कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान - श्रीराम शर्मा आचार्य Kuchh Dharmik Prashno ka uchit samadhan - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान

कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15526
आईएसबीएन :0

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कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान

श्राद्ध का रहस्य


श्रद्धा से बाद शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किये हुए कार्य को बाद कहते हैं। सत्कायों के लिए, सत्पुरुषों के लिए आदर की, कृतज्ञता की भावना रखना श्रद्धा कहलाता है। उपकारी तत्वों के प्रति आदर प्रकट करना, जिन्होंने अपने को किसी प्रकार लाभ पहुंचाया है उनके लिए कृतज्ञ होना श्रद्धालु का आवश्यक कर्तव्य है। ऐसी श्रद्धा हिन्दू धर्म का मेरुदण्ड है। इस श्रद्धा को हटा दिया जाय तो हिन्दू धर्म की सारी महत्ता नष्ट हो जायेगी और वह एक निःस्वत्व छूंछ मात्र रह जायगा। श्रद्धा हिन्दू धर्म का एक अनिवार्य अंग है इसलिए श्राद उसका धार्मिक कृत्य है।

माता, पिता और गुरु के प्रयत्न से बालक का विकास होता है। इन तीनों का उपकार मनुष्य के ऊपर बहुत अधिक होता है। उस उपकार के बदले में बालक को इन तीनों के प्रति अटूट श्रद्धा मन में धारण किये रहने का शास्त्रकारों ने आदेश किया है। ''मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव'' इन श्रुतियों में इन्हें देव-नर तन धारी देव मानने और श्रम रखने का विधान किया है। स्मृतिकारों ने माता को ब्रह्मा, पिता को विष्णु और आचार्य से शिव का स्थान दिया है। यह कृतज्ञता की भावना सदैव बनी रहे, इसलिए गुरुजनों का चरण स्पर्श, अभिवन्दन करना नित्य के धर्म कृत्यों में सम्मिलित किया गया है। यह कृतज्ञता की भावना जीवन भर धारण किये रहना आवश्यक है। यदि इन गुरुजनों का स्वर्गवास हो जाय तो भी मनुष्य को वह श्रद्धा कायम रखनी चाहिए। इस दृष्टि से मृत्यु के पश्चात पितृ पक्षों में, मृत्यु की वर्ष तिथि के दिन, पर्व समारोहों पर श्राद्ध करने का श्रुति-स्मृतियों में विधान पाया जाता है। नित्य की संध्या के साथ तर्पण जुड़ा हुआ है। जल की एक अंजली भर कर हम स्वर्गीय पितृ देवों के चरणों में उसे अर्पित कर देते हैं। उनके नित्य चरण स्पर्श, अभिवन्दन की क्रिया दूसरे रूप में इस प्रकार पूरी होती है। जीवित और मृत पितरों के प्रति प्रकट करने का यह धर्मकृत्य किसी न किसी रूप में मनुष्य पूरा करता है और आत्म संतोष का अनुभव करता है।

इन्हीं विशेष अवसरों पर, श्राद्ध पर्वों में हम अपने पूर्वजों के लिए ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, पात्र आदि का दान करते हैं और यह आशा करते हैं? कि यह वस्तुऐं हमारे देवों को प्राप्त होंगी। इस संबंध में आज एक तर्क उपस्थित किया जाता कि दान की हुई वस्तुऐं पितरों को न पहुंचेंगी। स्थूल दृष्टि से, भौतिकवादी दृष्टिकोण से यह विचार ठीक भी है। जो पदार्थ बाद श्राद्ध में दान दिये जाते हैं वे सब उसी के पास रहते हैं, जिसे दिये जाते हैं। खिलाया हुआ भोजन निमंत्रित व्यक्ति के पेट में जाता है तथा अन्न, वस्त्र आदि उसके घर जाते हैं। यह बात इतनी स्पष्ट है जिसके लिए कोई तर्क उपस्थित करने की आवश्यकता नहीं। जो व्यक्ति श्राद्ध करता है, वह भी इस बात को भली प्रकार जानता है कि जो वस्तुऐं दान दी गईं थीं, वे कहीं उड़ नहीं गईं वरन् जिसने दान लिया था, उसी के प्रयोग में आईं हैं। इस प्रत्यक्ष बात में किसी तर्क की गुंजायश नहीं है।

अब प्रश्र दान के फल के संबंध में रह जाता है। यदि यह भी कहा जाय कि दान का पुण्य फल दाता को ही मिलता है तो इससे श्राद्ध की अनुपयोगिता सिद्ध नहीं होती। मनुष्य को लोभ वश दान आदि सत्कर्मों में प्रायः अरुचि रहती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आचार्यों ने कुछ पर्व, उत्सव, स्थान, काल ऐसे नियत किये हैं, जिन पर दान करने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया गया है। उन विशिष्ठ पर्वों, अवसरों पर दान करने के विविध भेद-प्रभेद और महात्म्यों का वर्णन किया गया है। मनुष्य में विवेक से रूढ़ि का अंश अधिक होता है। जैसे स्वास्थ्य ठीक न होते हुए भी दानादि सत्कर्म करने पड़ते हैं। उत्तम कर्म का फल उत्तम ही होता है, चाहे वह इच्छा से, अनिच्छा से या किसी विशेष अभिप्राय से किया जाय। श्राद्ध के बहाने जो दान-धर्म किया जाता है, उसका फल उस स्वर्गीय व्यक्ति को अवश्य ही प्राप्त न होता हो तो भी दान करने वाले के लिए वह कल्याण कारक है ही। सत्कर्म कभी भी निरर्थक नहीं जाते। श्राद्ध की उपयोगिता इसलिए भी है कि इस रूढ़ि के कारण अनिच्छापूर्वक भी धर्म करने के लिए विवश होना पड़ता है।

श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहा जाता है। जीवित पितरों और गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने, श्राद्ध करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा, पूजा तथा सन्तुष्टि की जा सकती है। परन्तु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने का, अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त निर्माण करना पड़ा है। यह निमित्त श्राद्ध है। स्वर्गीय गुरुजनों के कार्यों, उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से ही छुटकारा नहीं मिल जाता। हम अपने अवतारों, देवताओं, ऋषियों, महापुरुषों और पूजनीय पूर्वजों की जयन्तियाँ धूमधाम से मनाते हैं, उनके गुणों का वर्णन करते हैं, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरित्रों एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। यदि कहा जाय कि मृत व्यक्तियों ने तो दूसरी जगह जन्म ले लिया होगा, उनकी जयन्तियाँ मनाने से क्या लाभ? तो यह तर्क बहुत अविवेक पूर्ण होगा। मनुष्य मिट्टी का खिलौना नहीं है, जो फूट जाने पर कूड़े के ढेर में तिरस्कार पूर्वक फेंक दिया जाय। उसका कीर्ति शरीर युग युगान्तों तक बना रहता है वह उतना ही काम करता रहता है, जितना कि जीवित शरीर करता है। आज मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर कृष्ण, दानी कर्ण त्यागी दधीचि, सत्यवादी हरिश्चन्द्र, ध्रुव, प्रह्लाद, वीर हकीकतराय, बन्दा वैरागी, शिवाजी, महावीर, नानक, कबीर आदि जीवित नहीं हैं, पर उनका कीर्ति-शरीर उतना ही काम करता है जितना कि उनके जीवित शरीर ने किया था। करोड़ों व्यक्तियों को उनसे प्रेरणा और प्रकाश प्राप्त होता है।

मनुष्य भावना प्रधान प्राणी है। व्यापारिक दृष्टिकोण से ही वह हर पहलू को नहीं सोचता वरन् अधिकांश कार्य अपनी अन्तःवृत्तियों को तृप्त करने के लिए करता है। वृद्ध पुरुषों की सेवा, बालकों के भरण-पोषण का कठिनाई भरा दायित्व निर्वाह, पीड़ितों की सहायता, पुण्य-परोपकार आदि में व्यापारिक दृष्टि से कोई फायदा नहीं। यदि केवल व्यापार बुद्धि ही प्रधान हो तो बूढ़े माता-पिता को कोई रोटी क्यों दे? बच्चों को पालने-पोषने, पढ़ाने, विवाह आदि करने का झंझट उठाने के लिए कोई तैयार क्यों हो? ऐसी प्रवृत्ति हो जाने पर तो मानव जाति पिशाचों की सेना बन जायगी। पर सौभाग्य से ऐसा नहीं है। मनुष्य भावनाशील प्राणी है, वह प्रत्यक्ष लाभ की अपेक्षा अप्रत्यक्ष लाभ, हृदयगत भावनाओं को प्रधानता देता है। कृतज्ञता उसकी श्रेष्ठ वृत्ति है। इसे वह जीवितों के प्रति ही प्रकट करके संतुष्ट नहीं रह सकता। मृतकों के उपकारों के लिए भी उसे श्राद्ध करना पड़ता है।

संसार के सभी देशों में, सभी धर्मों में, सभी जातियों में, किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है। मृतकों के स्मारक, कब्र, मकबरे संसार भर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर, मुहल्ले, संस्थाऐं, मकान, कुएं, तालाब, मंदिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिर स्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है। उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयन्तियों का आयोजन किया जाता है। यह अपने-अपने ढंग के बाद ही है। ''क्या फायदा?'' वाला तर्क केवल हिन्दू श्राद्ध पर ही नहीं, समस्त संसार की मानव प्रवृत्ति पर लागू होता है। असल बात यह है कि प्रेम, उपकार, आत्मीयता एवं महानता के लिए मनुष्य स्वभावत: कृतत्र होता है और जब तक उस कृतज्ञता के प्रकट करने का प्रत्युपकार स्वरूप कुछ प्रदर्शन न कर ले तब तक उसे आन्तरिक बेचैनी रहती है। इस बेचैनी को वह श्राद्ध द्वारा ही पूरी करता है। ताजमहल क्या है? एक पत्नी का उसके पति द्वारा किया हुआ श्राद्ध है। इस श्राद्ध से उस पति को क्या फायदा हुआ यह नहीं कहा जा सकता पर इतना निश्चित है कि पति की अन्तरात्मा को इससे बड़ी शांति मिली होगी।

शाहजहां को उसके पुत्र औरंगजेब ने कैद करके जेल में पटक दिया और स्वयं राजा बन गया। जेल में सड़ते-सड़ते शाहजहां जब मृत्यु के निकट पहुंचा तो उसने आँसू भर कर कहा-''मेरे इस्लाम परस्त बेटे से तो वे काफिर (हिन्दू) अच्छे जो मृतक पितरों तक को पानी पिलाते हैं।'' श्राद्ध और तर्पण का मूल आधार अपनी कृतज्ञता और आत्मीयता की सात्विक वृत्तियों को जाग्रत रखना है। इन प्रवृत्तियों का जीवित रहना संसार की सुख-शांति के लिए नितान्त आवश्यक है। उस आवश्यक वृत्ति का पोषण करने वाले श्राद्ध जैसे अनुष्ठान भी आवश्यक हैं।

हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों में आधे से अधिक श्राद्ध तत्व से भरा हुआ है। सूरज, चांद, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी, अग्रि, जल, कुआँ, तालाब, मरघट, खेत, खलिहान, भोजन, चक्की, चूल्हा, तलवार, कलम, जेवर, रुपया, घडा, पुस्तक आदि निर्जीव पदार्थों की विवाह या अन्य संस्कारों में अथवा किन्हीं विशेष अवसरों पर पूजा होती है। यहां तक कि नाली या घूरे तक की पूजा होती है। तुलसी, पीपल वट, आँवला आदि पेड़-पौधे तथा, बैल, घोड़ा, हाथी आदि पशु पूजे जाते हैं। इन पूजाओं से उन जड़ पदार्थों या पशुओं को कोई लाभ नहीं होता, परन्तु पूजा करने वाले के मन में बम एवं कृतज्ञता का भाव जरूर उदय होता है। जिन जड़-चेतन पदार्थों से हमें लाभ मिलता है, उनके प्रति हमारी बुद्धि में उपकृत भाव होना चाहिए और उसे किसी न किसी रूप में प्रकट करना ही चाहिए। यह श्राद्ध ही तो है। मृतकों का ही नहीं, जीवित, जानदारों और बेजुबानों का भी हम श्राद्ध करते है। बाद के लिए हमारे शास्त्रों में पग-पग पर आदेश हैं।

मरे हुए व्यक्तियों को बाद कर्म से कुल लाभ होता है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है तो व्यक्ति उसका एक परमाणु। हर एक आत्मा जो जीवित या मृत रूप में इस विश्व में मौजूद है अन्य समस्त आत्माओं से सम्बद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हैं, तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जय जाड़े का प्रवाह आता है तो हर चीज ठण्डी होने लगती है और गर्मी की ऋतु में हर चीच की ऊष्णता बढ़ जाती है। छोटा सा यज्ञ करने से उसकी दिव्य गन्ध तथा दिव्य भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी भावना की लहरें पहुंचाता है। यह सूक्ष्म भाव तरंगें सुगन्धित पुष्पों की सुगन्ध तरह, आनन्द और उल्लासवर्द्धक होती, सद्भावना की सुगन्ध जीवित मृतक सभी को तृप्त करती है। इन सभी में अपने स्वर्गीय पितर भी आ जाते हैं। उन्हें भी श्राद्ध-यज्ञ की दिव्य तरंगें आत्म शांन्ति प्रदान करती है।

मर जाने के उपरान्त जीव का अस्तित्व मिट नहीं जाता, वह किसी न किसी रूप में इस संसार में ही रहता है। स्वर्गस्थ, नरकस्थ, गर्भस्थ, निर्देह, संदेह आदि किसी न किसी अवस्था में इस लोक में ही बना रहता है। इसके प्रति दूसरों की सद्भावना तथा दुभार्वनायें आसानी से पहुंचती रहती है। स्थूल वस्तुऐं एक स्थान, दूसरे स्थान तक देर में कठिनाई से पहुँचती हैं परन्तु सूक्ष्म तत्वों के संबंध में यह कठिनाई नहीं है, उनका यहां से वहां आवागमन आसानी से हो जाता है। हवा गर्मी, प्रकाश शब्द आदि को बड़ी दूरी पार करते हुए कुछ विलम्ब नहीं लगता। विचार और भाव इससे भी सूक्ष्म हैं, वे उस व्यक्ति के पास जा पहुंचते हैं जिसके लिए वे फेंके जाँय। सताये हुए व्यक्तियों की आत्मा को जो क्लेश पहुंचाता है उसका श्राद्ध शब्दभेदी तीर या राकेट-बम की तरह निश्चित स्थान पर जा पहुंचता है। सेवा, संतुष्टि, उपकृत, अहसानमंद, कष्ट उद्धरित व्यक्ति की सद्भावना, दुआ, वरदान, आशीर्वाद भी इसी प्रकार उस उपकारी व्यक्ति के पास पहंचते है, जिसने कोई परोपकार किया है। कोई व्यक्ति जीवित हो या मृतक उसके पास जहां कहीं भी रह रहे लोगों के शाप, वरदान पहुंचते हैं, उसे मालूम हो पावे या न हो पावे, वे शाप, वरदान उसे दुःख या सुख देने वाले परिणाम उसके सामने उपस्थित करते रहते है। इसी प्रकार कृतज्ञता की, श्रद्धा की भावना भी उस व्यक्ति के पास पहुँचती है, जिसके लिए वह भेजी जाती है, फिर चाहे वह स्वर्गीय व्यक्ति किसी भी योनि या किसी भी अवस्था में क्यों न हो। श्राद्ध करने वाले का प्रेम, आत्मीयता, कृतज्ञता की पुण्ययुक्त सद्भावना उस पितर आत्मा के पास पहुंचती हैं और उसे आकस्मिक, अनायास, अप्रत्याशित, सुख, शांति, प्रसन्नता, स्वस्थता एवं बलिष्ठता प्रदान करती हैं। कई बार कई व्यक्तियों को आकस्मिक, अकारण आनन्द एवं संतोष का अनुभव होता है, संभव है यह उनके पूर्व संबंधियों के श्राद्ध का ही फल हो।

श्रद्धा-कृतज्ञता हमारे धार्मिक जीवन का मेरुदण्ड है। यह भाव निकल जाय तो धार्मिक समस्त क्रियाऐं व्यर्थ, नीरस एवं निष्प्रयोजन हो जायेंगी। श्रद्धा के अभाव में यज्ञ करना और भट्टी जलाना एक समान है। देव और बालकों के खिलौनों में, शास्त्र श्रवण और कहानी सुनने में, प्रवचनों ग्रामोफोन के रिकाडों में कोई अन्तर नहीं रह जायगा। अश्रद्धा एक दावानल है, जिसमें ईश्वर, परलोक, कर्मफल धर्म सदाचार, दान-पुण्य, परोपकार, प्रेम एवं सेवा-सहायता परसे विश्वास उठता है और अन्त में अश्रद्धालु व्यक्ति अपनी छाया पर, अपने आप पर भी अविश्वास करने लगता है। भौतिकवादी नास्तिक दृष्टिकोण और धार्मिक आस्तिक दृष्टिकोण में प्रधान अन्तर यही है। नीरस, शुष्क, कठोर दृष्टिकोण वाला भौतिकवादी व्यक्ति स्थूल व्यापार बुद्धि से सोचता है। वह कहता है पिता मर गया, अब उससे हमारा क्या रिश्ता? जहाँ होगा अपनी करनी भुगत रहा होगा, उसके लिए परेशान होने से हमें क्या मतलब? इसके विपरीत धार्मिक दृष्टि वाला व्यक्ति स्वर्गीय पिता के अपरिमित उपकारों का स्मरण करके कृतज्ञता के बोझ से नत-मस्तक हो जाता है, उस उपकारमयी, स्नेहमयी, देवोपम स्वर्गीय मूर्ति के निःस्वार्थ प्रेम और त्याग का स्मरण करके उसका हृदय भर आता है। उसका हृदय पुकारता है-'स्वर्गीय पितृ देव। तुम सशरीर यहां नहीं हो, पर कहीं न कहीं इस लोक में आपकी आत्मा मौजूद है। आपके ऋण भार से दबा हुआ मैं बालक आपके चरणों में श्रद्धा की अंजुली चढ़ाता हूँ।' इस भावना से प्रेरित होकर वह बालक जल की एक अंजुली भर कर तर्पण करता है।

तर्पण का वह जल उस पितर के पास नहीं, वहीं धरती में गिर कर विलीन हो गया, यह सत्य है। यज्ञ में आहुति दी सामग्री जल कर वहीं खाक हो गई, यह भी सत्य है। पर यह असत्य है कि 'इस यज्ञ या तर्पण से किसी का कुछ लाभ नहीं हुआ।' धार्मिक कर्मकाण्ड स्वयं अपने आप मे कोई बड़ा महत्व नहीं रखते, महत्वपूर्ण तो वे भावनाऐं हैं जो उन अनुष्ठानों के पीछे काम करती है। मनुष्य भावनाशील प्राणी है। दूषित तमोगुणी, नीच भावनाओं को ग्रहण करने से वह असुर, पिशाच, राक्षस एवं शैतान बनता है और ऊंची सात्विक, पवित्र, धर्ममयी भावनाऐं धारण करके वह महापुरुष, ऋषि, देवता, अवतार बन जाता है। यह भावनाऐं ही मनुष्य को सुखी समृद्ध, स्वस्थ, सम्पन्न, वैभवशाली, यशस्वी, पराक्रमी तथा महान बनाती हैं और इन भावनाओं के कारण ही दुःखी, रोगी, दीन, दास, तिरस्कृत तथा तुच्छ हो जाता है। शारीरिक दृष्टि से लगभग सभी एक समान से ही होते है, पर उनके बीच जो जमीन आसमान का अन्तर दिखाई पड़ता है यह भावनाओं का ही अन्तर है। धार्मिक दृष्टिकोण, सद्भावनाओं, सात्विक-परमार्थिक वृत्तियों को ऊंचा उठाता है।

धार्मिक कर्मकाण्डों का आयोजन इसी आधार पर होता है। धर्म हृदय है। अन्तरात्मा में सतोगुणी तरलता उत्पन्न करना धर्म का, धार्मिक कर्मकाण्डों का मूल प्रयोजन है। समस्त कर्मकाण्डों की रचना का यही आधार है। स्थूल व्यापार बुद्धि से धार्मिक कृत्यों और भावों की उपयोगिता किसी की समझ में आवे चाहे न आवे पर इस दृष्टि से उनका असाधारण महत्व है। इन कर्मकाण्डों आवे कुछ समय और मन अवश्य खर्च होता है, पर उसके फलस्वरूप वे तत्व प्राप्त होते हँ, जो मनुष्य के प्रेरणा केन्द्र का निर्माण करते हैं। उसके अन्तरंग तथा बहिरंग जीवन को सुख-शांति से पूरित करते हैं।

ब्राह्मणत्व रहित, विद्या-विवेक-आचरण-त्याग-तपस्या से रहित वे व्यक्ति जो शूद्रोपम होते हुए भी वंश परंपरा के कारण बाह्मण कहलाते हैं, उन्हें श्राद का या अन्य किसी प्रकार के दान प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। श्राद्ध के निमित्त किया हुआ दान या भोजन उन्हीं सच्चे ब्राह्मणों को दिया जाना चाहिए जो वस्तुतः उसके अधिकारी हैं। श्रुतियों में कहा गया है कि बाह्मण अग्रिमुख है, उसमें डाला हुआ अन्न देवता एवं पितरों को प्राप्त होता है, उससे विश्व का कल्याण होता है। परन्तु वे ब्राह्मण ही होने चाहिए-अग्रिमुख। त्याग, तपस्या, विद्या और विवेक की यज्ञ अग्रि जिनके अन्तःकरण में प्रज्जवलित है, वही अग्रिमुख हैं। अग्नि में न डालकर कीचड़ में यदि हवन सामग्री डाली जाय तो कुछ पुण्य न होगा। इसी प्रकार अग्रिमुख उत्सवों के अतिरिक्त अन्यों को दिया हुआ दान भी निरर्थक होता है। शास्त्र मत है कि कुपात्रों को दिया हुआ दान, दाता को नरक में ले जाता है।

श्राद्ध करना चाहिए जीवितों का भी, मृतकों का भी। जिन्होंने अपने साथ में किसी भी प्रकार की कोई भरपाई की, उसे बार बार प्रकट करना चाहिए क्योंकि इससे उपकार करने वालों को संतोष तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। वे अपने ऊपर अधिक प्रेम करते हैं और अधिक घनिष्ट बनते है, साथ साथ अहसान स्वीकार करने से अपनी नम्रता एवं मधुरता बढ़ती है। उपकारों का बदला चुकाने के लिए किसी न किसी रूप में सदा ही प्रयत्न करते रहना चाहिए, जिससे अपने ऊपर रखा हुआ ऋण भार हलका हो। जो उपकारी, पूजनीय एवं आत्मीय पुरुष स्वर्ग सिधार गये हैं, उनके प्रति भी हमें कृतज्ञता रखनी चाहिए और समय-समय पर उस कृतज्ञता को प्रकट भी करना चाहिए। जल की एक अंजली, दीपक या पुष्प से श्राद्ध किया जा सकता है। श्रद्धा में भावना ही प्रधान है। श्रद्धा भावना का हमें कभी परित्याग न करना चाहिए। श्रम की परंपरा समाप्त हो जाने पर तो पिता को कैद कर लेने वाले औरंगजेब ही चारों ओर दृष्टिगोचर होने लगेंगे।

तीर्थों की उपयोगिता तीर्थ यात्रा के महात्म्यों का धर्म शास्त्रों में सुविस्तृत वर्णन मिलता है। चारों धाम, सात पुरी, द्वादश ज्योतिलिंगम् तथा अनेक सरिता, सर, वन, उपवन तीर्थों की श्रेणी में गिने जाते है। इनके दर्शन, भजन, पूजन, अर्चन करने तथा इनमें निवास, स्नान करने में धर्म लाभ होने की हिन्दू धर्म में सुस्थिर मान्यता है। इन तीर्थों में लाखों-करोड़ों की संख्या में हिन्दू जनता धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर जाती है। विशेष पर्वों पर तो तीर्थों में असाधारण भीडें होती हैं। करोड़ों रुपया इस अवसर पर हस्तान्तरित होता है।

आधुनिक युग बुद्धिवाद का युग कहा जाता है। इस युग में हर बात को बुद्धिवाद की तराजू पर तोलने की प्रथा है। जब सभी विषयों में खोज और अन्वेषण हो रहे हैं तो धार्मिक प्रथाओं के सम्बन्ध में भी विचार-विमर्श होना स्वाभाविक है। तीर्थों के संबंध में भी नई पीढ़ी की बुद्धिवादी जनता विचार करती है। किन्तु जब उनकी नव विकसित बाल बुद्धि इनकी वास्तविकता और उपयोगिता को ठीक प्रकार समझ नहीं पाती तो कुतर्क करने लगती है। तीर्थों कें अस्तित्व को अनुपयोगी, हानिकारक तथा अवांछनीय तक बताया जाता है। आइये, इस प्रश्र पर एक विवेचनात्मक दृष्टि डालें।

तीर्थों की स्थापना करने में हमारे तत्वदर्शी पूवजों ने बड़ी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है। जिन स्थानों पर तीर्थ स्थान स्थापित किये गए हैं, वे जलवायु की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी हैं। जिन सरिताओं का जल विशेष शुद्ध, उपयोगी, हलका तथा स्वास्थ्यप्रद पाया गया है, उनके तटों पर तीर्थ स्थापित किये गए हैं। गंगा के तट पर सबसे अधिक तीर्थ हैं। कारण यह है कि गंगा का जल संसार की समस्त नदियों से अधिक उपयोगी है। उस जल में स्वर्ण, पारा, गंधक तथा अभ्रक जैसे उपयोगी खनिज पदार्थ मिले रहते है, जिसके सम्मिश्रण से गगाजल एक प्रकार की दवा बन जाता है। जिसके प्रयोग से उदर रोग, चर्म रोग तथा रक्त विकार आश्चर्यजनक रीति से अच्छे होते हैं। कुष्ठ एवं क्षय रोग को दूर करने की गंगाजल में महत्वपूर्व क्षमता मौजूद है। इसी प्रकार अन्य नदी सरोवरों में अपने-अपने गुण हैं। इन गुणों की उपयोगिता का तीर्थों के निर्माण में प्रधान रूप से ध्यान रखा गया है।

आजकल वायु परिवर्तन के लिए लोग पहाड़ी पर जाया करते हैं। रोगी और दुर्बर्लों को डाक्टर लोग वायु परिवर्तन के लिए किन्हीं स्वास्थ्यप्रद स्थानों में भेजते हैं। यही दृष्टिकोण तीर्थों में भी रखा गया है। जहाँ पर भूमि वनस्पति, ऋतु आदि के आधार पर स्वास्थ्यप्रद वायु पाई गई है, वहां तीर्थ कायम किए गए हैं। इन स्थानों पर कुछ समय निवास करके वहां के जलवायु का सेवन करने से तीर्थ यात्रियों के स्वास्थ्य पर बडा अच्छा प्रभाव पड़ता है-इस तथ्य से प्रोत्साहित होकर विवेकशील आचार्यों ने वहां तीर्थ बना दिये।

तीर्थ यात्रा में पैदल चलने का विशेष महत्व बताया गया है। पैदल चलना शरीर को सुगठित करने और नाड़ी समूह तथा मांस-पेशियों को बलवान बनाने के लिए आवश्यक उपाय है। आयुर्वेद शास्त्रों में प्रमेह चिकिल्सा के लिए सौ योजन अर्थात् चार सौ कोस पैदल चलने का आदेश दिया है अधिक चलने से जंघाओं की नाड़ियां और मांस-पेशियों का अच्छा व्यायाम होता है और वे परिपुष्ट हो जाती हैं। ढीली नस-नाड़ियों की संकुचन शक्ति शिथिल पड़ जाने के कारण वीर्य नीचे की ओर स्रावित होता रहता है और स्वप्नदोष, प्रमेह पेशाब के साथ चिकनाई जाना, शीघ्रपतन, बहुमूत्र आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इस व्यथा से छुटकारा पाने के लिए कटि प्रदेश तथा जंघाओं के नाड़ी समूह तथा मांस-पेशियों को ठीक करना पडता है। आयुर्वेद न् सम्मति में इसका अच्छा उपचार नियमित रूप से पैदल चलना है। जिन् कटि, पेड़ और जंघाऐं सुदृढ़ हो जावें। तीर्थ यात्रा इस उद्देश्य को बड़ी अच्छी तरह पूरा करती है। पैदल तीर्थ यात्रा करने से स्वस्थ व्यक्तियों का शरीर गठन ऐसा अच्छा हो जाता है, जिससे प्रमेह आदि का आक्रमण नहीं हो पाता। जिन्हें मूत्र रोग होते हैं, उन्हें उन व्यथाओं से बिना दवा-दारू में धन लुठये स्थायी रूप से लाभ हो जाता है।

जो लोग लम्बी यात्रायें नहीं कर पाते थे, सुदूर देश में जाने की जिन्हें सुविधायें न होती थीं, उन्हें किसी एक ही तीर्थ की परिक्रमाऐं करने को कहा जाता था। पेट के बल दण्डवती परिक्रमाऐं करना आँतों के रोगों के उपयोगी है, तिल्ली एवं जिगर भी इससे मजबूत होते हैं और उनके बहुत विकार दूर हो जाते है। पर्वतों पर बहुत ऊंचे कुछ तीर्थ बनाये गये हैं। ऊंची चढ़ाई चढ़ने से हड्डियों की संधियाँ मजबूत होती हैं तथा गठिया होने का भय नहीं रहता। फेफड़ों को मजबूत बनाने के लिए ऊँचे चढ़ना और नीचे उतरना असाधारण रूप से उपयोगी है। पहाडी प्रदेशों के रहने वाले व्यक्ति जिन्हें ऊँचे चढ़ना और नीचे उतरना पड़ता है, चौड़ी छाती वाले होते हैं, उन्हें तपैदिक जैसे फेफड़े के रोगों से ग्रसित नहीं होना पड़ता। कंधे पर गंगाजल की कांवर रखकर शिवरात्रि पर यात्रा की जाती है। इससे कंधे की नसों पर दवाब पड़ता है। इन नसों का मूलाधार चक्र की गुदा नाड़ियों से संबंध है। अतएव गुदा स्थान पर उसका प्रभाव होता है और बवासीर सरीखे रोगों की संभावना नष्ट हो जाती है।

स्वास्थ्य लाभ के उपरोक्त दृष्टिकोण से तीर्थ यात्रा महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त देशाटन से ज्ञानवृद्धि का जो लाभ होता है, वह भी कम उपयोगी नहीं है। जीवन की बहुमुखी उन्नति के लिए मनुष्य जाति के स्वभाव, आचार, विचार, व्यवहार, रहन-सहन, प्रथा, विश्वास, कार्यक्रम, परिपाटी, अर्थ नीति आदि का अध्ययन करने की बड़ी भारी आवश्यकता है। देशाटन करने से मूर्ख मनुष्य भी बहुत कुछ अंशों में बुद्धिमान बन जाते हँ और घर से बाहर पैर न रखने वाले कप-मंडूक, ऊँची शिक्षा प्राप्त कर लेने पर भी अर्द्ध मूर्ख बने रहते हैं। देशाटन केवल मनोरंजन नहीं है वरन् एक ठोस शिक्षाक्रम है। जितना वास्तविक ज्ञान मनुष्य दो महीने के देशाटन में प्राप्त कर सकता है, उतना दो वर्ष तक पुस्तकें पढ़ने पर नहीं पा सकता। उच्च श्रेणी के मनुष्य अपनी आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक तथा शारीरिक स्थिति अच्छी बनाने के लिए प्रतिवर्ष कुछ न कुछ समय देशाटन के लिए अवश्य निकालते हैं। बेवकूफ लोग अन्दाज लगाते है कि यह सैर सपाटे का समय व्यर्थ जाता है, पर सच बात यह है कि दस घण्टे पिले रहकर आदमी जितना उपार्जन करता है, उन सैर-सपाटे के दिनों में कई दृष्टियों से बहुत ऊँची चीजें कमा लेता है। तीर्थ यात्रा के अवसर पर अनेक स्थलों को देखने, अनेक प्रकार के मनुष्यों की विभिन्नताऐं समझने, विविध स्थलों की विशेषताऐं जानने का अलभ्य अवसर मिलता है। अनेक कठिनाइयों का एवं दुष्ट, चोर, ठग और धूर्तों का सामना करना पड़ता है। इस संघर्ष में मनुष्य की चेतना, जागरूकता, सतर्कना एवं विवेचना शक्ति बढ़ती है। यात्रा के अनुभवों से परिपुष्ट होकर मनुष्य का बौद्धिक स्वास्थ्य बढ़ता है और वह बढोत्तरी शारीरिक स्वास्थ्य की तरह ही महत्वपूर्ण है।

देश के विविध भागों के किसी एक स्थान पर जब एक समय में बहुत लोग पहुंचते हैं तो ऐसा अवसर स्वर्ण अवसर होता है। व्यापारी लोग अपनी वस्तुऐं उस वृहद् जन समूह के हाथों बेचते हैं, ग्राहक लोग उन एकत्रित व्यापारियों पर  नई-नई वस्तुऐं देखते हैं और दुष्प्राप्य चीजों को सुविधापूर्वक खरीद लेते हैं। इससे देश की  व्यापारिक, औद्योगिक एवं आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। आगन्तुक लोग एक ही स्थान पर  विविध प्रदेशों की विभिन्नताओं का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। एक दूसरे से परिचय, सम्पर्क और हेल-मेल बढ़ा सकते हैं। कोई प्रचारक अपने विचारों को ऐसे किसी एक स्थान पर रहकर  भी अनेक व्यक्तियों में फैला सकता है। जन सम्पर्क के इस स्वर्ण संयोग से आगन्तुकों को लाभ पहुँचे, इस दृष्टि से तीर्थों में अनेक प्रकार के आयोजन होते थे। कला, प्रदर्शनी, संगीत, भाषण,  कीर्तन, प्रवचन, सत्संग, सभा, सम्मेलन, अभिनय आदि द्वारा उपयोगी ज्ञान सामग्री प्राप्त करने  की आगन्तुकों को यहां अनेक सुविधाऐं होती थीं।

तीर्थ पुरोहित-पण्ड्या (सद्बुद्धि के भण्डार), तपस्वी, विद्वान, बुद्धिमान, पथ प्रदर्शक, ऋषि कल्प,  निस्पृह ब्रह्मवेत्ताओं के आश्रम में जाकर यात्री ठहरते थे। इन स्थावर और जंगम दोनों ही प्रकार के तीर्थों में स्नान करने से यात्री का तन और मन स्वस्थ, पुष्ट, चैतन्य एवं प्रफुल्लित हो  जाता था। भूमि पर मंदिर, जलाशय आदि के रूप में स्थित स्थावर तीर्थ हैं और ऋषि,  तपस्वी, परोपकारी, उच्च आत्मा वाले महापुरुष जंगम तीर्थ कहे जाते हैं। शास्त्रकारों ने स्थावर तीर्थ से भी जंगम तीर्थों का महात्म्य अधिक विस्तार पूर्वक बताया है। तीर्थ यात्रा में दोनों ही  प्रकार के तीर्थों का समन्वय होता था, अतएव शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही दृष्टियों से वहाँ  जाने वालों को समुचित लाभ मिल जाता था।

जीवन की व्यवहारिक कठिनाइयों को सुलझाने के लिए वे तीर्थ पुरोहित महत्वपूर्ण पथ प्रदर्शन करते थे। उन्हें विविध स्थानों की सुविस्तृत जानकारी होती थी, फलस्वरूप बटी-बेटों के विवाह, विविध स्थानों की फसल, व्यापारिक स्थिति, जीविका, शिक्षा, चिकित्सा आदि अनेक विषयों में इन तीर्थ केन्द्रों पर पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो जाती थी और उन जानकारियों के आधार पर ऐसे ऐसे लाभ होते थे जो यात्रा में लगे समय तथा पैसे की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान होते थे। यात्री लोग अनेक दृष्टियों से इतने लाभ में रहते थे कि सांसारिक, व्यापारिक बुद्धि से देखने पर भी तीर्थ यात्री फायदे में रहते थे।

तीर्थ स्थानों के ऐतिहासिक महत्व भी हैं। उन स्थानों से हमारे पूर्वज महापुरुषों के पुनीत चरित्रों का सीधा संबंध है। ये स्थान उन महापुरुषों के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं की स्मृति दिलाते हैं जिससे दर्शक को प्रेरणा, प्रोत्साहन, जीवन, बल, साहस तथा प्रकाश मिलता है। इतिहास स्वयं जीवन निर्माता है। अतीत काल के अनुभवों से भविष्य निर्माण का अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। पुस्तकों में अंकित इतिहास की अपेक्षा उन संबंधित स्थलों के स्मृति चिह्में के आधार पर पढ़ा हुआ इतिहास अधिक प्रेरणाप्रद होता है, अधिक हृदयंगम बन जाता है।

तीर्थों की स्थापना इस प्रकार की गई है कि इस सुविस्तृत विशाल देश के महत्वपूर्ण भागों की यात्रा छूटने न पावे। चारों धाम (बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वर तथा द्वारिका) देश के चार कोनों पर स्थित हैं। इनकी यात्रा करने वाले को सारे देश की परिक्रमा करनी पड़ती है और भारत की एक सूत्र में पिरोई संस्कृति, विभिन्न रीति-नीतियाँ, भाषाओं तथा भावनाओं के सम्पर्क में आना पड़ता है ज्योतिलिंगों, पुरियों, पुण्य सरिताओं एवं क्षेत्रों की यात्रा का क्रम भी ऐसा ही है,  जिनकी यात्रा में बड़े महत्वपूर्ण भूखण्डों का सम्पर्क होता है। यह संपर्क देश की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक तथा बौद्धिक उन्नति एवं राष्ट्रीय एकता की भावना सुदृढ़ करने के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होता है।

मानवीय विद्युत विज्ञान की दृष्टि से यह सिद्ध है कि जिन स्थानों में विशिष्ट आत्म बल वाले महापुरुष निवास करते हैं, वहां का वातावरण उनकी आत्म विद्युत से भर जाता है। जहां कोई अहिंसा की साधना वाले तेजस्वी महात्मा निवास करते हैं वहाँ का वातावरण ऐसा शांतिदायक हो जाता है कि गौ और सिंह आपस में प्रेमपूर्वक निर्भय होकर रहते हैं। अपना स्वाभाविक बैर भाव भूल जाते हैं। इस प्रकार जहाँ कोई अवतारी, कलाधारी, अलौकिक आत्माऐं रही हैं, वहाँ का वातावरण भी उनके दिव्य तेज से भर जाता है और वह बहुत समय तक, उन आत्माओं के चले जाने के चिरकाल पश्चात् तक बना रहता है। तपस्वी महात्मा अपनी तपश्चर्या के लिए प्राय: ऐसे स्थानों को चुना करते हैं, जहां इस प्रकार का आत्म तेज पूर्वकाल से ही विद्यमान हो क्योंकि इससे उनको बल प्राप्त होता है, साधना के विघ्रों से अनायास ही बहुत अंशों में छुटकारा मिलता है। इस परम्परा के अनुसार एक ही स्थान पर एक-एक करके अनेकों महात्माओं के आत्म तेज के परत जमा होते जाते हैं। उस भूमि, जल, वायु, आकाश में सर्वदा दिव्य तेज भरा रहता है। कल्प-कल्पान्त से असंख्य महात्माओं, अवतारी पुरुषों का सुदृढ़ आत्म तेज जिन स्थानों में पाया गया है,

वहीं तत्वदर्शी मनीषियों ने तीर्थ स्थापित किये हैं। वस्तुतः वे स्थान ''सिद्धपीठ'' हैं। वहाँ के  वातावरण में सुलभता से सिद्धि प्रदान करने वाले तत्व भरे रहते हैं। इन तत्वों के प्रभाव से  अध्यात्म मार्ग के पथिकों को असाधारण सफलता प्राप्त होती है। जिस प्रकार वृक्ष की छाया में  बैठने से सभी प्रकार के लोगों को शीतलता अनुभव होती है, उसी प्रकार इन सिद्धपीठों की छाया में पदार्पण करने से सुख-शांति एवं संकट निवारण की आशीर्वादात्मक भावनाऐं सुलभतापूर्वक हर एक को प्राप्त होती हैं। कभी कभी तो ऐसे अप्रत्याशित लाभ लोगों को मिलते देखे जाते हैं जिन्हें दैवी कृपा, तीर्थ महात्म्य, पूर्व पुण्यों का फल या क्या नाम दिया जाय, यह समझ नहीं आता।

यह ठीक है कि वर्तमान काल में तीर्थों की स्थिति बड़ी लज्जाजनक हो गई है। वहाँ अनाचार, व्यभिचार, ठगी, धूर्तता आदि का बोलबाला है। इस सचाई से कोई इनकार नहीं कर सकता।  संसार व्यापी अनैतिकता से तीर्थ भी अछूते नहीं रहे हैं। हर क्षेत्र में काम करने वाली बुराइयाँ तीर्थों में भी घुस पड़ी हैं। चोर, ठग, धूर्त, बेईमान, उठाईगीरे, व्यभिचारी, पाखण्डी, लोभी, नीच, निर्लज्ज व्यक्ति धर्म की खाल ओढ़ कर इन पुनीत स्थानों में कुछ से कुछ बन जाते हैं।  हत्यारे, डाकू, चोर तथा अनेक भयंकर प्रकार के अपराधी अपनी सुरक्षा के लिए तथा जीविका  की सुविधा के लिए साधु-संत बन जाते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मणत्व एवं पौरोहित्य गुणों से रहित व्यक्ति ब्राह्मणों के वेष ओढ़कर जनता को ठगते हैं। सच्चे ब्राह्मणों तथा महात्माओं की कमी  तथा धूर्तों की बढ़ोत्तरी ने आज तीर्थों को बदनाम कर दिया है। उन्हें अब धूर्तता, बदमाशी, ढोंग और लूट का घर समझा जाने लगा है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जनता की यह  मान्यता उचित भी है। यह सब होते हुए भी तीर्थों की आधार शिला एक बड़े उपयोगिता वाद के ऊपर खड़ी होने के कारण उनका महत्व पूर्णतया किसी भी प्रकार नष्ट नहीं हो सकता।

विषधर सर्प लिपटे रहने से चन्दन का वृक्ष त्याज्य नहीं माना जाता, काँटेदार डाली पर लगा हुआ गुलाब का फूल निन्दित नहीं होता, गंदी नालियां गिरने पर भी गंगाजी की महिमा मिट नहीं जाती। इसी प्रकार कुछ स्वार्थी, धूर्त एवं दुश्चरित्र लोगों की उपस्थिति के कारण तीर्थों की महिमा समाप्त नहीं हो सकती। हानिकारक विकार उत्पन्न होने पर उन विकारों को दूर करना चाहिए उन विकारों के भय से मूल को त्याग कर बैठना बुद्धिमत्ता नहीं। जुओं के भय से न तो कोई कपड़े फेंक देता है और न सिर के बाल घुटा डालता है।

खटमलों के भय से चारपाई पर सोना कोई नहीं त्यागता। कुछ स्वार्थियों की दुष्टता के कारण तीर्थों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। उनके द्वारा होने वाले लाभ इतने अधिक गंभीर एवं महान हैं कि इस छोटे से कारण की वजह से वे उपेक्षणीय नहीं हो सकते।

तीर्थों में दोष उत्पन्न हो गये हैं, उन्हें सुधारना चाहिए। (१) दर्शनीय स्थानों को स्वच्छ, शुद्ध एवं स्वास्थ्यप्रद बनाया जाना चाहिए, (२) भीड़ में स्त्रियों से कुचेष्टा करने वालों, जेबकतरों, उठाईगीरों, ठगों तथा पाखण्डियों को रोकने का प्रयत्न होना चाहिए। (३) मंदिरों में जमा तथा चढ़ावे के रूप में चढ़ने वाली सम्पत्ति का अधिकांश भाग लोक हितकारी सार्वजनिक कार्यों में व्यय होना चाहिए। (४) निःस्वार्थ, सेवाभावी, निर्लोभी, विद्वान, सच्चे, सदाचारी एवं सहृदय पण्डा-पुरोहितों से ही सम्पर्क रखना चाहिए। (५) दान देते समय पात्र-कुपात्र का पूरी तरह अन्वेषण कर लेना चाहिए। (६) यात्रियों को अतिथि समझकर उनकी समुचित सेवा सहायता करने वाली सेवा-समितियाँ होनी चाहिए। (७) सच्चे विद्वान ब्राह्मणों को तीर्थों में ऐसे आश्रम स्थापित करने चाहिए जहाँ जिज्ञासुओं को अपनी क्षुधा बुझाने के लिए सच्चा बौद्धिक भोजन मिल सके। (८) हर तीर्थ में वहाँ का परिचय देने वाली पुस्तकें ऐसी सस्ती मूल्य की उपलब्ध होनी चाहिए, जिसमें वहाँ के ऐतिहासिक तथ्यों का तर्क संगत विज्ञान बुद्धि के साथ शिक्षात्मक ढंग से वर्णन हो। (९) देव मंदिरों में बेजीटेबिल घी, विदेशी वस्त्र, चर्बी की मोमबत्ती आदि अपवित्र पदार्थों के उपयोग को हतोत्साहित एवं वर्जित किया जाना चाहिए। (१०) यात्रियों के लिए तीर्थ हर दृष्टि से उपयोगी बन सकें, ऐसी व्यवस्था करने वाली शिक्षणशालाऐं तथा संस्थाऐं खुलनी चाहिए। (११) पैदल तीर्थ यात्रा को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

इस प्रकार के सुधार होने से तीर्थों की वास्तविक महिमा पुनः उज्ज्वल हो सकती है। जो दोष दृष्टिगोचर हों, उनका संशोधन करते हुए तीर्थों की उपयोगिता का हम सब को लाभ उठाना चाहिए।

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