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27 श्रेष्ठ कहानियाँ

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :223
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2097
आईएसबीएन :1234567890

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स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ आरंभिक वर्षों की कहानियाँ


गीली मिटटी

अमृतराय

नींद में ही जैसे मैंने माया की आवाज़ सुनी और चौंककर मेरी आंख खुल गई। बगल के पलंग पर नज़र गई, माया वहां नहीं थी। आज इतने सवेरे माया कैसे उठ गई, कुछ बात समझ में नहीं आई।

आवाज़ दरवाजे पर से आई थी। मैं हड़बड़ाकर उठा और वहां पहुंचा, तो क्या देखता हूं कि माया दरवाजा खोले खड़ी है और बाहर के बरामदे में एक दुबला-पतला आदमी, मंझोले कद का, सिर्फ़ एक जरा-सी लुगडी लपेटे, बाकी सब धड़ और टांगें नंगी, उकडूं बैठा है। माया दरवाजा खोलने आई, तो आज सबसे पहले इसी आदमी के दर्शन हुए। मैंने भी देखा और मुझे भी गुस्सा आया कि यह मरदूद कैसे आ मरा। मैंने डपट कर पूछा-''कौन हो तुम? यहां कैसे आए?''
दोनों ही सवालों का जवाब आसान था-मैं एक गरीब भिखमंगा हूं जिसके सर पर छप्पर नहीं है। या-जी नहीं, शिकरम नहीं ली, यों ही चलकर आ गया। मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया, जो कि मुझे और भी खला और मैंने आवाज़ में और भी तेजी लाते हुए कहा-''बोलता क्यों नहीं? बहरा है?''
फिर भी कोई जवाब नहीं। जवाब हो भी क्या सकता था, अगर वह सचमुच बहरा था। मगर कौन कह सकता है कि वह बहरा था ही, आजकल इस तरह के बने हुए आदमीं.......

लेकिन वाक्य पूरा करने के पहले ही मुझे लगा कि यह मैं गलत बात कह रहा हूं। बने हुए आदमी दिन के वक्त भेस बनाकर भीख मांगा करते हैं-इस तरह रात को किसी के बरामदे में आकर सो नहीं जाते, जाड़े की ऐसी रात में। और, मेरा ध्यान उसके ओढ़ने-बिछौने पर गया। बिछौना निखहरी जमीन और ओढ़ना टाट का एक घिसा हुआ पौन गज का टुकड़ा (और हां एक चिक भी, जो उसने हमारे दरवाजे से उतार कर अपने ऊपर डाल ली थी)। उस वक्त, जब कि एक गद्दे और एक लिहाफ़ से भी मेरा काम ठीक से नहीं चलता-जी होता है कि और कुछ ओढ़ लें-कैसे कटी होगी इसकी रात? नींद तो क्या आई होगी! दांत बजते रहे होंगे, जांघों में हाथ डाले राम का नाम जपता पड़ा रहा होगा, या शायद टहल-टहल कर ही रात काटी होगी। किसने देखा है? और, किसको दिखाने के लिए यह शक्ल बनाई है? इन ठंडी सूनी दीवारों को? बने हुए आदमी! यह क्या बना हुआ आदमी है। और अपनी बात खुद मुझे सालने लगी।

मगर उस आदमी को इस समय की मेरी आत्मपीड़ा से भी उतना ही कम प्रयोजन था, जितना दो मिनट पहले की कठोरता। ठिठुरते हुए हाथों से चिक दो दरवाजे पर टांगने के बाद वह अब कच्चे पपीते के बीज, जो तमाम बिखरे हुए थे, बटोर कर एक जगह कर रहा था। लगता है, उसने हमारे ही पेड़ से एक कच्चा पपीता तोड़कर उससे अपनी भूख बुझाने की कोशिश की थी। लेकिन अभी शायद वह पूरी तरह जानवर नहीं बन पाया था, इसीलिए पूरा पपीता नहीं खा सका था। आधा टुकड़ा किसी तरह नोच-नाच कर वह खा गया था और आधा ज्यों-का-त्यों पड़ा था। पपीते के बीज सब इधर-उधर छिटके हुए थे, जिन्हें अब वह बटोर रहा था।

पता नहीं, क्यों उसे इस बात का खयाल आया। वह यह भी सोच सकता था कि जिसका घर है, वह सफ़ाई करवा ही लेगा। मगर नहीं, वह जानवर नहीं है कि सफ़ाई का उसे कोई खयाल न हो। जहां उसने रात गुजारी है-जहां से अब वह जा रहा है-उस जगह को गंदा करके वह नहीं जाना चाहता। मैं नहीं कह सकता कि उसके दिल में क्या बात थी। हो सकता है, बस इतनी ही बात रही हो कि यह सब गंदगी साफ़ कर दो, नहीं तो साहब नाराज़ होंगे और यदि अपने नौकर को बुलाकर दस-पांच लात-घूंसे लगवा देंगे। जो भी बात उसके दिल में आई हो और जो भी उसके पहले के तजुर्बे रहे हों, मैं कुछ भी नहीं जानता। मैंने बस इतना देखा कि वह जाड़े के मारे ठिठुरती हुई उंगलियों से जैसे-तैसे गंदगी इकट्ठी कर रहा है।

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