँ कैद करोगे, इसी मकान में या किसी और जगह?

भूत० : आज दिन-भर तो आपको इसी मकान में रहना पड़ेगा मगर रात होने पर मैं आपको एक दूसरे मकान में ले चलूँगा।

भैया० : बहुत अच्छा, तो अब मेरे नहाने-धोने का बन्दोबस्त होना चाहिए, मैं समझता हूँ कि मैदान जाने के लिए आप मुझे इस चहारदीवारी से बाहर तो जाने ही न देंगे?

भूत० : नहीं।

भैया० : अच्छा तो इस खण्डहर की कोठरियों में घूमने की तो इजाजत मिलेगी?

भूत० : इस खण्डहर के अन्दर आप जो चाहे कर सकते हैं, कुँआ और पानी खींचने का सामान भी यहाँ मौजूद है।

इतना कह कर भूतनाथ चुप हो गया। भैयाराजा अपनी जगह से उठ खड़े हुए और उस खण्डहर में जो कुछ कोठरियाँ थीं उन्हें अच्छी तरह से घूम-घूम कर देखने लगे। भूतनाथ और उसके दो-तीन साथी भी भैयाराजा के पीछे फिरते रहे। इसी तरह घूमते हुए भैयाराजा एक ऐसी कोठरी में पहुँचे जिसमें अभी तक लोहे का दरवाजा मौजूद था। यहाँ पर उन्होंने भूतनाथ से कहा, ‘‘अगर आप आधे घण्टे के लिए मुझे इस कोठरी में अकेले छोड़ दें तो बड़ी मेहरबानी होगी।’’ भूतनाथ ने भैयाराजा की यह बात मंजूर कर ली और कहा, ‘‘आप जितनी देर तक चाहें इसमें बैठ सकते हैं, मगर मैं खूब जानता हूँ कि अन्दर से किवाड़ बन्द करके आप बहुत देर तक इसमें आराम न कर सकेंगे।’’

इतना कह कर भूतनाथ अपने दो साथियों को दरवाजे के बाहर बैठने का इशारा करके वहाँ से चला गया और भैयाराजा ने उस कोठरी के अन्दर जाकर मामूली तौर पर उसका दरवाजा भिड़का दिया।

दो घण्टे के बाद भूतनाथ अपने जरूरी कामों से छुट्टी पाकर उस कोठरी के दरवाजे पर आया और भैयाराजा को होशियार करने की नीयत से नाखून से दरवाजे को खटखटाया। जब कुछ जवाब न मिला तो दरवाजे को धक्का दिया। भूतनाथ का खयाल था कि दरवाजा अन्दर से बन्द होगा मगर ऐसा न था, धक्का देने के साथ ही दरवाजा खुल गया मगर भैयाराजा पर निगाह न पड़ी जिसके कारण भूतनाथ कोठरी के अन्दर चला गया और बड़े गौर से चारों तरफ देखने लगा।

यह कोठरी बहुत बड़ी न थी। इसकी दीवार और जमीन एक किस्म के सुर्ख पत्थर से बनी हुई थी, दीवारों में आले या आल्मारी का कोई निशान तक न था, भूतनाथ को बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसी कोठरी में से भैयाराजा यकायक क्योंकर गायब हो गये! बहुत कुछ सोचने-विचारने के बाद भूतनाथ ने कमर से खञ्जर निकाला और उसके कब्जे से हर तरफ की दीवार ठोंक-ठोंक कर टोह लेने लगा कि कहीं से दीवार पोली तो नहीं है।

भूतनाथ का यह काम पूरा नहीं होने पाया था कि यकायक कोठरी का दरवाजा बन्द हो गया और अन्दर बिल्कुल अन्धकार हो जाने के कारण भूतनाथ घबड़ा उठा। टटोलता हुआ दरवाजे की जंजीर पकड़ कर खींचता था और बाहर से उसके शागिर्द धक्का देकर दरवाजा खोलना चाहते थे मगर किसी की भी मेहनत ठिकाने न लगी और अन्त में भूतनाथ दुःखी होकर जमीन पर बैठ कर तरह-तरह की बातें सोचने लगा। ‘‘क्या यह कोठरी किसी तिलिस्म से सम्बन्ध रखती है, या यह टूटा-फूटा मकान ही तिलिस्म है? अगर ऐसा है तो जरूर भैयाराजा को उसके भेद मालूम हैं। अफसोस, मुझसे बड़ी भूल हुई जो भैयाराजा को इस खंडहर में ले आया। तो क्या अब मैं इस कोठरी में अकाल-मृत्यु का शिकार बनूँगा? नहीं नहीं, मेरे पास खंजर है जिससे इस कोठरी की दीवार में सूराख कर सकता हूँ, यद्यपि इस लोहे के दरवाजे को खोलना असम्भव है।’’

इतना सोचकर भूतनाथ उठ खड़ा हुआ और खंजर से दीवार में सेंध लगाने की कोशिश करने लगा। मगर लगातार दो घण्टे मेहनत के बाद उसे निश्चय हो गया कि यह काम किसी तरह भी पूरा न हो सकेगा क्योंकि पत्थर और ईंट के टुकड़े निकालने के बाद मालूम हुआ कि दीवार में लोहे की फौलादी चादर लगी हुई है जिस पर खंजर का कुछ भी असर नहीं हो सकता था। पुनः हताश होकर भूतनाथ जमीन पर बैठ गया और अपनी बेवकूफी पर अफसोस करने लगा।

बाहर भी उसके शागिर्दों ने अपने उस्ताद को इस कैद से छुड़ाने के लिए कोशिश करने में कोई बात उठा न रक्खी, दीवार तोड़ने की कोशिश की और छत तोड़ने के लिए भी बेहिसाब पसीना बहाया मगर सफल-मनोरथ न हुए और अन्त में लाचार होकर दरवाजे के साथ मुँह लगा कर भूतनाथ से बातचीत करने लगे।

दुनिया में लालची, लोभी, पापी, और ऐयाश आदमियों को अपनी जान बहुत प्यारी होती है। जिन्हें लालच नहीं है और जो दुनियादारी में अपने को नहीं फँसाये रहते उनको अपनी जान की कुछ परवाह नहीं रहती। मौत से डर उन्हीं को लगता है। ‘जिनके काम खोटे रहते हैं और जिनको मालूम होता है कि हमने अपनी जिन्दगी में कोई काम अच्छा नहीं किया, न तो किसी के साथ उपकार किया और न किसी के आड़े वक्त में काम आये।

इसी तरह भूतनाथ की जिन्दगी की बही में पापों की रोकड़ जैसे-जैसे बढ़ती जाती है तैसे-तैसे उसे अपनी जान प्यारी होती जाती है, इसके विपरीत दूसरे की जान को वह मच्छर और खटमल की जान के समान समझता है। एक पाप को छिपाने के लिए उसे दूसरे पाप की जरूरत पड़ी और दूसरे के लिए तीसरे की। अस्तु समझ लेना चाहिए कि इस कोठरी में बन्द हर तरह से लाचार भूतनाथ कैसी बातें सोच रहा होगा।

दिन बीत गया और आधी रात भी गुजरने पर आ गई। उस समय भूतनाथ अपनी जिन्दगी से एकदम हताश होकर उच्च स्वर में ईश्वर से प्रार्थना करने और कहने लगा—‘‘हे जगन्नियन्ता, जगदाधार जगदीश्वर, मेरे अपराधों को क्षमा कर क्योंकि तू दीनानाथ, दीनबन्धु और दयालु है। मैं निश्चित रूप से प्रतिज्ञा करता हूँ कि भविष्य में किसी की आत्मा दुखी न करूँगा और न कोई ऐसा काम करूँगा कि जिससे लोग मुझे प्रायश्चित्ती कहें या मैं समाज में मुँह दिखाने के लायक न रहूँ। जो कुछ अपराध मैं कर चुका हूँ अब न तो उसको छिपाने की कोशिश करूँगा और न निरपराधिनी अबला जमना, सरस्वती और इन्दुमति के खून का ग्राहक ही बनूँगा तथा..।’’

भूतनाथ और कुछ कहना चाहता था कि उस कोठरी के एक कोने में से आवाज आयी, ‘‘ओ दुष्ट, चुप रह! क्या तू ईश्वर को भी धोखे में डालना चाहता है!’’

इस आवाज ने भूतनाथ को चौंका दिया और वह आँखें फाड़-फाड़ कर उस तरफ देखने लगा जिधर से आवाज आयी थी, मगर अन्धकार इतना ज्यादा था कि उसकी तेज आँखें भी कुछ काम न कर सकीं।

अफसोस कि इस वक्त ऐयारी का बटुआ भी उसके पास न था, नहीं तो वह जरूर सामान निकाल कर रोशनी करता और देखता कि उसकी बातों का जवाब देने वाला कौन है? भूतनाथ ने उठ कर टटोलना और उस तरफ जाना भी मुनासिब न समझा जिधर से आवाज आई थी अस्तु उसने गुप्त मनुष्य की बात का इस तरह उत्तर दिया—

भूत० : नहीं, मैंने जो कुछ कहा है उसकी सच्चाई में किसी तरह भी फर्क नहीं पड़ सकता। मैं यहाँ तक तैयार हो चुका हूँ कि अपने ऐयारी के फन को भी तिलांजलि दे दूँगा और दुनिया से एकदम किनारे हो जाऊँगा।

गुप्त० : नेकी और नेकनीयती के साथ रहने वाले को दुनिया छोड़ने की कोई जरूरत नहीं। अच्छा तेरी इस समय की प्रार्थना स्वीकार की जायगी अगर तू आज के माने में सच्चा ठहरेगा, देख मेरी तरफ!!

इसी समय कोठरी में चाँदना हो गया और साक्षात् शिव की तरह त्रिशूल और डमरू लिए एक अपूर्व मूर्ति के भूतनाथ को दर्शन हुए। भूतनाथ ने मुश्किल से देखा कि इस त्रिशूल में से बेहिसाब रोशनी निकल रही है और वह रोशनी इतनी कड़ी और तेज है कि उसकी तरफ आँख नहीं ठहरती। शिवरूपी महात्मा ने आगे बढ़ कर भूतनाथ के बदन से वह लगा दिया जिससे भूतनाथ काँप उठा और एकदम बेहोश होकर जमीन पर लेट गया।

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