भूतनाथ - खण्ड 1 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 1 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8360
आईएसबीएन :978-1-61301-018-1

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भूतनाथ - खण्ड1 पुस्तक का ई-संस्करण

पाँचवाँ बयान

ऊपर लिखी वारदात को गुजरे आज कई दिन हो चुके हैं, इस बीच में कहाँ और क्या-क्या नई बातें पैदा हुई उनका हाल तो पीछे मालूम होगा, इस समय हम पाठकों को कला और बिमला की उसी सुन्दर घाटी में ले चलते हैं जिसकी सैर वे पहिले भी कई दफे कर चुके हैं।

उस घाटी के बीचोबीच में जो सुन्दर बंगला है उसी में चलिए और देखिए कि क्या हो रहा है।

रात घंटे भर से कुछ ज्यादे जा चुकी है। बंगले के अन्दर एक कमरे में साफ और सुथरा फर्श बिछा हुआ है और उस पर कुछ आदमी बैठे आपुस में बातें कर रहे हैं, एक तो इन्द्रदेव हैं, दूसरी कला, तीसरी बिमला और चौथी इन्दुमति है जिसका नाम आजकल ‘चन्दा’ रक्खा गया है खैर सुनिये कि इनमें क्या-क्या बातें हो रही हैं।

बिमला : (इन्द्रदेव से) आपका कहना बहुत ठीक है, मैं भी भूतनाथ से इसी तरह पर बदला लेना पसन्द करती हूँ, तभी तो उसे यहाँ से निकल जाने का मौका दिया।

मैं समझता हूँ कि मरने वाले को कई सायत तक की मामूली तकलीफ तो होती है मगर मरने के बाद उसे कुछ भी ज्ञान नहीं रहता कि उसने किसके साथ कैसा सलूक किया था और उसने किस तरह पर उससे बदला लिया। प्राण का सम्बन्ध शरीर से नहीं छूटता उसे कोई-न-कोई शरीर अवश्य ही धारण करना पड़ता है, एक शरीर को छोड़ा तो दूसरा धारण करना पड़ा, यह उसकी इच्छानुसार नहीं होता बल्कि सर्वशक्तिमान जगदीश्वर के रचे हुए मायामय जगत का यह एक अकाट्य नियम ही है और इसी नियम के अनुसार ईश्वर भले-बुरे कर्मों का बदला मनुष्य को देता है।

एक देह को छोड़कर जब जीव दूसरी देह में प्रवेश करता है तब अपने भले-बुरे कर्मों का फल दूसरी देह में भोगता है, मगर इसका उसे कुछ भी परिज्ञान नहीं होता और उस सुख-दुख का कारण न समझकर वह सहज ही में उस कर्म फल की अथवा सुख-दुःख को भोग लेता है या भोगा करता है वह इस बात को नहीं समझ सकता कि पूर्व जन्म में मैंने यह पाप किया था जिसका बदला इस तरह पर मिल रहा है, बल्कि उसे वह एक मामूली बात समझता है, और दुःख को दूर करने का उद्योग किया करता है, यही कारण है कि वह पुनः पाप-कर्म में प्रवृत्त हो जाता है।

अगर मनुष्य जानता कि यह दुःख उसके किस पाप–कर्म का फल है तो कदाचित वह पुनः उस पाप-कर्म में प्रवृत्त होने का साहस न करता परन्तु उस महामाया की माया कुछ कही नहीं जाती और समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है कदाचित उस दयामय दया के भाव ही के कारण हो इसी से मैं कहता हूँ कि दुश्मन को मार डालने से कोई फल नहीं होता उसके पाप-कर्म का बदला ईश्वर तो उसे देगा ही परन्तु मैं भी तो कुछ बदला दे दूँ यही मेरी इच्छा रहती हैं चाहे किसी मत के पक्षपाती लोग इसे भी ईश्वर की इच्छा ही कहें परन्तु मेरे चित्त को जो सन्तोष होता है वह विशेषता इसमें अधिक अवश्य है।

बिमला : निःसन्देह ऐसा ही हैं

इन्दु० : दुश्मन बहुत दिनों तक जीता रह कर पाप का प्रायश्चित भोगता रहे सो अच्छा, जितने ही ज्यादे दिनों तक वह पश्चाताप करे उतना ही अच्छा।

उसके शरीर को जितना ही कष्ट भोगना पड़े उतना ही उत्तम, वह अपने सचाई के साथ बदला देने वाले को प्रसन्न और हँसता हुआ देखकर जितना ही कुढ़े जितना ही शर्मिन्दा हो और जितना दुःख पा सके उतना ही शुभ समझना चाहिए, इसी विचार से मैं कहता हूँ कि भूतनाथ को मारो मत, बल्कि उसे जहाँ तक बने सताओ और दुःख दो, भला वह समझे तो सही कि मेरे किस कर्म का यह क्या फल मिल रहा है!!

मगर एक बात और विचारने के योग्य है, वह यह कि इस तरह पर दुश्मन से बदला लेना कुछ सहज काम नहीं है, इसके लिए बड़े ही उद्योग, बड़े ही साहस और बड़े ही धैर्य की जरूरत है और इसके लिए अपने चित्त के भाव को बहुत ही छिपाना पड़ता है, सो ये बातें मनुष्य से जल्दी निभती नहीं, इसी से कई विद्धानों का मत है कि ‘दुश्मन को जहाँ तक हो सके जल्द मिटा देना चाहिए, नहीं तो किसी विचार से तरह दे देने पर कहीं ऐसा न हो कि मौका पाकर वह बलवान हो जाय और तुम्हीं को अपने कब्जे में कर ले।’ यह सच है परन्तु यदि ईश्वर सहायक हो और मनुष्य धैर्य के साथ निर्वाह कर सके तो इस बदले से वह पहिला ही बदला अच्छा है जिसे मैं ऊपर बयान कर चुका हूँ।

भूतनाथ के साथ इस तरह का बर्ताव करने से एक फायदा यह भी हो सकता है कि सच्चे और झूठे मामले की जाँच भी हो जायगी कदाचित् उसने तुम्हारे पति को धोखे ही से मारा हो जान-बूझकर न मारा हो, जैसाकि उसका कथन है! भूतनाथ ऐसा बुद्धिमान और धुरन्दर ऐयार यदि अपने कर्मों का प्रायश्चित पाकर सुधर जाय और अच्छी राह पर लगे तो अच्छी हो बात है क्योंकि ऐसे बहादुर लोग दुनिया में कम पैदा होते हैं।

इन्द्रदेव की आखिरी बात कला और बिमला को पसन्द न आई मगर उन्होंने उनकी खातिर से यह जरूर कह दिया कि- आपका कहना ठीक है।

कला : खैर अब तो भूतनाथ को मालूम ही हो गया है कि जमना और सरस्वती जीती हैं, देखें हम लोगों के लिए क्या उद्योग करता है।

इन्द्र : कोई चिन्ता नहीं, मालूम हो गया तो होने दो, तुम होशियारी के साथ इस घाटी के अन्दर पड़ी रहो, किसी को यहाँ का रास्ता मत बताओ और जब कभी इस घाटी के बाहर जाओ तो उन अद्भुत हर्बों को जरूर अपने साथ रक्खो जो मैंने तुम लोगों को दिये हैं।

बिमला : जो आज्ञा।

कला : यहाँ का रास्ता अभी तक तो सिवाय प्रभाकरसिंह के और किसी नए आदमी को मालूम नहीं, मगर इधर प्रभाकरसिंह की जुबानी यह जाना गया है कि हम लोगों का कुछ हाल उन्होंने अपने दोस्त गुलाबसिंह को जरूर कह दिया है, मगर यहाँ का रास्ता, घाटी या इसका असल भेद उनको भी नहीं बताया है।

इन्द्र : (कुछ सोचकर) प्रभाकरसिंह बुद्धिमान आदमी हैं, उन्होंने जो कुछ किया होगा उचित किया होगा, इसके विषय में तुम लोग चिन्ता मत करो इसके अतिरिक्त गुलाबसिंह पर मैं भी विश्वास करता हूँ वह निःसंदेह उनका सच्चा हितैषी है और साथ ही इसके साहसी और बहादुर भी है। यदि गुलाबसिंह को वे इस घाटी के अन्दर भी ले आवें तो कोई चिन्ता की बात नहीं हैं। (मुस्कुरा कर) और बेटी, तुमने तो प्रभाकरसिंह को यहाँ का राज्य ही दे दिया, यहाँ के तिलिस्म की ताली ही दे दी है।

बिमला : सो आपकी आज्ञा से, मैंने अपनी तरफ से कुछ भी नहीं किया, परन्तु फिर भी आपकी मदद पाये बिना वे कुछ कर न सकेगे। हाँ एक बात कहना तो मै भूल ही गई।

इन्दु० : वह क्या?

बिमला : भूतनाथ की घाटी का रास्ता मैंने बन्द कर दिया है, अब भूतनाथ अपने स्थान पर नहीं पहुँच सकता और उसके साथी और दोस्त लोग उसी के अन्दर पड़े-पड़े सड़ा करेंगे।

यह कहकर बिमला ने अपनी बेईमान लौंडी चन्दो की मौत और भूतनाथ की घाटी का दरवाजा बन्द कर देने तक का हाल पूरा-पूरा इन्द्रदेव से बयान किया।

इन्दु० : (कुछ सोच कर) मगर यह काम तो तुमने अच्छा नहीं किया! तुम लोगों को मैंने इस घाटी में इसलिए स्थान दिया था कि अपने दुश्मन भूतनाथ का हाल-चाल बराबर जाना करोगी, वह इस घाटी के पड़ोस में रहता है और यहाँ से उस घाटी का हाल बखूबी जाना जा सकता है इसी सुबीते को देखकर मैंने तुम लोगों को यहाँ छोड़ा था, सो सुबीता तुमने अपने से बिगाड़ दिया। यद्यपि भूतनाथ के संगी-साथी इससे परेशान होकर मर जायेंगे मगर इससे भूतनाथ का कुछ नहीं बिगड़ेगा।

वह इस स्थान को छोड़कर दूसरी जगह चला जायगा, फिर तुम्हें उसके काम-काज की भी कुछ खबर नहीं मिला करेगी। तुम ही सोचो कि यदि वह तुम्हारे किसी साथी या दोस्त को गिरफ्तार करता तो जरूर इस घाटी में ले आता और तुम्हें उसकी खबर लग जाती, तब तुम उसको छुड़ाने का उद्योग करती, मगर अब क्या होगा? अब तो अगर वह तुम्हारे किसी साथी को पकड़ेगा तो दूसरी जगह ले जायगा और ऐसी अवस्था में तुम्हें कुछ भी पता न लगेगा।

बिमला : (सिर झुका कर) बेशक यह बात तो हैं।

कला : निःसन्देह भूल हो गई!

इन्दु० : गहरी भूल हो गई। आखिर हम लोग औरत की जात, इतनी समझ कहाँ? अब इस भूल का सुधार क्योंकर हो?

इन्दु० : अब इस भूल का सुधार होना जरा कठिन है, भूतनाथ जरूर चौकन्ना हो गया होगा और अब वह अपने लिए दूसरा स्थान मुकर्रर करेगा। (कुछ विचार कर) मगर खैर एक दफे मैं इसके उद्योग जरूर करूँगा, कदाचित काम निकल जाय।

कला : क्या उद्योग कीजिएगा?

इन्दु० : सो अभी से कैसे कहूँ? वहाँ जाने पर और मौका देखने पर जो कुछ बन जाय। यदि भूतनाथ इस घाटी में बना रहेगा तो बहुत काम निकलेगा।

बिमला : तो क्या आप अकेले भूतनाथ की तरफ या उस घाटी में जायेंगे?

इन्दु० : हाँ। जा सकता हूँ क्योंकि वे लोग मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते और न मुझे भूतनाथ की परवाह ही है, मगर मेरा इरादा है कि इस काम के लिए दलीपशाह को भी अपने साथ लेता जाऊँ।

इतना कहकर इन्द्रदेव उठ खड़े हुए और उस कमरे में चले गए जो यहाँ नहाने-धोने के लिए मुकर्रर था।

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