उपन्यास >> नास्तिक नास्तिकगुरुदत्त
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खुद को आस्तिक समझने वाले कितने नास्तिक हैं यह इस उपन्यास में बड़े ही रोचक ढंग से दर्शाया गया है...
‘‘माताजी! पिताजी कह रहे हैं कि मुझे साथ नहीं ले जायेंगे।’’
‘‘क्यों? देखिये जी! इस प्रकार झगड़ा करने से तो नौकर-चाकर आ जायेंगे। भीतर आकर बात करिये।’’
उमाशंकर ने ही तो शिव को पिताजी के साथ जाने को तैयार किया था। वह स्वयं भी कोठी की ड्योढ़ी में खड़ा पिता की और शिव की तकरार सुन रहा था। जब महादेवी कह रही थी कि भीतर आकर बात करें तो उसने भी वहाँ पहुँचकर कह दिया, ‘‘माताजी ठीक कह रही हैं। बाहर जाकर झगड़ा करने से कमरे में बैठ फैसला कर लेना ठीक रहेगा।’’
रविशंकर पुनः अपने बेडरूम में चला आया और उसके साथ-साथ महादेवी, उमाशंकर तथा शिव भी अन्दर चले आये।
रविशंकर ने वहाँ सोफा पर बैठते हुए कहा, ‘‘मैं घूमने नहीं जा रहा था।’’
‘‘तो कहाँ जा रहे थे?’’ महादेवी ने पूछ लिया।
‘‘मैं दिन-भर के लिए घर छोड़ रहा था।’’
‘‘किसलिए?’’
‘‘मैं प्रज्ञा इत्यादि से मिलना नहीं चाहता।’’
‘‘क्यों? उसने आपका क्या बिगाड़ा है?’’
‘‘मेरा मन उसे एक मुसलमान की बीवी देख प्रसन्न नहीं होता।’’
‘‘यह उसकी अपनी पसन्द है और मैं समझती हूँ कि वह किसी प्रकार से अयोग्य भी नहीं है।’
‘‘क्या योग्यता है उसमें?’’
‘‘जिस उद्देश्य से विवाह किया जाता है, वह पूर्ण कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि छः-सात महीने में आप एक बच्चे के नाना बन जायेंगे।’’
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