व्यक्तित्व परिष्कार की साधना - श्रीराम शर्मा आचार्य Vyaktitwa Parishkaar Ki Sadhna - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> व्यक्तित्व परिष्कार की साधना

व्यक्तित्व परिष्कार की साधना

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :32
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15536
आईएसबीएन :0

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नौ दिवसीय साधना सत्रों का दर्शन दिग्दर्शन एवं मार्गदर्शन

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त्रिकाल संध्या के तीन ध्यान


साधना को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए शास्त्री-सिद्ध पुरुषों ने त्रिकाल संध्या करने का परामर्श दिया है। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में, मध्यान्ह में और सायंकाल सूर्यास्त के संधिकाल में। सामूहिक रूप में साधना करने से उसका प्रभाव कई गुना हो जाने का तथ्य सर्वविदित है। इन्हीं सिद्धान्तों के अनुसार साधना सत्रों में तीन बार सामूहिक ध्यान प्रयोग कराये जाते हैं, जो इस प्रकार हैं।

सविता ध्यान

यह ध्यान प्रातःब्रह्म मुहूर्त में होता है। प्रातःकाल तीर्थ की प्राण चेतना से ओत-प्रोत वातावरण में यह ध्यान परम पू. गुरुदेव की वाणी में टेप निर्देशों के आधार पर चलता है। सामने स्टेज पर उगते सूर्य की आभा का दर्शन होता है। पू. गुरुदेव के प्रारंभिक निर्देश अपने शरीर मन को स्थिर करके स्वयं को दिव्य प्रवाह से घिरा हुआ अनुभव करने के होते हैं। उसके बाद उनके स्वर में स्वर मिलाकर साधक १२ बार गायत्री महामंत्र का उच्चारण करते हैं। इस समय भावना की जाती है कि युग ऋषि की वाणी के साथ उनकी प्राण चेतना भी प्रवाहित हो रही है। उनके 
साथ अपने उच्चारण के मन-के कूपन एक होकर-योग की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। इस क्रम में साधकों को अनुभव होने लगता है, मानो पूज्यवर का स्वर कहीं बाहर से नहीं हमारे अन्दर से ही उभर रहा है। यह अनुभूति असाधरण लाभकारी होती है। एक बार यह बोध होते ही चिन्तन के बीच अनेक बार पूज्यवर की स्वरचेतना अन्तःकरण में उभरने लगती है तथा अनेक प्रेरणाएँ मार्गदर्शन, निर्देश समयानुसार प्रदान करती रहती है।

मन्त्रोच्चार के बाद तीर्थ के दिन वातावरण में उगते सूर्य के स्वर्णिम प्रकाश में स्वयं को डूबा हुआ अनुभव करने के संकेत मिलते हैं। उस दिव्य प्रवाह-प्रकाश का स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में संचित होने, उन्हें सुसंस्कारी तथा पुष्ट-तेजस्वी बनाने के संकेत प्राप्त होते हैं। इस समय सारी चेतना पूज्यवर के निर्देशों पर केन्द्रित रखी जाती है। जो कहा जा रहा है, उसका कोई स्थूल दृश्य कल्पना में उभरे या न उभरे, उस सत्य को अपने अन्दर घटित होने की आस्था बनाये रखनी चाहिए। यदि शरीर के किन्हीं अंगों में पुलकन सिहरन, अन्तर्दृष्टि में प्रकाश-चिनगारियों, किरणों के आकार जैसे बनें, तो ध्यान का केन्द्र उन कौतुहल प्रतिक्रियाओं को नहीं बनने देना चाहिए। पूज्यवर के निर्देशों पर ही चेतना केन्द्रित रखनी चाहिए।

अन्त में ''असतो मा सद्गमय'' आदि प्रार्थनाएँ करके ॐ का गुंजार पूज्यवर करते हैं। इस समय ध्यान में प्राप्त अनुदानों को अपने अन्दर स्थिर करने और उनके सदुपयोग की दक्षता उभरने का भाव करना चाहिए। इसके पश्चात् पंद्रह मिनट साधक स्वयं जप करते हैं। प्राप्त अनुदानों का मंत्र जप द्वारा अपने व्यक्तित्व में हजम करने जैसा भाव इस जप के साथ किया जाता है। अपने लिए और मनुष्य मात्र के लिए उज्जवल भविष्य के निर्माण की प्रार्थना की जाती है। शंख ध्वनि होने पर यह सामूहिक ध्यान प्रयोग समाप्त होता है।

ज्योति अवधारणा

यह प्रयोग मध्यान्ह काल में होता है। मुख्य मंच पर दीप प्रज्वलित करके, देव नमस्कार करके दीप यश के क्रम में २४ बार गायत्री महामंत्र स्वाहा सहित उच्चारित किया जाता है। भावना की जाती है कि युगसंधि काल में, उज्जवल भविष्य की संरचना के लिए युगशक्ति का अवतरण हुआ है। इस प्रयोग द्वारा हमें युग चेतना के साथ आत्मचेतना का योग करना है। हम ज्योति को छूकर स्वयं भी ज्योतित हो रहे हैं। युग शक्ति की महा ज्योति में अपनी भावना -विचारणा-साधना आदि को होम कर उनका अनेक गुना शक्तिशाली बना रहै हैं। इस प्रयोग के बीच साधक स्वयं को सशरीर ररक ज्योति पुंज के रूप में अनुभव करने लगता है। जाने-अनजाने ही विकारों का दहन होकर संस्कारों का उन्नयन होने लगता है। अपने अन्दर अग्रदूत बनकर बढ़ने जैसी -युग नेतृत्व कर सकने जैसी क्षमता का विकास होता अनुभव होता है।

इस साधना के पश्चात् भी आधे घण्टे अपना अनुष्ठानपरक जप किया जाता है। इस प्रकार के दिव्य ध्यान प्रयोग के साथ जुड़ा हुआ यह जप, सामान्य मनोभूमि में किये गये जप को अपे क्षा अनेक गुना अधिक प्रभावकारी होता है।

नादयोग साधना

यह सामूहिक ध्यान प्रयोग सायंकालीन आरती के पश्चात् होता है। इसमें ध्यान का आधार संगीत होता है। संगीत का सीधा सम्बन्ध भाव संवेदनाओं से है। मनुष्य में अनेक प्रतिभाएँ-शक्तियाँ हैं किन्तु उन सबके मानवोचित देवोपम उपयोग की प्रेरणा भावसंवेदनाओं से ही प्राप्त होती है। उनके अभाव में प्रतिभाओं का दुरुपयोग होने लगता है और वे प्रगति के स्थान पर दुर्गति का कारण बनने लगती हैं।

सायंकालीन ध्यान में दैवी चेतना के प्रवाह को भावसंवेदनाओं के रूप में आत्मसात् करना होता है। भावना की जाती है कि स्वर वाद्य की स्वर लहरी के साथ उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं, स्नेह, आत्मीयता करुणा सहृदयता मैत्री, उल्लास आदि का प्रवाह प्रसारित हो रहा है। तालवाद्य के साथ शरीर का कण-कण, मन, अन्तःकरण थिरक रहा है और स्वर की दिव्य संवेदनाओं के साथ एकाकार हो रहा है।

इस साधना के समय साधक को लगता है, मानो कृष्ण की मुरली दिव्य संवेदनाएँ प्रवाहित कर रही है, गोपिकायों गौओं की तरह इन्द्रिय, तन्मात्राएँ, भावनाएँ उनके साथ थिरक रही हैं नृत्य कर रहीं हैं और महारास जैसे दिव्य उल्लास का लाभ प्राप्त कर रहीं हैं।

मीरा ने गाया था, ''पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे।'' भाव-संवेदनाओं के घुँघरू साधक के हर चरण पर खनक उठते हैं। उनकी झंकार आस पास वालों को उल्लसित करती है, यह देख इष्ट चेतना मुस्कुरा उठती है और इन दोनों प्रतिक्रियाओं से आनन्दित साधक इष्ट चेतना के ताल पर दुत लय में पगसंचालन करता-नृत्य करता दिव्य उल्लास के व्यापक प्रवाह पैदा करने लगता है।

त्रिकाल संध्या की यह तीनों ध्यान-साधनाएँ पूज्य गुरुदेव की तप-साधना की दुर्लभ शोध उपलब्धियों हैं। इन्हें सही ढंग से समझ कर तीर्थ क्षेत्र में साधनारत होने वाले साधक, दीर्घकालीन साधानाओं के लाभ अल्पसमय में ही पा जाते हैं उनके व्यक्तित्व में देवोपम ऐसी विशेषताएँ उभरने लगती है जो जीवन को श्री, समृद्धि और स्वर्ग-मुक्ति जैसे अनुदानों से युक्त बना सकती हैं।

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    अनुक्रम

  1. नौ दिवसीय साधना सत्रों का दर्शन दिग्दर्शन एवं मार्गदर्शन
  2. निर्धारित साधनाओं के स्वरूप और क्रम
  3. आत्मबोध की साधना
  4. तीर्थ चेतना में अवगाहन
  5. जप और ध्यान
  6. प्रात: प्रणाम
  7. त्रिकाल संध्या के तीन ध्यान
  8. दैनिक यज्ञ
  9. आसन, मुद्रा, बन्ध
  10. विशिष्ट प्राणायाम
  11. तत्त्व बोध साधना
  12. गायत्री महामंत्र और उसका अर्थ
  13. गायत्री उपासना का विधि-विधान
  14. परम पू० गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा की जीवन यात्रा

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