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भूतनाथ - खण्ड 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8360
आईएसबीएन :978-1-61301-018-1

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भूतनाथ - खण्ड1 पुस्तक का ई-संस्करण

बारहवाँ बयान

गुलाबसिंह को साथ लेकर प्रभाकरसिंह नौगढ़ चले गये, वहाँ उन्हें फौज में एक ऊँचे दर्जे की नौकरी मिल गई और चुनार पर चढ़ाई होने से उन्होंने दिल का हौसला खूब ही निकाला वे मुद्दत तक लौटकर इन्दुमति के पास न आये और न इस तरफ का कुछ हाल ही उन्हें मालूम हुआ।

जब चुनारगढ़ फतह हो गया, राजा शिवदत्त उदासीन होकर भाग गए। चन्द्रकान्ता की शादी हो गई और चुनार की गद्दी पर राजा बीरेन्द्रसिंह बैठ गये तब बहुत दिनों के बाद प्रभाकरसिंह को इस बात का मौका मिला कि वे जाकर इन्दुमति से मुलाकात करें।

प्रभाकरसिंह के दिल में तरह-तरह का खुटका पैदा हो रहा था और यह जानने के लिए वे बहुत-ही उत्सुक हो रहे थे कि उनके पीछे कला, बिमला और इन्दुमति पर क्या-क्या बीती, अस्तु वे गुलाबसिंह को साथ लिए हुए बहुत तेजी के साथ कूच और मुकाम करते एक दिन दोपहर के समय उस पहाड़ी के पास पहुँचे जिसके अन्दर वह सुन्दर घाटी थी जिसमें कला और बिमला रहती थीं सोच रहे थे कि अब थोड़ी ही देर में उन लोगों से मुलाकात हुआ चाहती है जिनसे मिलने के लिए जी बेबैन हो रहा है।

आज कई वर्ष के बाद प्रभाकरसिंह इस घाटी के अन्दर पैर रक्खेंगे आज पहिले की तरह गर्मी या बरसात का मौसम नहीं है, बल्कि जाड़े के दिनों में प्रभाकरसिंह उस घाटी के अन्दर जा रहे हैं, देखना चाहिए वहाँ का मौसम कैसा दिखाई देता है।

सुरंग का दरवाजा खोलना और बन्द करना उन्हें बखूबी मालूम था, बल्कि इस घाटी के विषय में वे और भी बहुत-कुछ जान चुके थे।

अस्तु गुलाबसिंह को बाहर ही छोड़कर वे सुरंग के अन्दर घुसे और दरवाजा खोलते और बन्द करते हुए उस घाटी के अन्दर चले गये, मगर उन्हें पहुँचने के साथ ही वहाँ कुछ उदासी-सी मालूम हुई ताज्जुब के साथ चारों तरफ देखते हुए बँगले के अन्दर गये और वहाँ बिलकुल ही सन्नाटा पाया जिस बँगले को ये पहिले सजा हुआ देख चुके थे और जिसके अन्दर पहिले-तरह-तरह के सामान मौजूद थे आज वह बँगला बिलकुल ही खाली दिखाई दे रहा है, सजावट की बात तो दूर रही वहाँ एक चटाई बैठने के लिये और एक लुटिया पानी पीने के लिए भी मौजूद न थी, यही हाल वहाँ की अलमारियों का भी था जिनमें से एक भी पहिले खाली नहीं दिखाई देती थी। आज वहाँ हर तरह से सन्नाटा छाया हुआ है और ऐसा मालूम होता है कि वर्षों से इस बँगले के अन्दर किसी आदमी ने पैर नहीं रक्खा।

इस बँगले में से एक रास्ता उस मकान के अन्दर जाने के लिए था जिसमें कला और बिमला खास तौर पर रहती थीं, अथवा जिस मकान में पहिले-पहल इन्दुमति की बेहोशी दूर हुई थी। प्रभाकरसिंह हैरान और परेशान उस मकान में पहुँचे मगर देखा कि वहाँ की उदासी उस बँगले से भी ज्यादे बड़ी-चढ़ी है और एक तिनका भी वहाँ दिखाई नहीं देता।

‘‘यह क्या मामला है, यहाँ ऐसा सन्नाटा क्यों छाया हुआ है? कला, बिमला और इन्दुमति कहाँ चली गईं? अगर कहीं किसी आपस वाले के घर में चली गई तो यहाँ इस तरह उजाड़ कर जाने की क्या जरूरत थी? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे तीनों भूतनाथ के कब्जे में पड़ गई हों और भूतनाथ ने ही इस मकान को ऐसा उजाड़ बना दिया हो!’’ इन सब बातों को सोचते हुए प्रभाकरसिंह उदास और दुःखित चित्त से बहुत देर तक चारों तरफ घूमते रहे और तब यह निश्चय कर वहाँ से चल पड़े कि अब भूतनाथ की घाटी का हाल मालूम करना चाहिये और देखना चाहिये कि वह किस अवस्था में है।

पहिले प्रभाकरसिंह उस सुरंग में घुसे जिसमें से उन्होंने पहिले दिन भूतनाथ की घाटी में इन्दुमति को एक अपनी ही सूरत वाले के साथ ठगे जाते हुए देखा था। सुरंग के अन्त में पहुँच सुराख की राह से उन्होंने देखा कि भूतनाथ की घाटी में भी बिलकुल सन्नाटा छाया हुआ है अर्थात यह नहीं जान पड़ता कि इसमें कोई आदमी रहता है, कुछ देर तक देखने और गौर करने के बाद प्रभाकरसिंह सुरंग के बाहर निकल आये।

तब उनकी हिम्मत न पड़ी कि एक सायत के लिए भी उस घाटी के अन्दर ठहरें, उदास और दुःखित चित्त से सोचते और गौर करते हुए वे वहाँ से रवाना हुए और सुरंग की राह से कहीं निकलकर सन्ध्या होने के पहिले ही उस ठिकाने पहुँचे जहाँ गुलाबसिंह को छोड़ गये थे। दूर ही से प्रभाकरसिंह की सूरत और चाल देखकर गुलाबसिंह समझ गए कि कुछ दाल में काला है, रंग अच्छा नहीं दिखाई देता, जब गुलाबसिंह के पास प्रभाकरसिंह पहुँचे तो सब हाल बयान किया और उदास होकर उनके पास बैठ गए। गुलाबसिंह को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और वे सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिये।

प्रभाकरसिंह के दिल पर क्या गुजरी होगी इसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं। उनके लिए दुनिया ही उजाड़ हो गई थी और चुनारगढ़ की लड़ाई में जो कुछ बहादुरी कर आये थे वह सब व्यर्थ ही जान पड़ती थी। दोनों बहादुरों ने मुश्किल से उस जंगल में रात बिताई और सवेरा होने पर अच्छी तरह निश्चय करने के लिए भूतनाथ की घाटी जाने का इरादा किया, दोनों आदमी वहाँ से रवाना हुए और कुछ देर के बाद उस सुरंग के मुहाने पर जा पहुँचे जिस राह से भूतनाथ अपनी घाटी में आया-जाया करता था। रास्ते तथा दरवाजे का हाल प्रभाकरसिंह से कुछ छिपा न था अस्तु वे दोनों शीघ्र ही घाटी के अन्दर जा पहुँचे और देखा कि वास्तव में यहाँ भी सब उजाड़ पड़ा हुआ है और लक्षणों से जाना जाता था कि यहाँ वर्षों से कोई नहीं आया और न कोई रहता है। अब कहाँ चलना चाहिये!

तरह-तरह की बातें सोचते-विचारते प्रभाकरसिंह और गुलाबसिंह घाटी के बाहर निकल आये और एक पेड़ के नीचे बैठकर इस तरह बातचीत करने लगे-

गुलाबः आश्चर्य की बात तो यह है कि दोनों घाटियाँ एकदम से खाली हो गईं, अब रणधीरसिंह के यहाँ चलकर पता लगाना चाहिये कि भूतनाथ का क्या वे तीनों औरतें भूतनाथ के कब्जे में आ गई हों, वहाँ चलने से कुछ-न-कुछ पता जरूर लग जायगा।

प्रभा० : रणधीरसिंह जी के यहाँ तो मैं किसी तरह नहीं जा सकता। यद्यपि वे मेरे रिश्तेदार हैं मगर इस समय मैं उनके दामाद (शिवदत्त) से लड़कर आ रहा हूँ।

इसलिए मुझे देखते ही वे आग हो जायेंगे क्योंकि उन्हें अपने दामाद और अपनी लड़की की अवस्था पर बहुत दुःख हो रहा होगा।

गुलाब : ठीक है, ऐसा जरूर होगा, मगर मैं यह तो नहीं कहता कि आप सीधे रणधीरसिंह के पास चले चलिये, मेरा मतलब यह है कि हम लोग सौदागरों की सूरत में वहाँ जाकर किसी सराय में डेरा डालें तथा ऊपर-ही-ऊपर लोगों से मिल-जुल कर भूतनाथ का पता लगावें और जो कुछ हाल हो मालूम करें।

प्रभा० : हाँ यह हो सकता हैं अच्छा तो अब यहाँ ठहरना व्यर्थ हैं, चलो उठो मैं समझता हूँ कि इन्द्रदेवजी से मुलाकात किये बिना दिल को तसल्ली न होगी।

गुलाब० : जरूर, वहाँ भी चलना ही होगा, मगर पहिले भूतनाथ की खबर लेनी चाहिये।

इतना कहकर गुलाबसिंह उठ खड़े हुए, प्रभाकरसिंह ने भी उसका साथ दिया और दोनों आदमी मिर्जापुर की तरफ रवाना हुए, इस बात का भी कुछ भी खयाल न किया कि समय कौन हैं और रास्ता कैसा कठिन हैं।

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