भूतनाथ - खण्ड 1 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 1 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
लोगों की राय

मूल्य रहित पुस्तकें >> भूतनाथ - खण्ड 1

भूतनाथ - खण्ड 1

देवकीनन्दन खत्री

Download Book
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8360
आईएसबीएन :978-1-61301-018-1

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

348 पाठक हैं

भूतनाथ - खण्ड1 पुस्तक का ई-संस्करण

चौथा बयान

गुलाबसिंह की जब आँख खुली तो रात बीत चुकी थी और सुबह की सुफेदी में पूरब तरफ लालिमा दिखाई देने लग गई थी। वह घबड़ा कर उठ बैठा और इधर-उधर देखने लगा। जब प्रभाकरसिंह को वहाँ न पाया तब बोल उठा, बेशक मैं धोखा खा गया, वह मुसाफिर न था बल्कि कोई ऐयार था जिसने लोटे में किसी तरह की दवा लगा दी होगी, क्या मैं कह सकता हूँ कि प्रभाकरसिंह को वही उठा ले गया होगा?’’ इतना कह वह जगत के नीचे उतरा और घूम-घूम कर प्रभाकरसिंह की तलाश करने लगा। जब वे न मिले तो तरह-तरह की बातें मन में सोचता हुआ आगे की तरफ बढ़ा

‘‘बेशक वह कोई ऐयार था जो प्रभाकरसिंह को उठा कर ले गया, ताज्जुब नहीं कि वह भूतनाथ हो यद्यपि मुझे उससे ऐसी आशा न थी परन्तु आजकल वह जमना और सरस्वती के ख्याल से प्रभाकरसिंह को भी अपना दुश्मन समझने लग गया है। यह भी किसी को क्या उम्मीद थी कि जमना और सरस्वती जीती होंगी। खैर मुझे इस समय प्रभाकरसिंह के लिए कुछ बन्दोबस्त करना चाहिए, बेहतर होगा यदि मैं स्वयं भूतनाथ के पास चला जाऊँ और उससे प्रभाकरसिंह को माँग लूँ, मगर नहीं, यद्यपि वह मेरा दोस्त है परन्तु इस समय वह दोस्ती पर कुछ भी ध्यान न देगा।

अगर उसे ऐसा ही खयाल होता तो प्रभाकरसिंह को ले जाता ही क्यों? मुझे भी इस समय उससे किसी तरह की उम्मीद न रखनी चाहिए, क्योंकि अब हम लोग दयाराम के खयाल से जमना और सरस्वती के पक्षपाती हो गये हैं, अस्तु अब उसके लिए कोई दूसरा ही बन्दोबस्त करना चाहिए, अगर उस खोह का रास्ता मुझे मालूम होता तो मैं जमना और सरस्वती को भी इस बात की खबर दे देता। खैर अब मुझे दलीपशाह के पास चलना चाहिए और उससे मदद माँगनी चाहिए क्योंकि मैं अकेले भूतनाथ का मुकाबला नहीं कर सकता। दलीपशाह जरूर मेरी मदद करेगा, उस पर मेरा जोर भी है और उसने मेरे साथ अपनी मुहब्बत भी दिखाई है, मगर पहिले अपने आदमियों को समझा देना चाहिए जो अभी तक हम लोगों का इन्तजार कर रहे होंगे!!’’

इत्यादि तरह-तरह की बातें सोचता हुआ गुलाबसिंह आगे की तरफ बढ़ा चला जाता था। लगभग एक या डेढ़ कोस गया होगा कि सामने से दो सिपाही ढाल-तलवार लगाए दो घोड़ों की बागडोर थामें आते हुए दिखाई पड़े जब वे गुलाबसिंह के पास पहुँचे तो सलाम करके खड़े हो गए और गुलाबसिंह भी रुक गया।

गुलाब : तुम लोग कहाँ जा रहे हो?

एक : आप ही की खोज में जा रहे हैं, क्योंकि रात भर इन्तजार करके हम लोग....

गुलाब : (बात काट कर) बेशक तुम लोग तरद्दुद में पड़ गए होगे, मगर क्या करें लाचारी है, अच्छा यह कहो कि बाकी आदमी कहाँ हैं?

एक : अभी तक सब उसी जगह अटके हुए हैं।

गुलाब : अच्छा एक काम करो तुम घोड़ा यहीं छोड़ दो और लौट जाओ, हमारे आदमियों को इत्तिला दो कि हमारे घर पर चले जायँ, पुराने घर पर नहीं आजकल जहाँ हम रहते हैं उस घर पर चले जायँ, और जब तक हम या प्रभाकरसिंह वहाँ न आवें तब तक कहीं न जायँ। मैं इस घोड़े पर सवार होकर किसी काम के लिए जाता हूँ, (दूसरे सिपाही की तरफ देखकर) तुम इस दूसरे घोड़े पर सवार हो लो और मेरे साथ-साथ चलो।

इतना कहकर गुलाबसिंह घोड़े पर सवार हो गया, ‘‘जो हुक्म’’ कह कर एक सिपाही तो पीछे की तरफ लौट गया दूसरा घोड़े पर सवार होकर गुलाबसिंह के साथ रवाना हुआ।

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book