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गीले पंख
गीले पंख
प्रकाशक :
आत्माराम एण्ड सन्स |
प्रकाशित वर्ष : 1959 |
पृष्ठ :90
मुखपृष्ठ :
ईपुस्तक
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पुस्तक क्रमांक : 15462
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आईएसबीएन :0 |
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0
5 पाठक हैं
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श्री रामानन्द 'दोषी' के काव्य-संग्रह ‘गीले पंख' में 33 कविताएं हैं…
25
कभी
मधुमय गान कभी गाती है,
नन्ही-सी यह प्यास अधर की हो तूफ़ान कभी जाती है !
नयनों में वह झूम कहाँ है,
अन्तर अब निर्धूम कहाँ है;
मत वीणा के तार टिकोरो --
यह तुम को मालूम कहाँ है,
आँसू से भी ज्यादा गीली हो मुसकान कभी जाती है
मधुमय गान कभी गाती है !
सुधि का मृग, कंचन की काया,
खोया - खोया - सा बौराया;
छवि-संकुल उस वन-वीथी में --
खोज न लेकिन तुम को पाया;
अन्तस पीर पिया-प्राणों से हो अनजान कभी जाती है !
मधुमय गान कभी गाती है !
कंपित तनघन अवगुण्ठन में,
लाज निगोड़ी नमित नयन में;
देख द्वार से लौट चले तुम --
अर्पण के उस मादक क्षण में --
मेरी लाज, तुम्हारी करुणा हो व्यवधान कभी जाती है
मधुमय गान कभी गाती है !
यान गान के जो तैराए,
ऊब डूबते - से उतराए;
जितना ही अवगाहा मन को --
पीड़ा के सागर गहराए,
मेरी यह अनुभूति तुम्हारा हो अनुमान कभी जाती है
मधुमय गान कभी गाती है !
प्राण, मिलोगे भुज फैलाए,
या नयनों में प्रश्न जगाए !
इस उलझन में उलझ-सुलझते --
बढ़ जाते हैं पग पगलाए;
मेरी राह इसी दुबिधा में हो आसान कभी जाती है !
मधुमय गान कभी गाती है !
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