काल का प्रहार - आशापूर्णा देवी Kaal Ka Prahar - Hindi book by - Ashapurna Devi
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काल का प्रहार

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15412
आईएसबीएन :000

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आशापूर्णा देवी का एक श्रेष्ठ उपन्यास

9

दलूमौसी का चेहरा दुबारा दिव्य आभा से भर जाता-उसी जलन में ही तो सुख छिपा रहता है रे। फिर वह भी साँस लेती और कहतीं-कितनी देर के लिए शायद किताबें लेते वक्त या देते वक्त-यह कोई देख ना ले यह डरे भी तो बना रहता है। चारों ओर की दीवारों से सहस्रों जोड़ी आँखें छिपी रहती हैं।

फिर भी तो चल रहा है, डरी हुई तो नहीं लगतीं? वह ऊपर से कैसे पता चल सकता है? जब उसके पास जाती हूँ तब हृदय बर्फ की तरह ठंडा, पैर काँपने लगते है। सिर घूमता हैं कितनी यातना है इस विष रूपी अमृत में। समझेगी कैसे झेला भी है सहस्त्र नागों का दर्शन?

ऊपरी बातें अपनी पोती से कहकर मैं मुश्किल में फंस गई-वह सुनकर हँसते-हँसते खाट से गिर कर हिचकी लेने लगी। जब स्वाभाविक अवस्था में आई तो पूछा, इसी को तुम लोग प्रेम कह कर खुशी से फूल जाते हो। प्रेम तो नहीं अनुराग- एक ही बात है, जिसे तुम अनुराग कहती हो वही प्रेम है। ही-ही-ही इतना आह्लाद काहे को होती हैं।

खबरदार हँसना मत।

हँसू नहीं तो क्या करूं, सिर्फ पास आने भर से पैर काँपने लगते दिल पर बर्फ जम जाता, सिर घूमता। ओह यह तो महाभारत की कथा में धृतराष्ट्र का प्रसंग है जिसमें उन्होंने खड़िया के पानी को दूध-मानकर पीया और प्रफुल्लित हो उठे।

धृतराष्ट्र!

युधिष्ठर होंगे।

क्यों?

बड़ी मुश्किल की बात है। भीम, अर्जुन, शकुनि, दुर्योधन किसी ने पीया होगा। असल बात तो समझो। खड़िया का पानी दूध समझ कर पीकर खुश होना।

तुम्हारे जमाने की तरह असल दूध की मलाई रबड़ी का स्वाद तो ना चखा था।

वही तो कह रही हूँ.... ही... ही....। उंगली से उंगली छू जाने से मिर्च की सी जलन। ओह दादी सच। तुम्हारी पुत्र भी अद्भुत था। उसमें से निकल कर तुम इतनी महान बन पाई इसके लिए मैं तुम्हारा अभिनन्दन करती हूँ। ही-ही-ही। सिर्फ दलूमौसी का अनुभव ही धरोहर समझ कर संजोये रखा है या अपना भी कुछ है। मैं भी सुनें।

मैं भी हँसने लगती। इस युग की छोकरियाँ स्वयं को बुद्धिमति और उस युग की बूढ़ियों को महामूर्ख समझती है। मन ही मन सोचती हैं बातों। का जाल बिछा कर गहरे पानी से मछली निकाल लेंगी। मैं भी इतनी बुद्ध नहीं हैं।

आँखें ऊपर करके जबाव दिया-अरे बाबा दलूमौसी का परिणाम देख कर ही तो अक्ल ठिकाने लग गई थी। इसके अलावा दलूमौसी की तरह मैं सुन्दर भी तो नहीं थी।

पोती ने पूछा, तुम्हारी उस दलूमौसी को जवानी का फोटो नहीं है? मैं भी देखती तुम लोगों की सुन्दरता की परिभाषा क्या थी? ही, ही खड़िया के घोल को दूघ समझने जैसा तो नहीं?

इस युग की आधुनिकाओं को क्या कहती। बताने की तो यही इच्छा हो रही थी कि सचमुच की खुबसूरती तो उसी जमाने में पाई जाती थी। तुम लोगों ने खुबसूरती देखी कहाँ? तुम लोगों को विश्वसुन्दरी को देखने से मतली आने लगती है। कोई हड्डियों का ढाँचा, कोई लकड़ी की गुड़िया या किसी के समक्ष दाँतों का बाजार ! दूर दूर। 'ललितवंगलता' किसे कहते है देखा ही नहीं।

हमारे मोहल्ले के केशवबाबू की विधवा दीदी। जो गरद को थान। पहने मन्दिर जाती थी। ब्लाउज आदि का तो दौर ना था, पीठ का रंग और गरद का थान एक ही रंग का लगता....। और चेहरे की कटिंग जैसे खुदाई करके मूर्ति गढ़ी गई हो। पर वह तो बारह बरस की उम्र से विधवा खाद्यान्न एवमं महीने में दो उपवास (पानी भी नहीं पीतीं थीं) रखती। इसके अलावा भी ना जाने कितने प्रकार के व्रत। दलूमौसी की नानी को भी देखा था। कौन कहेगा यह हाड़ मांस की मानवीं है। वह तो देवी जगधात्री प्रतिमा लगतीं थी। आलता, सिंदूर और कस्तापाड़ साड़ी में उनका रूप जैसे बिखरा रहता। दलूमौसी का रंग अपनी नानी जैसा ना था। असल में उस जमाने में रंग तो धूप से झुलस नहीं पाता था। कोई खुदा पर खुदाई भी नहीं करता था।

जैसे भौंहों को काट छाँट कर उस पर रंग की तूलिका चला दी हो। व्यवहार करने की बात कोई सपने में भी नहीं सोचता था। जो भी थो सब असल-सच्चा कुछ भी बनावटी ना था। जाने दें। सिर्फ यही कहा, अब तो रूपसी का कितना रूप अपना है और कितना दुकान से खरीदा यह समझना ही नामुमकिन है।

यह सब बातें तो कह नहीं सकती थी बस फोटो के प्रसंग पर अफसोस किया। अलग से फोटो, किसी लड़की का शादी से पहले फोटो खिंचता था? वह भी दलूमौसी जैसी सनातन परिवार की लड़की के घर में। अगर घर में ब्याह लगती या कुटुम्ब आते तो एक आध ग्रुप फोटो खिंचता था। उसी में गुड़ की भेली के अन्दर घुस कर कोने में खड़े हो। तस्वीर खिंचानी पड़ती। और फोटोग्राफर, एक काले कपड़े का टुकड़ा और तीन पाये का टेबिल लाकर काफी देर तक अपने मुँह माथे पर उस घने काले कपड़े को ढक तस्दीर खींचता। वह भी काफी कसरत करके। किसी की शादी में मेरा भी ऐसा फोटो खिंचा था, दक्ष की माँ के साथ और देलूमौसी का बलराम के साथ। माने आखिरी पल में कर्ताओं को ख्याल गया था कि वे ही काहे को वंचित रहें, वे भी दौड़े आये थे- वही तस्वीर-। अरे देखो फिर से क्या खाट से गिरने का इरादा है? ना बाबा हमारे जमाने की कथा तुम्हें सुनने की जरूरत नहीं, मुझे ही फिर से तुम्हारी हिचकी थमानी पड़ेगी, अभी थमा कर तो मेरा हाल बेहाल हो चुका है। मुझे याद है उस फोटो को देख कर मैं तो रो पड़ी थी और दलूमौसी ने फोटो पर फ्रेम चढ़ाने से पहले ही अपनी तस्वीर को स्याही से रंग कर गायब कर डाला था। पता ही नहीं लग रहा था बलराम के साथ वह कौन है? मैं भी अपनी पोती को मेरी दलूमौसी की जवानी वाली सुन्दरता ना दिखा पाई।

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