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देवकांता संतति भाग 7

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : तुलसी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2050
आईएसबीएन :0000000

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

रोता-पीटता आगे चला तो गुफा के तीन मोड़ बाद ही एक वैसा ही बर्छा फिर गुफा में टंगा मिला। उस पर भी वही नक्काशी थी, जो मैं पीछे वाले बर्छे पर देख आया था। अब मैं ये समझने लगा कि गुफा को पार करने के लिए बर्छे पर बनी ये नक्काशी समझनी बहुत जरूरी है। इससे आगे मेरे साथ जो कुछ हुआ वह बहुत भयानक है। लिखते हुए भी रूह कांपती है। लिखने का समय भी नहीं है। इसलिए नहीं लिख रहा हूं। बस इतना समझ लो कि मैं साक्षात नरक में फंस गया हूं। यहां केवल इतना ही लिख रहा हूं कि बर्छे वाली उस नक्काशी की नकल मैं अगले पेज पर बना रहा हूं। हजार दिमाग घुमाने के बाद भी मैं इसे नहीं समझ पाया हूं। अगर तुममें से कोई इसे समझ सके तो कदाचित तुम्हारा दोस्त इस नरक से जिंदा निकल सकता है। वरना अलविदा ही समझो, अगर जिंदा नहीं बचा तो यह भी नहीं जान सकोगे कि तुम्हारा दोस्त किस नरक में फंसकर मर गया। बच गया तो जरूर ही तुमने सारा हाल मुख्तसर में कहूंगा। बस, अब जीने की एक ही उम्मीद है और वो ये कि आप लोग पीछे बनी पहेली का हाल मुझे भेज सकें। दिल कांप रहा है कि सारा हाल लिखूं लेकिन मजबूर हूं।

तुम्हारा साथी - माइक।''

माइक के इस खत को पढ़कर जहां सबकी आंखों में आंसू उभर आए, वहां सभी को गहरा आश्चर्य भी हुआ। यह बात किसी की समझ में आने वाली नहीं थी कि गुफा के बीच में रास्ता रोके एक हाथी की लाश पड़ी थी। और उसके ऊपर से गुजरते ही जिस्मानी ढंग से माइक बूढ़ा हो गया। उसकी खाल झुलसकर झुर्रियोंदार बन गई और उसके जिस्म में - वह सब बदलाव आ गए जो इन सबने अपनी आंखों से देखे थे। माइक की वह हालत खुद-ब-खुद ही सबकी आंखों के सामने घूम गई।

''क्या तुम्हें माइक के लिखे हुए किस्से पर यकीन आया?'' इस खत को पढ़कर, खत्म हो जाने के बाद फिर बांड ने हुचांग से पूछा।

''अगर हम किसी और जगह होते और ऐसी बात सुनते तो गप्प मारने वाले की बुद्धि पर खूब हंसते कि गप्प मारने वाले ने इस बात का भी ख्याल नहीं किया है कि इस गप्प पर लोग यकीन कर लेंगे या नहीं!'' हुचांग ने जवाब दिया-''लेकिन यहां, इस तिलिस्म में फंसकर हमने खुद ऐसे चमत्कार देखे हैं कि अगर हमसे कोई ये कहे कि सूरज इसी खंडहर में पैदा हुआ और बाद में आकाश में गया तो हमें यकीन करना होगा। वैसे भी माइक भला हमसे झूठ क्यों बोल सकेगा?''

''लेकिन ये समझ में नहीं आता कि ऐसी वह कौन-सी लाश होगी - जो आदमी को बूढ़ा कर दे?'' टुम्बकटू ने जैसे खुद से ही सवाल किया।

''अब हरामी के पिल्लो, तुम भी इस बारे में सोचते-सोचते बूढ़े हो जाओगे - लेकिन कुछ न समझ पाओगे। ये बात चाहे साली समझ में आए या न आए - सबसे पहले हमें माइक के लिए कुछ करना चाहिए।''

''माइक ने लिखा है कि अगर हम उस बर्छे पर की गई नक्काशी का हल किसी तरह भेज दें तो मुमकिन है कि वह बच जाए।''

''तो फिर जल्दी से बर्छे की नक्काशी का दृश्य देखो!'' बागारोफ ने कहा और पेज उलट दिया। सब बुरी तरह उत्सुक होकर उस कागज पर झुक गए और ध्यान से उस कागज को देखने लगे। इबारत निम्न थी-

''पाव्यं न छेठा, ओह, पीजच।''

 

।। समाप्त ।।

 

... आगे का हाल जानने के लिए पढ़ें देवकांता संतति : भाग-8

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