आंख की किरकिरी - रबीन्द्रनाथ टैगोर Aankh Ki Kirkiri - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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आंख की किरकिरी

रबीन्द्रनाथ टैगोर


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :55
मुखपृष्ठ : ebook
पुस्तक क्रमांक : 3984
आईएसबीएन :9781613015643

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नोबेल पुरस्कार प्राप्त रचनाकार की कलम का कमाल-एक अनूठी रचना.....

5

कुछ दिन सूखा पड़ने से नाज के जो पौधे सूख कर पीले पड़ जाते हैं, बारिश आने पर वे तुरंत बढ़ जाते हैं। आशा के साथ भी ऐसा ही हुआ। जहाँ उसका रक्त संबंध था, वहाँ वह कभी भी आत्मीयता का दावा न कर सकी, आज पराए घर में जब उसे बिन माँगे हक मिला, तो उसने इसे लेने में देर न की।

उस दिन दोपहर में राजलक्ष्मी नीचे उतर आईं। उन्होंने सोचा अन्नपूर्णा को जगाया जाए। बोलीं- 'अरी ओ मँझली, जा कर देख जरा, तुम्हारी नवाब की बेटी नवाब के घर से कैसा पाठ पढ़ कर आई है! घर के बड़े-बूढ़े आज होते तो।'

अन्नपूर्णा ने कातर हो कर कहा - 'दीदी, अपनी बहू को तुम शिक्षा दो, या हुकूमत चलाओ, मुझे क्या? मुझसे क्यों कह रही हो।'

राजलक्ष्मी धनुष की तनी डोरी-सी टंकार उठीं- 'हूँ, मेरी बहू! जब तक तुम मंत्री हो, वह मुझे कैसे मान सकती है!'

यह सुन कर अन्नपूर्णा पैर पटकती हुई महेंद्र के कमरे में पहुँच गईं। आशा से बोलीं- 'तू इस तरह से मेरा सिर नीचा करेगी री, मुँहजली! शर्म नहीं, हया नहीं, समय-असमय का खयाल नहीं, बूढ़ी सास पर गृहस्थी का सारा बोझ डाल कर तुम यहाँ आराम फरमा रही हो? मेरा ही नसीब जला कि मैं तुझे इस घर में ले आई।'

कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे और आशा भी सिर झुकाए आँचल के छोर को नाखून से नोचती हुई चुपचाप रोने लगी।

महेंद्र ने कहा - 'यह देखो, इसके लिए मैं स्लेट, बही, किताब सब खरीद लाया हूँ। इसे मैं लिखना-पढ़ना सिखाऊँगा, चाहे लोग मेरी निंदा करें।'

अन्नपूर्णा बाली - 'ठीक है, लेकिन यह क्या तमाम दिन? शाम के बाद घंटा-आधा घंटा पढ़ लिया बस! घंटा-आधा घंटा पढ़ना ही तो काफी होगा।'

महेंद्र - 'इतना आसान नहीं है चाची, पढ़ने-लिखने में समय लगता है।'

अन्नपूर्णा खीझ कर चली गईं। आशा भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। महेंद्र दरवाजा रोक कर खड़ा हो गया - उसने आशा की गीली आँखों की विनती न मानी। वैसे आशा को नहीं लगता कि लिखना-पढ़ना जरूरी भी है, फिर भी वह अपने पति की खातिर किताबों पर एकबारगी झुक कर सिर हिलाती हुई बताई चीजें याद करती रहती। कमरे के कोने में छोटी-सी मेज पर डॉक्टरी की किताब खोले मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे होते, बीच-बीच में कनखियों से छात्रा को देखते रहते। अचानक अपनी किताब बंद करके आवाज दी- 'चुन्नी!' यह आशा का ही घरेलू नाम था।

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